Tag: विनोबा
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अंत की सत्ता से परे करता है आत्मज्ञान
संत विनोबा कठोपनिषद अंश पर प्रवचन करते हुए कहते हैं कि हे अंतक, तुम तो खुद ही अंत करने वाले बैठे हो। उस हालत में तुम हमें कुछ दे दो और तुम ही उसका अंत करो इसमें क्या सार है? नचिकेता कह रहा है इसलिए मुझे आत्मज्ञान ही दो तो फिर हम तुम्हारे अंत करने…
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स्वधर्म पालन अत्यंत आवश्यक
संत विनोबा गीता प्रवचन में कहते हैं कि भाइयो, पिछले अध्याय में हमने निष्काम कर्मयोग का विवेचन किया। स्वधर्म को टालकर यदि हम अवांतर धर्म स्वीकार करेंगे, तो निष्कामतारूपी फल अशक्य ही है। स्वदेशी माल बेचना व्यापारी का स्वधर्म है। परंतु इस स्वधर्म को छोड़कर जब वह सात समुंदर पार का विदेशी माल बेचने लगता…
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अखंड दर्शन से मोह-शोक नहीं होता
आज का वेद चिंतन विचार संत विनोबा ईशावास्य उपनिषद के 7वें मंत्र पर कहते हैं कि आज सुबह हम जगन्नाथ दास का भागवत पढ़ रहे थे। उसमें श्रीकृष्ण के अंतकाल के समय कवि कहता है कि अब मैं अनाथ हो गया हूं। उसने देखा कि वह धागा खंडित हो गया है। लेकिन वह उसने उपासना…
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ज्ञानी सभी को आत्मस्वरूप देखता है
संत विनोबा ईशावास्य उपनिषद का मंत्र 7 पढ़ते हुए कहते हैं – *यस्मिन सर्वानि भूतानि आतमैवआभ्रद् विजानतः तत्र को मोह: क: शोक: एकत्वमनुपश्यत। मंत्र छह में बताया कि आत्मज्ञानी अपने में सब भूतों को और सब भूतों में अपने को देखता है। इस तरह जो विश्व और आत्मा को एक-दूसरे से ओतप्रोत देखता है, उसको…
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कर्म वही, परंतु भावना-भेद से आता है अँतर
संत विनोबा गीता प्रवचन करते हुए कहते हैं कि कर्म वही, परंतु भावना-भेद से उसमें अंतर पड़ जाता है। परमार्थी मनुष्य का कर्म आत्मविकासक होता है, तो संसारी मनुष्य का कर्म आत्मबंधक सिद्ध होता है। जो कर्मयोगी किसान होगा, वह स्वधर्म समझकर खेती करेगा। इससे उसकी उदरपूर्ति अवश्य होगी, परंतु उदरपूर्ति हो इसलिए वह खेती…
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आत्मतत्व : अज्ञानी के लिए दूर, ज्ञानी के लिए पास
आत्मतत्व के बारे में बताते हुए संत विनोबा ईशावास्य उपनिषद का पांचवा मंत्र पढ़ते हैं – तदेजति तन्नेजति तद्दूरे तदु अन्तिके तद् अंतरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत: विनोबा कहते हैं कि मंत्र 4 से आत्मतत्व का वर्णन चल रहा है। तद एजति – वह हलचल करता है, तत् न एजति – वह हलचल नहीं…
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फलत्याग को मिलता है अनंत फल
संत विनोबा कर्मयोग पर कहते हैं कि फलत्याग को अनंत फल मिलता है। भाइयो, गीता के दूसरे अध्याय में हमने सारे जीवन-शास्त्र पर निगाह डाली। अब तीसरे अध्याय में इसी जीवन-शास्त्र का स्पष्टीकरण है। पहले हमने तत्वों का विचार किया, अब उनकी तफसील में जायेंगे। पिछले अध्याय में कर्मयोग-संबंधी विवेचन किया था। कर्मयोग में महत्त्व…
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प्राण का आधार कभी खंडित नहीं होता
संत विनोबा बताते हैं कि ईशावास्य उपनिषद के अनुसार प्राण का आधार कभी खंडित नहीं होता। इसलिए प्राण तो रहता ही है परंतु हमें मालूम नहीं होता और प्राणवायु की हलचल समाप्त हुई तो हम कहते हैं कि मनुष्य मर गया। परंतु उसका मतलब इतना ही है कि यंत्र बंद हो गया, अब इस यंत्र…
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प्रकाश से अधिक गति मन की, ईश्वर सबसे गतिवान
आज का वेद चिंतन विनोबा भावे ईशावास्य उपनिषद काचौथा मंत्र पढ़ते हैं – अनेजदेकं मनसो जवीयः नैनददेवा आपप्नुवन् पूर्वमर्षत्तद्धावतोडन्यान् अत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपना मातरिश्वा दधाति। ईशावास्य के प्रथम तीन मंत्रोें में एक पूर्ण जीवन-विचार बताया। 1-ईश्वरनिष्ठा 2-कर्मयोग 3- भोगासक्त जीवन का परिणाम। अब मंत्र 4-5 में आत्मा के स्वरूप का वर्णन है। ईश्वर और आत्मा एक…
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साधना की सभी युक्तियों में भक्ति जोड़ने से स्थितप्रज्ञ की स्थिति
गीता प्रवचन दूसरा अध्याय संत विनोबा कहते हैं कि वह साधना की अपनी सब युक्तियाँ काम में लाये, और फिर भी कमी रह जाये तो उसमें भक्ति जोड़ दे। यह बड़ा कीमती सुझाव भगवान् ने स्थितप्रज्ञ के लक्षणों में दिया है। हाँ, वह दिया है गिने-गिनाये शब्दो में ही। परंतु ढेरों व्याख्यानों की अपेक्षा वह…