गांव ,गरीब और आंदोलन के हितैषी हैं लालू -मेधा

अरुण कुमार त्रिपाठी

लालू प्रसाद भ्रष्टाचार और किसी अपराध के लिए कितने दोषी हैं यह तो अंतिम निर्णय आने पर पता चलेगा लेकिन एक बात जरूर तय है कि वे गांव, गरीब और आन्दोलन के हितैषी हैं . यह बात प्रसिद्ध आन्दोलनकारी मेधा पाटकर ने लालू प्रसाद पर एक पुस्तक के विमोचन के मौके पर कही. लालू प्रसाद तब और अब नामक यह ई पुस्तक बिहार के आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए लालू प्रसाद की नये संदर्भों में तलाश है . मेधा पाटकर ने कहा कि उनका अनुभव यह है कि लालू यादव जी ने सदा सेवा, सामाजिक न्याय के लिए कार्य किया तथा वे आजीवन सांप्रदायिकता को चुनौती देते रहे हैं. यही कारण है कि वे आज बीमार होने के बावजूद जेल में है.  उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि एक ट्रेन में पुणे के दलित मजदूर गार्ड के डिब्बे में बैठ गए जिन्हें गार्ड द्वारा ना केवल उतारा गया बल्कि गौ मूत्र डालकर डिब्बे को पवित्र किया गया . रेल मंत्री लालू यादव जी को जब इसकी खबर मिली तो गार्ड को निलंबित किया .  

लालू यादव

  उन्होंने कहा कि वे आंदोलन को गंभीरता से लेते थे. एक बार कुछ मुद्दों को लेकर सात दिन का अनशन उन्होंने मंत्रालय के सामने किया था.लालू जी ने मुख्यमंत्री से बात कर दो बार सरकार के मंत्रियों से बात करायी तथा हल निकाला. मेधाजी ने कहा कि नदियों को जोड़ने  के मामले में उनकी दृष्टि एकदम साफ थी. उन्होंने नदियों को बचाने के लिए नदी जोड़ो परियोजना का विरोध किया. मेधा पाटकर ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान उनकी हजारों बिहार के प्रवासी श्रमिकों से बात हुई . सभी ने एक ही बात कही कि लालू यादव होते तो हमारी यह दुर्गति नहीं होती.
आज इमरजेंसी को याद किया जा रहा है .ऐसे में बिहार आंदोलन ,जेपी को कैसे कोई भूल सकता है .और उन लोगों को भी जो बिहार आंदोलन की धुरी बन गए थे .इनमे एक नाम लालू प्रसाद यादव का भी है .
लालू यादव की बेटी का नाम मीसा रखा गया था क्योंकि जब वह वे उसका जन्म हुआ तो वे जेल में थे मीसा के तहत .यह एक उदाहरण हैं कैसे अचानक राजनीतिक कार्यकर्ताओं को आपातकाल लगते ही जेल में डाल दिया गया था .आज वे लालू यादव फिर जेल में है .पर अब वजह अलग है .पर बिहार की राजनीति में उनकी क्या भूमिका होगी यह अभी नहीं पता . तीस साल बाद पहली बार ऐसा होगा, जब बिहार विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद मैदान में नहीं दिखेंगे.२०२० के विधानसभा चुनाव में बहुत कुछ तय होगा, देश और बिहार की राजनीति के लिए.
 लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले में जेल में बंद हैं. उन पर भ्रष्टाचार के और भी कई गंभीर मामले चल रहे हैं जिनमें फैसला आना अभी बाकी है. ठेठ देसी-बिहारी अंदाज वाले लालू प्रसाद ने १९९० के बाद बिहार के राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य को बदल कर रख दिया. उनकी राजनीति ने कांग्रेस को ऐसा उखाड़ा कि अब कांग्रेस को बिहार में बने रहने भर के लिए लालू प्रसाद की पार्टी की ही उंगली पकड़ कर चलना पड़ रहा है. और, भाजपा भी अपने बूते उतर कर बिहार की सत्ता हासिल करने की सोच नहीं पा रही. २००५ में ज्यादा विधायकों के बावजूद भाजपा को पिछड़े वर्ग से आने वाले नीतीश कुमार को नेता मानना पड़ा. ऐसे समय में वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार की यह पुस्तक लालू प्रसाद के उन दिनों को समझने में महत्वपूर्ण होगी, जब वह अपने उरूज पर थे. और, साथ ही बिहार की राजनीति व उस मोड़ को भी समझने में सहायक होगी, जहां से बिहार ने मौजूदा राह पकड़ी थी. नब्बे के दशक के मध्य दौर में जनसत्ता के कुछ पत्रकारों पिछड़ी जातियों के उभरते हुए नेताओं की सामाजिक राजनीतिक पहचान का अध्ययन किया .फिर लिखा .करीब ढाई दशक बाद इन नेताओं की राजनीति पर फिर नजर डाली गई और नए संदर्भ में उनका नए सिरे से मूल्यांकन कर फिर लिखा गया .
बहुजनसंवाद समाजवादी समागम और हम समाजवादी संस्थाएँ की ओर से आपातकाल, लोकतंत्र और संविधान के निमित्त 25 जून को आयोजित  इस एक दिवसीय वेबनार के अंतिम चरण में पुस्तक का विमोचन किया गया . मेधा जी ने कहा कि आज जब अघोषित आपातकाल चल रहा है तब हमें किसी घटना और व्यक्ति के ऐतिहासिक मूल्यांकन पर जोर देना चाहिए . लालू प्रसाद आपातकाल में जेल गये, उससे पहले जेपी आन्दोलन के सिपाही थे और बाद में भाजपा से जमकर टकराए. इसलिए संभव है उन्हें इसकी सजा मिल रही हो जैसे वरवरराव और जीएन साईबाबा और सुधा भारद्वाज को मिल रही है . उन्होंने लालू प्रसाद के कयी ऐसे प्रसंगों का उल्लेख किया जिसमें उन्होंने नर्मदा आन्दोलन और उनके दूसरे आन्दोलनों की मदद की. कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ समाजवादी नेता डाक्टर सुनीलम ने किया और इसमें  पत्रकार और राजनेता चंचल, पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी,अंबरीश कुमार ,मुंबई से पत्रकार आलोक जोशी,रांची से पत्रकार राजेंद्र तिवारी और अरुण कुमार त्रिपाठी ने हिस्सा लिया . इसमें आपातकाल के अनुभवों और उसके कारणों पर विचार किया गया . वक्ताओं ने आज मीडिया और दूसरी लोकतांत्रिक संस्थाओं  की स्थिति पर अपने विचार रखे और तानाशाही के खतरे के प्रति आगाह किया .यह पुस्तक नाटनल ने ई बुक के रूप में प्रकाशित की है .आवरण मशहूर चित्रकार चंचल ने बनाया है .इसका मूल्य 40 रुपए है .पुस्तक को पढने के लिए निम्न लिंक क्लिक करें .
https://notnul.com/Pages/Book-Details.aspx?ShortCode=IA5SFB7I

 
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