दिल्ली NCR में कंक्रीट जंगल का फैलाव, सिकुड़ती नदियाँ और दोआब में विकास की असली कीमत
( मीडिया स्वराज डेस्क) दिल्ली–एनसीआर और आसपास का इलाक़ा—नोएडा, ग्रेटर नोएडा, मेरठ, आगरा, मथुरा, गुरुग्राम, सोनीपत—पिछले डेढ़–दो दशकों में तेज़ी से बदला है। एक्सप्रेसवे, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, वेयरहाउस और टाउनशिप ने रफ्तार पकड़ी है। सवाल यह नहीं कि विकास हो या न हो। सवाल यह है कि क्या विकास सबसे उपजाऊ जमीन और नदी के फ्लडप्लेन पर ही होना चाहिए? और अगर हो रहा है, तो उसकी कीमत कौन चुका रहा है—मिट्टी, पानी, हवा या हमारी सेहत?
दोआब की जमीन: बहु-फसली ताकत से रियल एस्टेट तक
गंगा–यमुना के बीच की पट्टी, यानी दोआब, देश की सबसे उपजाऊ जमीनों में गिनी जाती है। यहाँ साल में दो–तीन फसलें निकलती हैं। पश्चिमी यूपी लंबे समय से दिल्ली-एनसीआर को गेहूं, गन्ना, सब्ज़ी और दूध देता रहा है।
लेकिन एक्सप्रेसवे और शहरी फैलाव के साथ पैटर्न बदला है:
• खेतों का टुकड़ों में बँटवारा (fragmentation)
• बहु-फसली जमीन का स्थायी नुकसान
• किसान के सामने एकमुश्त मुआवजा बनाम नियमित आय का द्वंद्व
भूमि राज्य का विषय है, पर खाद्य सुरक्षा राष्ट्रीय मुद्दा है। अगर उच्च-उत्पादक पट्टियाँ सिकुड़ती हैं, तो असर सिर्फ स्थानीय नहीं रहता।
नदी का फ्लड प्लेन: सांस लेने की जगह कम
दिल्ली में बहने वाली Yamuna के फ्लडप्लेन (Zone-O) का कुल क्षेत्र लगभग 9,700 हेक्टेयर माना जाता है। मीडिया रिपोर्टों में डीडीए सर्वे के हवाले से कहा गया है कि इसका लगभग 75% हिस्सा किसी न किसी रूप में निर्माण/अतिक्रमण से प्रभावित है—यानी करीब 7,000+ हेक्टेयर क्षेत्र प्राकृतिक रूप में नहीं बचा। कुछ रिपोर्टों में 2009 के बाद 2,400+ हेक्टेयर अतिरिक्त विकास का उल्लेख भी मिलता है।

फ्लड प्लेन क्या करता है?
• बाढ़ के समय नदी को फैलने की जगह देता है
• वर्षा का पानी जमीन में समाने देता है (रिचार्ज)
• नदी और भूजल के बीच प्राकृतिक संपर्क बनाए रखता है
जब यही क्षेत्र कंक्रीट में बदलता है, तो बाढ़ का दबाव तेज़ी से ऊपर उठता है, रिचार्ज घटता है और नदी का रास्ता संकरा पड़ता है। 2023 की बाढ़ ने दिखाया कि नदी अपना पुराना विस्तार ढूंढती है—चाहे सामने शहर ही क्यों न हो।
भूजल: रिचार्ज कम, खपत ज्यादा
एनसीआर के कई ब्लॉक “ओवर-एक्सप्लॉइटेड” श्रेणी में बताए जाते रहे हैं—खासतौर पर Gurugram और Sonipat के हिस्सों में। पैटर्न सीधा है:
• कंक्रीट कवरेज बढ़ा → बारिश का पानी जमीन में कम गया
• आबादी/इंडस्ट्री बढ़ी → निकासी बढ़ी
नतीजा—जलस्तर नीचे जाता है। टैंकर अर्थव्यवस्था बढ़ती है। पंपिंग लागत बढ़ती है। यह संकट धीरे-धीरे दिखता है, लेकिन गहरा होता है।
प्रदूषण और स्वास्थ्य: हवा भारी, गर्मी ज्यादा
एनसीआर पहले से वायु प्रदूषण के लिए बदनाम है। अब जोड़िए:
• कंस्ट्रक्शन डस्ट
• एक्सप्रेसवे पर बढ़ता ट्रैफिक
• इंडस्ट्रियल क्लस्टर
खेतों और खुले क्षेत्र कम होने से ग्रीन कवर घटता है और हीट-आइलैंड प्रभाव बढ़ता है—शहर आसपास के ग्रामीण इलाकों से ज्यादा गर्म हो जाते हैं। गर्मी, धूल और प्रदूषण का असर सीधे स्वास्थ्य पर पड़ता है—अस्थमा, एलर्जी, हीट-स्ट्रेस जैसी समस्याएँ बढ़ती हैं।
मिट्टी और नदी की सेहत
दोआब की टॉप-सॉइल सदियों में बनी। निर्माण से पहले यही परत हटती है—जैविक कार्बन और सूक्ष्मजीवों का संसार साथ चला जाता है। मलबा और अपशिष्ट आसपास के खेतों की उत्पादकता घटा सकते हैं। नदी किनारे की प्राकृतिक घास/पेड़ हटने से प्रदूषकों को छानने की क्षमता भी कम होती है।
राष्ट्रीय फ्रेम: सिर्फ NCR की कहानी नहीं
यह पैटर्न सिर्फ दोआब तक सीमित नहीं। देश के कई उच्च-उत्पादक बेल्ट—पंजाब-हरियाणा, महाराष्ट्र के आसपास के कॉरिडोर, दक्षिण के डेल्टा—शहरी फैलाव का दबाव झेल रहे हैं। सवाल उठता है:
• क्या भारत के पास उच्च-उत्पादक कृषि भूमि संरक्षण की स्पष्ट राष्ट्रीय रूपरेखा है?
• क्या फ्लड प्लेन के लिए सख्त, एकसमान मानक लागू हैं?
• क्या शहरी विकास, जल नीति और कृषि नीति आपस में जुड़ी हैं—या अलग-अलग विभागों में बंटी हुई?
क्या रास्ता निकल सकता है?
• उच्च-उपजाऊ पट्टियों के लिए Agriculture Protection Zones
• फ्लड प्लेन पर सख्त नो-कंस्ट्रक्शन/ग्रीन बफर
• हर बड़ी परियोजना में रेन-वॉटर हार्वेस्टिंग + रिचार्ज स्ट्रक्चर अनिवार्य और ऑडिटेड
• भूजल निकासी की रियल-टाइम मॉनिटरिंग
• वर्टिकल शहरीकरण—फैलाव कम, जमीन की बचत
• टॉप-सॉइल संरक्षण के स्पष्ट नियम और निगरानी
अंतिम बात
विकास जरूरी है। सड़कें, उद्योग, रोजगार—सब चाहिए।
लेकिन अगर विकास की रफ्तार नदी की सांस और जमीन की ताकत कम कर दे, तो हमें रुककर सोचना होगा।
दोआब और एनसीआर की कहानी हमें यह पूछने पर मजबूर करती है—
क्या हम आज की रफ्तार के लिए कल की सुरक्षा गिरवी रख रहे हैं?
( With help from AI tools )



