ज्होनेरिजम : यानी सरल और सही बातों से उलझाने वाले निष्कर्ष निकालना

पंकज प्रसून 

सन 1997 की बात है .अमरीका के आयडाहो स्थित जूनियर हाई स्कूल के 14 वर्षीय छात्र नाथन ज्होनेर ने विज्ञान मेले में नौवीं क्लास के 50 बच्चों के सामने  एक जबर्दस्त समस्या रखी जिसका नाम था हम कितने भोले हैं ?  “.

उसने बताया कि  डाइ हाइड्रोजन मोनोऑक्साइड नामक एक काफी ज़हरीले रसायन का हम लोग हर रोज़ इस्तेमाल करते हैं जो गैसीय अवस्था में हमें जला देता  है ,धातुओं में जंग लगा देता है ,हर साल अनगिनत लोगों को मार डालता है , अम्ल वर्षा  तथा कैंसर के ट्यूमर में पाया जाता है ,इसकी ज्यादा मात्रा ग्रहण करने से पेट फूल जाता है और अधिक मूत्र पैदा होता है . यह बिजली आपूर्ति बाधित करता है, ग्रीनहाउस प्रभाव का एक मुख्य कारक है और ऑटोमोबाइल के ब्रेक की क्षमता पर बुरा असर डालता है.

इतना बताने के बाद उसने छात्रों से पूछा कि क्या इस रसायन के इस्तेमाल  पर तुरंत रोक लगनी चाहिये कि नहीं? 

पचास में से 43 छात्रों ने कहा हाँ .

तो उसने कहा मेरे प्रिय दोस्तों ,यह रसायन  और कोई  नहीं बल्कि पानी है , जिसका रासायनिक  नाम डाइ हाइड्रोजन मोनोऑक्साइड  है .

ज्होनेर को इस प्रयोग को दिखाने के लिये प्रथम पुरस्कार मिला . दरअसल वह बताना चाहता था कि तथ्यों की हेरा-फेरी से उलझाने वाले निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं.

यह खबर अखबारों में छपी तो  जेम्स के. ग्लासमैंन नामक पत्रकार ने एक नया शब्द गढ़ लिया – ज्होनेरिजम ,जिसका मतलब होता है किसी तथ्य का ऐसा इस्तेमाल जिससे वैज्ञानिक और गणित से अनजान लोग किसी गलत निष्कर्ष पर पहुंचें .

सन् 1983 के अप्रैल फूल दिवस पर मिशिगन के डूरंड एक्सप्रेस नामक साप्ताहिक अखबार ने सुर्खियों में इस खबर को प्रकाशित किया कि शहर की जलापूर्ति करने वाले पाईप में डाइ हाइड्रोजन आक्साइड नामक ज़हरीला रसायन भरा हुआ है.

इन खबरों का परिणाम यह हुआ कि अमेरिका में “बैन डाइ हाइड्रोजन मोनोऑक्साइड” नामक संस्था बन गयी और जिसके जवाब में ” फ्रेंड्स औफ़ हाइड्रोजन हाइड्रोक्साइड ” नामक संस्था भी बनी .

टेलीविज़न के न्यूज़ चैनलों पर जिस तरह से ख़बरें प्रसारित की जातीं हैं और ब्रेकिंग न्यूज बना कर पेश किया जाता है या फिर निहायत बकवास डिबेट आयोजित कर  तथ्यों को तोड़-मरोड़कर ग़लत नतीजे बताते जाते हैं, वे  ज्होनेरिजम  का उदाहरण हैं.

इसलिये समझदारी तो इसी में है कि ऐसी खबरें देखी ही नहीं जायें या अगर देख ही लिया तो उन्हें फिल्म देखने की तरह देखें , उन पर बिल्कुल ही यकीन नहीं करें.

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