अश्वगंधा की खेती कराएं, गरीबी दूर भगाएं

– अजय सिंह भदौरिया “अजेय”

औषधि की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है अश्वगंधा

फतेहपुर। कोरोना महामारी के बाद अश्वगंधा की मांग बढ़ गयी है। हालांकि जनपद में इसका उत्पादन शून्य है। शायद इसी शून्यता को भरने के लिए विजयीपुर ब्लाक के टेसाही गांव के रहने वाले किसान महेन्द्र सिंह भदौरिया ने अश्वगंधा की खेती करने का बीड़ा उठाया। बकौल महेंद्र सिंह औषधीय खेती करने के लिए उन्हें कृषि विभाग के बीटीएम अमरीश भदौरिया ने प्रेरित किया है। किसान ने उनकी इस प्रेरणा और निर्देशों का अक्षरसह पालन किया। 

बीटीएम अंब्रीश की माने तो विदेश में अश्वगंधा की खेती की मांग सात हजार टन प्रति वर्ष है। भारत में इसका 1600 टन के लगभग उत्पादन होता है। टेकारी गांव के किसान ने पांच बीघे जमीन पर अश्वगंधा की खेती शुरू की है। इसकी खेती के बीज किसान ने कानपुर से मंगवाए हैं। महेन्द्र कहते हैं कि कृषि विभाग के अमरीस सिंह भदौरिया की मदद से औषधीय खेती के लिए हमने अपने खेतों को तैयार किया है। अगर सबकुछ ठीक-ठाक रहा तो अगले वर्ष बड़े पैमाने पर इसकी खेती करायेंगे।

उद्यान अधिकारी राम सिंह यादव कहते है कि खेती की तैयारी से लेकर बीज और फसल तैयार होने तक एक हेक्टेयर में तकरीबन 30 हजार तक खर्च आता है, जबकि इसका शुद्ध मुनाफा एक लाख से सवा लाख तक होगा।

क्या है अश्वगंधा-
अश्वगंधा एक औषधीय पौधा है। इसे बलवर्धक, स्फूर्तिवर्धक, स्मरणशक्ति वर्धक, तनाव रोधी, कैंसररोधी के साथ ही ये मनुष्य की इम्यूनिटी को भी मजबूत करता है। आयुर्वेद चिकित्सा में इसकी जड़, पत्ती, फल, और बीज औषधि के रूप में उपयोग किया जाता है।

बीज की मात्रा-
अश्वगंधा के बीज को डायथेन एम-45 से उपचारित करते हैं। एक किलोग्राम बीज को शोधित करने के लिए 3 ग्राम डायथेन एम. का प्रयोग किया जाता है।

रोपण की विधि-
अश्वगंधा की रोपाई के समय दो पौधों के बीच में 8 से 10 सेमी की दूरी होनी चाहिए तथा पंक्तियों के बीच 20 से 25 सेमी. की दूूरी रहना जरूरी होता है। बीज की बुआई एक सेमी. से ज्यादा गहराई पर नहीं की जानी चाहिए।

फसल सुरक्षा-
अश्वगंधा पर रोग व कीटों का विशेष प्रभाव नही पड़ता। कभी-कभी माहू कीट रोग से फसल प्रभावित होती है। ऐसी परिस्थिति में मोनोक्राटोफास का डायनेन एम-45, तीन ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर बुआई के 30 दिन के अंदर छिड़काव करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर 15 दिन के अंदर दोबारा छिड़काव किया जाना चाहिए, जिससे फसल सुरक्षित रह सके।

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