पोलैंड वासी अपने देश को ‘पोलस्का’ और राजधानी वारसा को ‘वरसावा’ कहते हैं


चौवालीस साल पहले संडे मेल के कार्यकारी संपादक त्रिलोक दीप एक सप्ताह की पोलैंड यात्रा पर गये थे जो उन्हें भुलाये नहीं भूलती। हालांकि तब से आज तक वहां की राजनीतिक परिस्थिति बदल चुकी है लेकिन जो बातें वे हमें बता रहे हैं वे अभी भी ताज़ा लगती हैं।

त्रिलोक दीप वरिष्ठ पत्रकार
त्रिलोक दीप,वरिष्ठ पत्रकार

सन् 1977 की एक हफ्ते की पोलैंड यात्रा आज भी ज़ेहन में तरोताज़ा है ।साथ ही अमेरिका और यूरोप के कई देशों में बसे पोल आप्रवासियों से मुलाकातें और उनके अपने देश के बारे में जज़्बात आज भी मानस पटल पर अंकित हैं । अमेरिका के  बुफ्फलो में  पोल बड़ी संख्या में रहते हैं ।बुफ्फलो से ही मैं नियाग्रा जलप्रपात देखने के लिए गया ।राष्ट्रकुल देश का नागरिक होने के नाते मुझे कनाडा की तरफ जाने में उन दिनों वीज़ा की दरकार नहीं थी ।मैंने 1975 से 1983 तक लंदन की छह यात्राएँ बिना वीज़ा के की थीं । कनाडा की ओर का नियाग्रा जलप्रपात अमेरिका की तरफ  से अधिक अच्छा और आकर्षक है ।

बहरहाल मैं बुफ्फलो में रहने वाले पोल लोगों से मिला ।वे अपने देश को बहुत मिस करते थे और सही मौके पर पोलैंड की वापसी बाबत भी सोच रहे थे । वे कहते थे कि यहां वे बहुत खुशहाल हैं लेकिन फिर भी वे अपने देश की मिट्टी की गंध और अपनी संस्कृति और संस्कारों से कटा हुआ पाते हैं ।क्योंकि पोलैंड की यात्रा के दो बरस बाद मैं अमेरिका गया था लिहाजा पोल लोगों के साथ आँखों देखी साझा की ।मैं यह भी स्पष्ट करना चाहूँगा कि बुफ्फलो में  जिन पोल लोगों से तब 1979 में मुलाकात और बातचीत हुई थी उनमें से कोई भी यहूदी नहीं था ।अमेरिका और कई यूरोपीय देशों में रहने वाले यहूदी भी मिले, उनके बारे में आगे कहीं ज़िक्र आयेगा ।

लौटते हैं पोलैंड की तरफ ।मैं बीच में भटका नहीं था,यों ही प्रसंग आने पर पोलैंड के संदर्भ में कुछ याद हो आया ।पुरानी राजधानी क्राकोव और शीतकालीन राजधानी ज़ाकोपाने के बाद वर्तमान राजधानी वारसा पहुंचा ।पोलैंड वहां के  लोगों के लिए ‘पोलस्का’ है जबकि वारसा को वहां के लोग ‘वरसावा’उच्चारित करते हैं ।

मेरा मार्गदर्शक मौरोज़ आज कुछ उदास दीखा ।इसकी वजह पूछने पर उसने बताया था कि वह ट्रेफिक़ पुलिस वाले से उलझ गया ।मेरी कार की पार्किंग को लेकर वह मेरा चालन करना चाहता था ।

मेरा तर्क था कि मेरी कार सही जगह पार्क थी ।जब मैंने उसकी तसल्ली करा दी तो मुझे छोड़ तो दिया लेकिन एक बार उसके ऑफ़िस में अपनी सफाई फिर से देने के लिए जाना ही पड़ेगा ।अपने आपको सामान्य करते हुए उसने पूछा कि आपकी यात्रा कैसी रही ।

मैंने कहा कि मुझे ग्रामीण परिवेश खूब भाता है लेकिन औश्वीत्ज़ गैस चैंबर और यातना शिविर देखकर रोना आ गया।अभी भी मैं अपने आपको सहज और सामान्य नहीं कर पा रहा हूं ।यह सोचकर हैरान और परेशान हूं कि कोई हुक्मरान और उसके कारिंदे और कारकून इतने जालिम, निर्मम,निर्दयी और हृदयहीन भी हो सकते हैं ।

औश्वीत्ज़ का ज़िक्र सुनकर मौरोज़ भी उदास हो गया ।सबब पूछने पर उसने बताया कि न जाने हमारे कितने सगे सम्बंधी इन गैस चैंबरों और यातना शिविरों में मारे गये ।पोलैंड को पहले नात्ज़ी सेनाओं ने लूटा,लोगों को बंदी बनाया और सभी को औश्वीत्ज़ लाया गया ।

उस वक़्त औश्वीत्ज़ हिटलर का ‘कत्लगाह’ बन गया था ।उसके निशाने पर बेशक मुख्यत:यहूदी थे लेकिन उसने पोलैंड के दूसरे नागरिकों पर भी रहम नहीं किया ।उसका सपना था पूरे यूरोप पर अधिकार करना ।जो लोग उसके ज़ुल्म से बच निकले,जिन में मेरे पिता जी भीथे,बताते हैं कि पोलैंड को तो उसने जर्मनी का एक  ‘राज्य’घोषित कर दिया था और कई बरसों तक तो विश्व के मानचित्र पर उसका नाम तक गायब हो गया ।

यूरोप के दूसरे देशों का माल लूट कर यहां ही जमा होता था और बिना किसी की उम्र और लिंग का लिहाज़ किए उसे गैस चैंबर में धकेल दिया जाता था ।हमारे पिता जी जब आपबीती सुनाते थे तो गुस्से से मेरी मुठियां तो भिन्च जातीं और रोंगटे भी खड़े हो जाया करते थे।

पोलैंड का शाही क़िला

मौरोज़ इतना कह कर वह चुप हो गया ।शायद उसका गला भर आया था ।बोला, मैं भी वारसा से आपके संग कराकोव और ज़ाकोपाने जा सकता था लेकिन जब पता चला कि आप औश्वीत्ज़ भी जाना चाह रहे हैं तो मेरे निवेदन पर आपके लिए अलग मार्गदर्शक का प्रबंध किया गया ।इस बार उसकी पत्नी मारग्रेट भी उसके साथ थी ।दोनों की दोस्ती स्वीडन में हुई थी जो बाद में शादी में तब्दील हो गयी।विदुषी महिला हैं ।

मौरोज़ की बात को आगे बढ़ाते हुए मारग्रेट कहती हैं  कि द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका में नात्सी फौजों का अत्याचार साठ लाख पोलवासियों को लील गया,इस में मेरे परिवार के लोग भी शामिल थे ।इसे पोलैंड की कुल आबादी की एक चौथाई जनसंख्या माना जाता है ।युद्घ की समाप्ति के बाद कई परिवार बिछुड़ गये,कुछ दूसरे देशों में चले गये, कुछ मिले और कुछ आज भी मिलने की आस लगाये बैठे हैं ।पूरे यूरोप की आबादी गड्डमड्ड हो गयी।हालांकि युध्द में मारे गए लोगों के चित्र तो 

जगह जगह लगाए गए हैं लेकिन लाखों की तादाद में चित्रों में से अपनों की तलाश करना कोई आसान काम नहीं है ।

पोलैंड कृषिप्रधान देश है ।लेकिन यहां के युवाओं का मानना है कि हम लोग दूसरे यूरोपीय देशों के मुकाबले कृषि के क्षेत्र में बहुत पिछड़े हुए हैं । इसके लिए वे अपने हालात को जिम्मेदार ठहराते हैं ।इस के दो कारण बताये जाते हैं: एक पूर्व में सामंतवादी  व्यवस्था का होना और दो द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर की फौज द्वारा देश की बर्बादी ।एक वक़्त था जिस ज़मीन पर जिस ने कब्ज़ा कर लिया वह उसी की हो गयी ।पोलैंड में ज़मीन बैलों से नहीं घोड़ों से जोती जाती है ।खेतों में अगर बैलगाड़ी की जगह घोड़ागाड़ी है तो सड़कों पर आपको ऐसे ताँगे भी देखने को मिल जायेंगे जिन्हें देखकर उन्हें बग्घी होने का भ्रम हो जाता है ।

पोलैंड धर्मप्रधान देश है ।बेशक वहां उस समय कम्मुनिस्ट पार्टी की सरकार थी बावजूद इसके वहां पूरी धार्मिक आज़ादी थी ।गांव में काफी संख्या में गिरिजाघर थे,लेकिन शहरों में भी कमी नहीं थी ।

उस समय भी (1977 की बात है) बुजुर्गों के साथ युवाओं का झुकाव और रुझान भी धर्म के प्रति था ।स्कॉटलैंड के बाद कैथलिक धर्म के अनुयायी सब से अधिक पोलैंड के लोग हैं । एक बात और ।अन्य यूरोपीय देशों की भांति पोलैंड में भी यौन शिक्षा स्कूल स्तर से दी जाती थी ताकि बचपन से ही छात्रों-छात्राओं को मानवीय जीव विज्ञान की जानकारी हो जाये ।

मेरा मार्गदर्शक मौरोज़ हंस कर कहता है कि पश्चिमी देशों में आपके देश की तरह शायद ही कोई ऐसा लड़का-लड़की मिले जिसे यौन संबंधों के बारे में सही- गलत प्रयोग की समझ न हो। हमारे देशों में इसे स्वास्थ्यवर्धक सोच माना और समझा जाता है ।

वारसा में विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से मुलाकात हुई जिसे मैं औपचारिक ही कह सकता हूं । उन्होंने एक कागज़ पर से  अपना वक्तव्य पढ़ा ।जब मैंने प्रश्न किया तो उसी लिखे हुए में से उत्तर देते हुए कहा कि भारत के साथ पोलैंड के कदीमी रिश्ते हैं जिसकी हम लोग कद्र करते हैं ।उसके बाद संसद भवन देखा ।

वहां की संसद दो सदनी है ।निम्न सदन को सैयम कहते हैं जबकि उच्च सदन सीनेट कहलाती है ।सैयम में 460 सदस्य हैं जबकि सीनेट में एक सौ ।संसद में दो महिला पत्रकारों से भेंट हो गयी ।एक सांसद पत्रकार संघ की अध्यक्ष थी तो दूसरी घुमंतू पत्रकार ।वह भारत में भी छह हफ्ते रह कर आयी थी ।तब उन्होंने चुनाव प्रणाली के बारे में बताया था कि सभी निर्वाचित सदस्य मिलकर नेशनल फ्रंट बनाते हैं और मुख्य कार्यकम तय करते हैं जो सभी पार्टियों के कमोबेश एक जैसे ही होते हैं । कुछ छोटी पार्टियों के सुझावों को भी उस मुख्य कार्यकम में जोड़ लिया जाता है ।

उस समय पोलैंड के सदस्यों का चुनाव वहां की 33 परिषदें किया करती थीं जो भारत के राज्यों की समक्ष हैं ।ये परिषदें ही विभिन्न पार्टियों की सदस्य संख्या तय किया करती थीं ।मतदान करने में किसी भी 

वोटर पर दबाव नहीं होता था,उसे अपनी मनमर्जी से मतदान का अधिकार था ।विजयी उसे ही घोषित किया जाता था जिसे 51 प्रतिशत या इससे अधिक मत प्राप्त होते थे ।

मान लीजिए किसी मतदाता सूची में बारह सदस्य हैं और इनमें से नौ को निश्चित मत मिले हैं तो बचे तीन सदस्यों को रद्द नहीं किया जाएगा बल्कि प्राप्त मतों के अनुसार उनकी एक सूची बनायी जाएगी ।इस बीच यदि किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो उसके बचे कार्यकाल के लिए इस प्रतीक्षा सूची में से सबसे 

वरीयता प्राप्त व्यक्ति को उस दिवंगत संसद के बचे कार्यकाल को पूरा करने के लिए चुन लिया जाएगा । 

दूसरे शब्दों में इस प्रणाली या व्यवस्था को उपचुनाव के विकल्प के तौर भी देखा जा सकता है । सैयम का अध्यक्ष यहां मार्शल कहलाता है और उपाध्यक्ष डिप्टी मार्शल । सैयम में तीन डिप्टी मार्शल की व्यवस्था है ।आम तौर पर सैयम के साल में दो सत्र ही होते हैं- 

एक बजट और दूसरा सामान्य।यहां की संसद 23-24 आयोगों  द्वारा  काम करती है ।हर आयोग को विषय आवंटित किए जाते हैं जहां गरमागरम और आलोचनात्मक बहसें होती हैं ।लेकिन दिसंबर, 1989 के बाद पोलैंड की शासन प्रणाली भी मोटा मोटी अन्य यूरोपीय देशों जैसी हो गयी है ।सैयम के चुनाव अब आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से होते हैं ।सैयम में उसी पार्टी का प्रतिनिधित्व हो सकता है जिसे पांच प्रतिशत या इससे अधिक मत प्राप्त होते हैं ।

पोलैंड की मेरी यह यात्रा अक्टूबर महीने में थी लिहाजा अपने मार्गदर्शक मौरोज़ के साथ राजधानी वारसा घूमते घूमते मैंने देखा कि शाम चार सवा चार ही अंधेरा हो गया है ।पांच बजे तो दुकानों की बत्तियां भी जल गयी थीं और सड़कों की भी ।

इस बाबत जब मैंने मौरोज़ से पूछा तो उसने बताया कि इसमें चौंकने जैसी कोई बात नहीं ।अगर आप जून महीने में आते तो रात नौ बजे के बाद तक आपको सूरज चमकता दिखायी देता और चारों ओर खिली हुई धूप ।यही तो यहां के मौसम का मज़ा है, कमाल और करामात भी । दूसरे अब पतझड़ है ।पेड़ों के पौधे पीले तो होंगे ही ।बेशक़ पोलैंड की यह यात्रा काफी आत्मिक और दिल को छूने वाली थी । 

अपने कुशल कारीगरों के लिए मशहूर वारसा अपने मकानों,घरों के सामानों के लिए तो जाना ही जाता वहां की भव्य इमारतें, कुछ  राजप्रासाद ,कुछ राजमहल ,कुछ गिरिजाघर और कुछ स्थानीय निकायों द्वारा बनायी गईं इमारतें भी आकर्षित करती हैं ।दूसरे विश्वयुद्ध में वारसा की 85 प्रतिशत इमारतें खंडहरों

में बदल गयी थीं ।मौरोज़ बताते हैं कि वारसा का पूरी तरह से पुनर्निर्माण हुआ है ।कुछ भवनों की ओर इशारा करते हुए उसने बताया था कि कुछ बहुमंजिला इमारतों का निर्माण हो रहा है जो पोलैंड को एक नया स्वरूप देंगी  ।ये इमारतें  आधुनिक वास्तु और शिल्प कला के साथ साथ पुरातन और समकालीन कला का बेजोड़ नमूना प्रस्तुत करेंगी ।

वारसा में बहुत ही सुंदर और दिलकश उद्यान भी देखने को मिले । कभी वारसा साहित्य  व कला में भी बहुत संपन्न था ।यहां एक  कला और विज्ञान महल है जिसे आप  संग्रहालय भी कह सकते है जहां पोलैंड के गौरवशाली अतीत और वर्तमान उपलब्धियों का सम्मिश्रण है ।पोल यहूदियों के इतिहास का 

संग्रहालय को  देखकर औश्वीत्ज़ की याद फिर ताज़ा हो आयी ।यहूदियों के पोलैंड के निर्माण और विकास के साथ साथ यहां कला और साहित्य में योगदान को दर्शाया गया है । इसे देखकर यह भी लगता है कि  किस प्रकार यहूदी, ईसाई (कैथलिक और प्रोटेस्टेंट दोनों),मुस्लिम तथा अन्य सम्प्रदाय मिलजुल कर 

रहा करते थे ।इस यहूदी संग्रहालय को देखकर अनायास उन यहूदियों की याद हो आयी जो मुझे अमेरिका के वॉशिंगटन,न्यूयॉर्क,बुफ्फलो जैसे नगरों, रूस के मास्को, सेंट पीटर्सबर्ग और साइबेरिया के इर्कुत्स्क में मिले थे । इनमें से कुछ तो पोल यहूदी थे और  कुछ द्वितीय विश्वयुद्ध के मारे हुए ।कुछ यहूदी विश्वयुद्ध से पहले से अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ में रह रहे हैं । 

अधिसंख्य पोल यहूदी और सामान्य पोल भी विश्वयुद्ध के बाद का पोलैंड देखने के लिये आतुर थे । कुछ ऐसे पोल भी मिले जो न केवल अपना घर देखना चाहते थे बल्कि नात्ज़ी फौजों के शिकार हुए लाखों की सूची 

में अपनों को तलाशने का प्रयास करना चाहते थे ।विश्व हेरिटेज की सूची में पोलैंड के कई ऐतिहासिक राजमहल और कला,संस्कृति, साहित्य, विज्ञान और आयुर्वेद से जुड़े संग्रहालय हैं ।

मास्को और इर्कुत्स्क में कुछ ऐसे यहूदी परिवार भी मिले जो इस्राइल शिफ्ट कर गये थे ।इनमें से कुछ पुन: अपने ठिकानों पर लौट आये ।हरेक के अपने अपने तर्क थे ।कुछ लोगों को वहां की शासन व्यवस्था पसंद नहीं आयी तो कुछ को रहने के लिए उतने बड़े और खुले मकान नहीं मिले जिनमें  उनकी यहां रहने की आदत पड़ गयी थी ।इर्कुत्स्क में तो एक व्यक्ति अपना घर 

दिखाने के लिए भी ले गया जो निस्संदेह बहुत ही विशाल था तथा आधुनिक और खुबसूरत भी ।लेकिन बुफ्फलो में मिले  एक पोल के दिल का दर्द अक्सर याद आता है ‘अपने देश की मिट्टी की गंध ही कुछ और होती है जो मुझे बार बार बुलाती है और बार बार बुलाती हैं अपनों की रूहें भी जो हिटलर की नात्ज़ी फौजों की निर्दयता का शिकार हो गये थे । जाना तो है ही। ‘

उसने अपनी आंखें मलते हुए कहा था ।

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