घूँट भर अंतरिक्ष और एक अनाथ दुविधा, असीम विकास की निरंकुश वासना

'अगर हम पानी बना नहीं सकते हैं, तो फिर उसका उपयोग जिम्मेदारी से करना जरूरी है'

— सोपान जोशी

जल के बारे में सबसे जरूरी बात वह है जो हर साधारण हिंदुस्तानी जानता था और हर बढ़िया वैज्ञानिक भी जानता है – पानी बनाया नहीं जा सकता। आज आधुनिक विज्ञान ने अकल्पनीय तरक्की कर ली है। हम अणु के भीतर परमाणु को भेद के उससे ऊर्जा निकाल लेते हैं। तरह–तरह के रसायन तो बन ही चुके हैं, प्रयोगशालाओं में ऐसे मूल तत्व भी बन गये हैं जो प्रकृति में पाये भी नहीं जाते हैं। इस सब के बावजूद हम जल नहीं बना सकते हैं।

जल का रासायनिक स्वभाव बच्चों को भी पता होता है। एक कण ऑक्सीजन का और दो कण हाइड्रोजन के – ‘एच.टू.ओ.’। दोनों ही तत्व बड़ी मात्रा में पाये जाते हैं। हमारे ब्रह्मांड का तीन–चौथाई हिस्सा हाइड्रोजन से बना है, यानी 75 प्रतिशत। ऑक्सीजन तीसरा सबसे व्यापक पदार्थ है। पानी बनाने का कच्चा माल हमारे चारों तरफ बड़ी मात्रा में मौजूद है। शुद्ध पानी की किल्लत की वजह से पानी बेचने का एक व्यापक बाजार बन गया है जिसमें पानी की बोतलें पेट्रोल से महँगी तक बिकती हैं। फिर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन मिला के जल बनाने वाले उद्योग क्यों नहीं खुले?

क्योंकि दोनों तत्वों को मिलाने भर से काम नहीं बनता है। इसके लिए बहुत सारी विस्फोटक ऊर्जा चाहिए होती है। इतने बड़े विस्फोट हम करें, तो उससे बहुत नुकसान होगा। इसीलिए तमाम प्रयोगों के बावजूद जल उत्पादन का उद्योग खड़ा नहीं हो सका है।

अंतरिक्ष में बड़े–बड़े तारों के गर्भ में इतनी ऊर्जा होती जिसकी गणना क्या, वैज्ञानिक उसकी कल्पना भी नहीं कर पाते हैं। अंतरिक्ष के दैत्याकार सितारों की तुलना में हमारा सूरज एक छोटा–सा तारा है। फिर भी, वह एक दिन के भीतर वह इतनी ऊर्जा छोड़ता है जितनी बिजली कुल दुनिया में हम साल भर में नहीं बना सकते हैं। इसी तरह की ऊर्जा ने अंतरिक्ष में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को मिला कर पानी बनाया होगा। ऐसा वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हमारे सौर मंडल के बनने के समय यह पानी उल्का पिंडों पर जमी हुई बर्फ के रूप में पृथ्वी तक आया।

आज जो भी पानी पृथ्वी पर है वह तभी से हमारे ग्रह पर रहा है। जो बूँदें आज हमारे शरीर में खून के रूप में बह रही हैं, हो सकता है वही बूँदें एक समय डाएनासॉर के शरीर में भी थी। वही बूँदें प्राणियों के मूत्र और पसीने से होती हुई नदी के रास्ते सागर में पहुँचती हैं, फिर भाप बन के बादलों के सहारे लौट आती हैं। संभवतः जल के वही कण अंटार्कटिका के हिमनद में मौजूद हैं जो कभी–न–कभी भूमध्य रेखा के ऊपर किसी फूल पर ओस की बूँद बन के सरक रहे थे। आपने जो पानी आज सुबह पीया होगा, उसमें घूँट भर अंतरिक्ष भी रहा होगा।

अगर हम पानी बना नहीं सकते हैं, तो फिर उसका उपयोग जिम्मेदारी से करना जरूरी है। यह सबक हमारे गाँव–गाँव, नगर–नगर को पता था, चाहे उनके पास अंतरिक्ष से आये पानी की जानकारी न भी रही हो। जल स्रोतों का सम्मान होता था, लोग पानी के लिए नदी–तालाब–कुँए तक जाते थे। उसका इस्तेमाल करते समय कृतज्ञ रहते थे। आधुनिकता के दौर ने जल स्रोतों को पाइप के जरिये लोगों तक पहुँचाया है। आज समाज का एक बड़ा हिस्सा कुँए–बावड़ी–तालाब तक जाता ही नहीं है। नल के रास्ते जल स्रोत उनके घर आते हैं। यही आज आदर्श है। सरकारें इस प्रयास में हैं कि हर किसी को घर में नल से पानी मिलने की सुविधा मिल जाए। ऐसी सुविधा कौन नहीं चाहेगा भला!

कुल जितना पानी इस्तेमाल होता है, उसका 80 फीसदी गंदा हो कर नाली में बह जाता है। सस्ते और सुविधाजनक पानी की यह दुविधा है। इसे साफ करना बहुत महँगा सौदा है। जल प्राप्त करने के लिए हम बड़े–बड़े खर्चे करने के लिए तैयार रहते हैं। आजकल संभ्रांत घरों के चौकों में पीने के पानी को साफ करने के महँगे यंत्र लगे होते हैं। करोड़ों रुपये की विशाल पाइपलाइन और पंपिंग–घर के सहारे हम दूर से पानी खींच के शहरों में लाने लगे हैं। किंतु मैले पानी को साफ करने का खर्च न तो नागरिक देना चाहते हैं, न नगरपालिकाएँ, न सरकारें। कृतघ्न हो गये समाज की यह अनाथ दुविधा है।

यह मैला पानी हमारी गंदगी को ढो कर सीधे नदियों में या भूजल में डाल देता है। देश भर के नदी–तालाब सीवर बन चुके हैं। सफाई अभियानों में स्वच्छता की कीमत जल स्रोत ही चुकाते हैं। बहुत–से गाँवों–शहरों के भूजल में मल–मूत्र के कण पाये जाने लगे हैं। यह समस्या दिन–ब–दिन बढ़ रही है। एक बार जल स्रोत सीवर बन जाते हैं, तब उनकी सफाई की बातचीत शुरू होती है। नदियों की सफाई में हजारों–करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं लेकिन नदियाँ साफ नहीं होती। क्योंकि कृतघ्न ‘विकास’ के नाम पर उनके प्रदूषण के लिए इससे कहीं बड़े खर्चे लाखों–करोड़ में होते हैं।

गंगा नदी और दिल्ली में यमुना को सीवर बने अरसा बीत गया है। बाँधों में बँधी नर्मदा में पानी कम ही रहता है। तरह–तरह के धार्मिक कार्यक्रम बना कर इन्हें साफ करने की कसमें खायी जाती हैं। इनके किनारों को सीमेंट कंक्रीट में ढालने को विकास और धर्म का यज्ञ बताया जाता है। जैसे नदियों का पुराना नाता धरती और मिट्टी से नहीं, पक्के कंक्रीट से रहा है। नदी न हुई, नहर हो गयी! विकास की इस नयी कृतघ्न आँख को शायद ऋषि भागीरथ भी ठेकेदार ही दिखते होंगे!

सभी जानते हैं कि 30 साल से चल रहे नदी स्वच्छता कार्यक्रम ढकोसला भर हैं। कुछ छोटी–मोटी नदियों की सफाई को बड़ी नदियों के लिए ‘मॉडल’ बना के पेश किया जाता है। नदियों पर इतनी बातचीत इसलिए होती है कि यह सुविधाजनक है। सभ्यताएँ नदियों के किनारे भी इसीलिए विकसित हुई – सुविधा के लिए। आज आधुनिक शोध यह बता रहा है कि नदियों किनारे रहना मनुष्य इतिहास में हाल ही में आया है, कि इस धरती पर अपने अस्तित्व का बड़ा हिस्सा हमारी प्रजाति ने नदियों से दूर काटा है। हमारी धार्मिक परंपराओं में ही झाँक लें। आस्तिक परंपरा में ऋषियों के आश्रम वन में बनते थे। नास्तिक परंपरा में तपस्या करने वाले श्रमण भी वनों में ही जाते थे।

हमारा समाज नदी–तालाब की पूजा जरूर करता रहा है। लेकिन उसकी आँख सदा ही बादलों पर रही है। राजस्थान जैसे सूखे प्रांत में बादलों के अनेक नाम प्रचलित रहे हैं, जिनमें 40 नाम तो सामाजिक पत्रकार अनुपम मिश्र ने अपनी एक किताब में ही बताये हैं। हमारा समाज जानता था कि जमीन पर जो भी पानी मौजूद है वह सागर से बादलों के रूप में आता है। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा हैः “सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होई अचल जिमि जिव हरि पाई॥”

जब हम अपनी सीमाओं को मानते थे, तब अपने विकास को प्रकृति के हिसाब से सीमित रखना भी जानते थे। तब हममें असीम विकास की निरंकुश वासना नहीं थी। सुविधा का ऐसा सम्मोहन नहीं था, बल्कि असुविधा को भी अपनाने का पुरुषार्थ था। हम चाहें तो अपने पूर्वजों से आज भी सीख सकते हैं। वैसे आधुनिक विज्ञान भी यही बता रहा है। जल बनाना हमें नहीं आता है। कम–से–कम पानी लूटना और बरबाद करना तो हम रोकें!

One Comment

  1. सोपान जोशी का दृष्टिकोण स्वागत योग्य है । जल ही जीवन है और हम वैदिक काल से प्रार्थना करते आये हैं ” आपो भवन्तु पीतये ” जल औषधि स्वरूप हो पीने के लिए । जोशी जी का आभार ।

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