कौवा –उवाच : एक वैज्ञानिक से कौए का संवाद

 

नवरात्र का समापन करते हुए
पूजा पाठ यज्ञ हवन के बाद
प्रसाद ग्रहण कर
खिड़की दरवाजे बंद कर
कुछ सोचते हुए
सामने की खडकी के शीशे पर
चोंच मारते कौवे को देखने लगा
मन में आया कौवा कहीं
रामनवमी का प्रसाद तो नहीं चाहता
एक पूड़ी पर थोड़ा हलुआ रख
कौवा के सामने रख दिया
पूड़ी हलुआ खा कर कौवा बोला
चलिए आपका यह प्रसाद
आपके पितरों तक पहुँच जाएगा
आपके खाते में कुछ पुण्य जमा हो जाएगा

बिरादर दरअसल मै प्रसाद के लालच में
खिड़की पर चोंच नहीं मार रहा था
इधर कई दिनों से बाग़ बगीचों में
गांव नगर में सड़क पर गलियों में
और तमामजगह जहां आदमी हुआ करते थे
वहां आदमी कुछ कम ही दिख रहे थे
मानव प्रजाति को लेकर
शेष जैविक प्रजातियों में भी बेहद चिंता है
कही यह मानव प्रजाति भी तो गुम नहीं होने लगा
हे मानव बिरादर
हम प्राणी और वनस्पति जगत के लोग
बड़े आश्चर्यचकित हैं कि
समस्त जीवजगत का शहंशाह
पालनकर्ता समझने वाला दृष्टा मानव
जो ज्ञानविज्ञान का स्वरूप है अतुलित बलशाली है
बुद्धिनिधान सृष्टि का समाधान है वह शक्तिमान
एक अदने से मरे मुयेजैविक कण कोरोना वाइरस से
भयभीत आतंकित घरों में दुबका है
हे बिरादर तुम्हारी सारी उपलब्धि
परमाणु शक्ति अंतरिक्ष अभियान
मारक प्रक्षेपास्त्र विषैले रसायन
अमृतत्व औषधियां कैसे श्रीहत हो गए
बिरादर आतंकित हो आत्मविश्वास खो
पाषाणकालीन गुफाओं या किसी अन्य ग्रह
की और मत पलायन कर जाना
मानव प्रजाति के इस संकट की घडी में
हम समस्त जीवजगत के लोग तुम्हारे साथ हैं
पर हे परमाधीश्वर मानव एकांतवास करते हुए
उन वाइरसों से भी मुक्ति की चिंता करना
जो बरसों बरस से तुम्हारे
मन -चित –बुध्दि में डेरा जमाएं हैं
जिसके कारण ही आज तुम महाबली
कोरोना वाइरस जैसे मुये से
आतंकित हो प्राण की भीख मांग रहे हो

 

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