युद्ध में जीतने वाला भी रोता है: रूस-यूक्रेन से ईरान-इज़राइल तक

डीपी शुक्ल

D P Shukla , Journalist Lucknow
DP Shukla , Journalist , Lucknow

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने ‘कुरुक्षेत्र’ में लिखा है 

‘युद्ध नहीं जिनके जीवन में वे भी बहुत अभागे होंगें 

या तो प्रण को तोड़ा होगा या फिर रण से भागे होंगें।’

लेकिन शाश्वत सत्य यही है कि युद्ध कभी अंतिम विकल्प नहीं होता। इतिहास ने बार-बार यह सिखाया है कि युद्ध जीतने वाले भी हारते हैं और हारने वाले तो हारते ही हैं। आज रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। चार बरसों से जारी लड़ाई में दोनों देशों की आर्थिक शक्ति क्षीण हो चुकी है। हजारों सैनिकों और नागरिकों की जानें जा चुकी है। कई शहर खंडहर बन चुके हैं और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य धुंधला हो गया है। फरवरी 2022 में यूक्रेन ने पहली बार रूस पर आक्रमण किया था। वैसे उनके बीच तनातनी साल 2014 से ही चली आ रही थी। लेकिन क्या कोई निष्कर्ष निकला? जवाब होगा- नहीं। 

युद्ध क्यों कभी समाधान नहीं होता

युद्ध का मैदान किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं देता। वह केवल विनाश का विस्तार करता है। यदि समाधान बंदूक की नली से निकलते तो दुनिया अब तक शांत हो चुकी होती। लेकिन इतिहास बताता है, स्थायी हल वार्ता की मेज़ पर बैठकर ही निकलते हैं। बस्तर समेत देश में नक्सली आंदोलन यदि समाप्त हुआ तो उसका श्रेय सलवा जुडूम को दिया जाता है। यानी मिल बैठकर, समझ कर बात करने के बाद का निर्णय। उसी का परिणाम है कि आज देश नक्सल मुक्त हो गया। 
रूस-यूक्रेन संघर्ष से दुनिया को क्या मिला

रूस को आर्थिक प्रतिबंधों, सैन्य खर्च और अवसंरचना क्षति से भारी नुकसान हुआ है। यूक्रेन की स्थिति और भी दयनीय है। शहर तबाह, उद्योग ठप और करोड़ों लोग विस्थापित। युद्ध केवल सैनिक नहीं लड़ते; उसका बोझ नागरिक भी उठाते हैं। वहां की महिलाएं, बच्चे और बुज़ुर्ग। जंग सीमाओं पर लड़ी जाती है, लेकिन उसके फैसले सत्ता के गलियारों में सियासतदां करते हैं। सैनिक जान देते हैं, जबकि राजनीतिक नेतृत्व अक्सर अपने रणनीतिक लाभ, चुनावी समीकरण और भू-राजनीतिक हितों के आधार पर निर्णय लेता है। सैनिकों के जान-माल की उन्हें क्या चिंता?

सवाल उठता है की ईरान से मीलों दूर बैठा अमेरिका उसे नेस्तनाबूद क्यों करना चाहता है? इसका कारण कहीं रक्षा सौदा व्यापार तो नहीं? विश्व राजनीति का एक कठोर सच यह भी है कि रक्षा उद्योग दुनिया के सबसे बड़े व्यापारों में से एक है। हथियारों का व्यापार करने वाले शक्तिशाली समूह कभी भी वैश्विक शांति नहीं चाहते। वे लाभ कमाने के लिए केवल और केवल जंग चाहते हैं। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या लम्बी खिंचती लड़ाइयां वैश्विक हथियार बाज़ार को सक्रिय बनाए रखने का साधन तो नहीं। यह आरोप सिद्ध करना कठिन है, परंतु संदेह की गुंजाइश जरूर है।

सूचना युद्ध और दुष्प्रचार का दौर

युद्ध केवल मोर्चे पर नहीं लड़ा जाता। अब सूचना और दुष्प्रचार भी आधुनिक संघर्ष का हथियार बन चुका है। यह सूचना युद्ध कई बार सैनिकों के मनोबल को तोड़ने में भी सफल हो जाती हैं। ऐसी परिस्थितियों में सत्य सबसे पहले घायल होता है। पिछले दिनों कई बार अयाउल्लाह खामनेई के मरने की खबर आई। लेकिन कई बार वो जिंदा थे। पिछले सप्ताह शनिवार को ईरानी सरकारी टीवी पर एक भावुक होस्ट ने कन्फर्म किया कि हमारे सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई अमेरिका और इज़राइली हवाई हमलों में मारे गए। सरकार ने खामेनेई की मौत पर 40 दिन के शोक और एक हफ़्ते की छुट्टी का ऐलान भी किया है। खामेनेई का जीवन ईरान की राजनीति और साल 1979 की इस्लामी क्रांति से गहराई से जुड़ा रहा है। वे दशकों से सत्ता संरचना के केंद्र में रहे और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद अपने राजनीतिक रुख पर अडिग रहे। 

पश्चिम एशिया में ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है। यह वैश्विक शक्ति-संतुलन की परीक्षा है। सवाल यह है कि अगर यह टकराव खुला युद्ध बनता है तो भारत के लिए उसकी कीमत क्या होगी? और इससे भी बड़ा सवाल, भारत को किसके साथ खड़ा होना चाहिए? भारत की पहली और सबसे बड़ी चिंता ऊर्जा सुरक्षा है। खाड़ी क्षेत्र से आने वाला तेल और गैस हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यदि ईरान में संकट गहराता है, तो तेल आपूर्ति बाधित होगी और महंगाई का दबाव बढ़ेगा। साथ ही लाखों भारतीय प्रवासी कामगारों की सुरक्षा का प्रश्न खड़ा होगा। व्यापारिक समुद्री मार्गों में व्यवधान भी भारत की विकास रफ्तार को प्रभावित कर सकता है।

वहीं पिछले एक दशक में इजराइल के साथ भारत के रक्षा और तकनीकी संबंध अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं। आतंकवाद-रोधी रणनीति, खुफिया सहयोग और अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों में इज़राइल ने भारत की खुलकर मदद की है। हर बड़े आतंकी हमले के बाद इज़राइल ने स्पष्ट रूप से भारत के साथ एकजुटता दिखाई। दूसरी ओर ईरान के साथ भी भारत के रिश्ते ऐतिहासिक और सामरिक रहे हैं। चाबहार बंदरगाह के माध्यम से अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत की पहुंच संभव हुई। ऊर्जा जरूरतों के लिए भी ईरान अहम रहा। परंतु यह भी सच है कि कश्मीर मुद्दे पर ईरान ने कई बार मानवाधिकारों का हवाला देते हुए चिंता जताई। उसने भारत के पक्ष में खुला समर्थन शायद ही कभी दिया। आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई लम्बी और दर्दनाक रही है। 9/11 के बाद अमेरिका ने वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ मोर्चा खोला और भारत के साथ खुफिया सहयोग बढ़ाया। पाकिस्तान पर दबाव बनाने में अमेरिका की भूमिका रही, हालांकि उसकी नीति हमेशा पूरी तरह भारत-केंद्रित नहीं रही। इज़राइल ने आतंकवाद के खिलाफ भारत को तकनीकी और रणनीतिक समर्थन दिया। दोनों देशों के अनुभवों में समानता ने इस साझेदारी को मजबूत किया।

भारत को किस रणनीति की जरूरत

वर्तमान समय को देखते हुए भारत को भी कूटनीतिक चाल चलनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती है संतुलन। भारत को न तो किसी युद्ध में पक्षधर बनना चाहिए, न ही अपनी सामरिक साझेदारियों को दांव पर लगाना चाहिए। सनद रहे इज़राइल के साथ रक्षा सहयोग जारी रहे, पर ईरान के साथ संवाद भी खुला रहे और अमेरिका के साथ वैश्विक मंचों पर समन्वय बना रहे। लेकिन स्वतंत्र विदेश नीति की पहचान  बनानी उतनी ही आवश्यक है। 

पश्चिम एशिया की आग में कूदना समाधान नहीं है। उस आग से अपने हितों को बचाते हुए शांति की आवाज बनना ही भारत की वास्तविक ताकत है। साथ ही पूरी दुनिया को यह स्वीकार करना होगा कि युद्ध समाधान नहीं, बल्कि विफल कूटनीति का प्रमाण है। यदि राष्ट्र अपने मतभेदों को बातचीत से सुलझाने की इच्छा रखें, तो असंभव भी संभव हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों की प्रासंगिकता तभी है जब वे संवाद को प्राथमिकता दें और शक्तिशाली देशों के प्रभाव से ऊपर उठकर शांति का मार्ग प्रशस्त करें। क्योंकि युद्ध सभ्यता को पीछे धकेलता है, जबकि संवाद उसे आगे बढ़ाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व नेतृत्व युद्ध की भाषा छोड़कर बातचीत की भाषा अपनाए। हथियारों से सीमाएं बचाई जा सकती हैं, पर भविष्य नहीं। जब राष्ट्र मेज़ पर बैठते हैं, तभी समाधान जन्म लेते हैं और मानवता बची रहती है। लेकिन यह बातचीत खुलेमन से होनी चाहिए, क्योंकि दबाव की संधि में अगले युद्ध के बीज दब जाते हैं। 

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इसका उदाहरण भी इतिहास में ही है। साल 1914 के प्रथम विश्वयुद्ध के पांच साल बाद वर्साय में ट्रीटी (संधि) हुई। गौरतलब है कि उस विश्वयुद्ध में जर्मनी की बुरी तरह से हार हुई थी। जब इस ट्रीटी के लिए जर्मनी के प्रतिनिधियों को संधिपत्र पर हस्ताक्षर के लिए ले जाया जा रहा था, तब उनके हाथों में हथकड़ियां और पैरों में बेड़ियां जकड़ी हुई थीं। बीच रास्ते में यूरोपियन जनता ने उन पर पत्थर बरसाए, ईंटों से मारा साथ ही उन पर थूका भी। तभी जर्मनी के प्रतिनिधि ने कहा था कि इस संधि पर मैं हस्ताक्षर तो कर रहा हूं, लेकिन मेरा देश यह कभी नहीं भूलेगा कि जबरदस्ती यह संधि हस्ताक्षर हम लोगों से कराए गए।

इतिहासकारों का कहना था कि इस जबरिया संधि में द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज छुपे थे, जिसे हिटलर ने अंकुरित किया और पूरे यूरोप को तहस-नहस कर डाला। इसके प्रमाण साल 1939 में बिहार से प्रकाशित एक अखबार में है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब हिटलर समूचे इंग्लैंड को रौंदते हुए आगे बढ़ रहा था। उसी दौरान गुलाम भारत के बिहार में बसे छपरा में टमटम (घोड़ागाड़ी) पर बैठकर कुछ अंग्रेज जा रहे थे। अंधेरे का धुधलका गहरा रहा था। उसका घोड़ा स्पीड नहीं पकड़ रहा था। हिटलर से खौफजदा अपने अफसरों को जल्दी उनके बंग्ले तक पहुंचाने के लिए भारतीय चपरासी उस घोड़ावान पर दबाव बना रहे थे। लेकिन लाख हंटर मारने पर उसका घोड़ा तेज नहीं दौड़ रहा था। तभी वह गाड़ी से उतरा और एक बांस की कइन (छड़ी) तोड़ते हुए उसे तेजी से मारा और कहा-‘भाग बेटा भाग… उसी तरह भाग जैसे हिटलर इंग्लैंड में सरपट भाग रहा है।’ उसके बाद वह सवारी उतारने के बाद गिरफ्तार हो गया। कारण उसके टमटम में अंग्रेज अफसर सवार थे और उसने ऐसी बात कही। यानी बातचीत के टेबल पर पहुंचने से पहले सभी देशों को अपने मन से मलाल निकालने होंगे, तभी बातचीत का सार्थक परिणाम भी मिलेगा और देश, समाज, मानवता और दुनिया बच पाएगी। 

अंत में राष्ट्रकवि रामधानी सिंह दिनकर की चंद लाइनें और बात खत्म…

हर युद्ध के पहले द्विधा लड़ती उबलते क्रोध से,

हर युद्ध के पहले मनुज है सोचता, क्या शस्त्र ही-

उपचार एक अमोघ है अन्याय का, 

अपकर्ष का, विष का गरलमय द्रोह का!

लड़ना उसे पड़ता मगर औ’ जीतने के बाद भी,

रणभूमि में वह देखता है सत्य को रोता हुआ,

वह सत्य है जो रो रहा इतिहास के अध्याय में

विजयी पुरुष के नाम पर कीचड़ नयन का डालता।

नोट : श्री डीपी शुक्ल लखनऊ में कार्यरत पत्रकार हैं।

लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।

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