तीन दिन गांव, तीन दिन शहर यूँ कट ही गया रुका-सा सफर! 

आज गांव में प्रकृति को सुनने सूंघने आया हूँ!

                                             यशवंत सिंह

यशवंत सिंह

आज से गांव प्रवास। थ्रेशर, गेहूं, धूल से सने खलिहान हम एलर्जिक शहरियों के लिए थोड़े दुखदाई हैं। lcz लेकर चलता हूँ। जाने कहां छींक वाली एलर्जी शुरू हो जाए और जंता कोरोना सस्पेक्ट मान उस आईसोलेशन वार्ड में डलवा दे जहाँ की कहानियां पढ़ समझ आता है कि वो जगह किसी काल कोठरी से कम नहीं। सुना कि नोएडा में एक बंदा बहुमंजिली आईसोलेशन वार्ड से कूद गया।कोरोना काल असल में बच्चों के उस गेम सरीखा लगता है जिसमें अचानक एक बोल देता है, STOP! और, जो जहां वहीं रुक गया, ठहर गया, फ्रीज हो गया।

गांव आता हूँ तो गांव में हरियाली नहीं पाता। लोगों के लंबे चौड़े बनते घर, हर रोज कई इंच पाटी जाती पोखरी देखता हूँ।कल सोच रहा था कि जिस रफ्तार से जंगल वन बगीचे पोखरे नदी हमने बर्बाद किए, सम्भव है उनमें से कुछ ऐसे रहे होंगे जिनके विजिबल फायदे हम न देख पाए होंगे पर उनकी महक खुशबू उनकी गन्ध उनके द्रव्य उनके फूल उनके फल से कुछ ऐसे पॉजिटिव कीड़े जीवाणु वायरस निर्मित होते होंगे जो कोरोना किस्म के हानिकारक वायरसों को वायुमंडल में ही मार देते होंगे।

कल्पनाएं हैं। कोई प्रमाण सुबूत तो नहीं है। अनुमान है बस। हमने धरती पर जिस किस्म से बर्बर जीवन जिया है, उसमें धरती को बीमार होना ही था। आदमी धरती के शरीर का खतरनाक वायरस है। इतनी तेजी से ग्रोथ कर रहा कि धरती के बाकी सारे ऑर्गन्स खा दबोच रहा। ये पागल और अंधा वायरस है।सच कहूं, मेरा मनुष्यों से कोई खास प्रेम बच नहीं गया है। मैं उनके लिए सोचता तड़पता हूँ जिनको मनुष्यों ने खत्म कर दिया।
मैँ धरती का शासक होता तो इस सभ्यता को फैक्ट्री मोड में रिसेट कर देता। मनुष्यों के घर बनाने पर रोक लगा देता। फैक्ट्रियां बंद कर देता। शहर वीरान करा देता ताकि वहां दस बीस साल में नेचुरल तरीके से वन जंगल पशु पक्षी कीड़े डेवलप हो जाते और कोठियों फ्लैटों में निवास करते। इतने पेड़ लगवाता, इतने पोखरे खुदवाता इतने विविध वन क्षेत्र डेवलप कराता कि धरती का बुखार कुछ डिग्री कम हो जाता।
वैसे, इसका दूसरा पक्ष भी है। धरती के एवोल्यूशन प्रॉसेस में यह वक़्त जरूरी भी कह सकते हैं। जैसे पहले कई प्रलय आ चुके हैं और धरती ने चीजों को अपने तरीके से दुरुस्त कर सबको फिर से जीने खाने की शुरुआत कराई, सम्भव है, एक नए प्रलय की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी हो।
मैं इस प्रलय का स्वागत करता हूं!
हमारे पापों का दंड पाने के लिए हमारे सिवा धरती पर अब शेष कौन है!
मैँ कटघरे में खड़ा पूरी मानव जाति को सुनाए जा रहे दंड को सिर झुकाकर मौन सहमति के जरिए कुबूल करता हूँ!
आज गांव में हूँ। आज बात होगी धरती आकाश वनस्पतियों नदियों पोखरों जुगनू तितली से!
सबकी कहानियां सुननी हैं।
आज गांव में प्रकृति को सुनने सूंघने आया हूँ!
ये लॉक डाउन दरअसल उस बर्बर मनुष्यता को सिर के बल खड़ा करने की प्रकृति की मुहिम है जिसने प्रकृति को ही निगल लिया। बची रह गई ठूंठ बीमार बुखार ग्रस्त धरती।
हम कुछ सपने में अक्सर धरती के माथे की पट्टियां बदलते रहते हैं, अकेले-अकेले, अलग-अलग दिशाओं में!
लेखक यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के फाउंडर और एडिटर हैं। 
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