नेपाल में हिन्दू राष्ट्र संभव राजशाही कदापि नहीं

यशोदा श्रीवास्तव
नेपाल में हुई हाल की घटनाओं को राजशाही के आगाज की दृष्टि से देखा जाना मुनासिब नहीं है,हां इसे हिंदू राष्ट्र की बढ़ रही मांग माना जा सकता है। नेपाल राजा शासन के वक्त नेपाल हिंदू राष्ट्र था। वहां मुस्लिम,क्रिश्चियन आदि की आबादी इतनी भी नहीं है कि वे हिंदू राष्ट्र का विरोध करें। इस छोटी समुदाय को हिंदू राष्ट्र से कोई गिला शिकवा भी नहीं रहा। राजशाही खत्म होने के बाद जब लोकतांत्रिक सरकार का गठन हुआ तब संविधान में नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया। यह शासक दलों का अपना फैसला था न कि किसी ने इसकी मांग की थी।
हैरत है कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित होने के बाद कुछ राजनीतिक दलों को हिंदू राष्ट्र की याद आई इसमें नेपाली कांग्रेस भी शामिल है। पिछले आम चुनाव में नेपाली कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने अपने भाषणों में कहा था कि उनकी सरकार सत्ता में आई तो हिंदू राष्ट्र की पुनर्बहाली पर विचार करेगी। बहरहाल नेपाली कांग्रेस सत्ता में नहीं आई। और अभी राजा समर्थक प्रदर्शन के बीच नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशांक कोइराला ने भी हिंदू राष्ट्र के पक्ष में अपनी राय जाहिर की है। नेपाल में जब से लोकतंत्र बहाल हुआ तब से हुए अब तक चार चुनावों में किसी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं नसीब हुआ लिहाजा गठबंधन की सरकारें आती जाती रहीं।
लोकतांत्रिक नेपाल का यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। हैरत है कि वर्ष 2008 से अब तक नेपाल में 13 सरकारें सत्तासीन हुई और सभी मेल गठबंधन से। यहां गठबंधन सरकारों पर गौर करें तो लगभग सभी दल दुश्मन का दुश्मन दोस्त के फार्मूले पर ही सत्तासीन होते रहे। अभी की नेपाली कांग्रेस और चीन समर्थक ओली की एमाले गठबंधन की सरकार भी उसी तर्ज पर है। नेपाली कांग्रेस को भारत का समर्थक माना जाता है।
राजशाही समर्थक नेपाल में 1991 का संविधान फिर से लागू किए जाने,देश में संवैधानिक राजशाही दोबारा लागू करके राजशाही और संसदीय लोकतंत्र एक साथ होने की मांग कर रहे हैं। यह संभव नहीं है। सभी राजनीतिक दलों ने एक स्वर से इस मांग को अस्वीकार कर दिया है। पूर्व पीएम प्रचंड जो हाल की घटनाओं के लिए ओली सरकार को जिम्मेदार मानते हैं उन्होंने भी राजशाही की वापसी की मांग को खतरनाक माना है। प्रचंड ने तो पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र को नारायण हिटी नरसंहार की घटना का जिम्मेदार मानते हुए उक्त घटना की जांच हेतु आयोग के गठन तक की कर डाली। 2001 में नेपाल नरेश स्वर्गीय वीरेंद्र विक्रम शाह सहित संपूर्ण परिवार की उस समय हत्या कर दी गई थी जब यह शाही परिवार साप्ताहिक भोज पर इकट्ठा था। इस घटना का आरोप उनके बड़े बेटे दीपेंद्र पर लगा था। कहा गया कि नशे की हालत में उन्होंने पूरे परिवार की गोली मारी कर हत्या कर खुद को भी गोली मारी ली थी। घायल दीपेंद्र की भी दो दिन बाद मौत हो गई लिहाजा इस घटना की सच्चाई से पर्दा उठने से रह गया। प्रचंड ने ढाई दशक पूर्व की इस घटना की जांच की मांग कर नेपाल की राजनीति में न केवल हलचल मचा दी,वे पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र के निशाने पर आ गए।
यह एक सच्चाई है कि लोकतंत्र बहाली के बाद से गठबंधन और अस्थिर सरकारों ने जनता का कोई भला नहीं किया। जनता में आक्रोश स्वाभाविक है,उसे किसी तीसरे विकल्प की तलाश तो है लेकिन वह राजशाही नहीं हो सकता। हां इस आंदोलन को तब भारी समर्थन मिल सकता था जब स्वर्गीय वीरेंद्र विक्रम शाह जीवित होते। नेपाल राज्याभिषेक परंपरा के अनुसार उनके छोटे भाई ज्ञानेंद्र शाह राजा तो हो गए थे लेकिन जनता में इनकी वह लोकप्रियता नहीं थी जो स्वर्गीय वीरेंद्र की थी। आज भी नेपाल में घर घर स्वर्गीय नरेश विरेंद्र और उनकी पत्नी एश्वर्य राज लक्ष्मी की तस्वीरें टंगी हुई दिख रही हैं। नेपाल में राजा को विष्णु का अवतार माना जाता है इस वजह से वे जनमानस में श्रद्धेय होते हैं।
बेमेल गठबंधन और अस्थिर सरकारों से जनता की नाराज़गी का फायदा राजा वादी समर्थकों ने पूर्व नरेश को आगे कर उठाने की भरपूर कोशिश की। पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र को भी पुन: राजसत्ता का सपना आने लगा। वे भी अपने लोगों के स्वागत समारोहों में शामिल होकर जनता का नायक बताने लगे नतीजा उनके समर्थक कुछ ज्यादा उत्साहित हो उठे। अभी कुछ रोज पहले काठमांडू में जिस तरह की अशांति हुई,उससे पूर्व नरेश के प्रति लोगों में नाराजगी ही दिखी। एक टीवी कैमरामैन सहित दो की हत्या,निर्दोषों के घरों में आगजनी और आते जाते निजी और सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ की घटना को उन अराजक तत्वों का कारनामा माना गया जो पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र के समर्थन में पूरे नेपाल खासकर तराई बेल्ट से आए हुए लोग थे।
फरवरी से लेकर मार्च के अंतिम सप्ताह तक काठमांडू सहित नेपाल के विभिन्न हिस्सों में राजा वादी समर्थकों के कार्यक्रम आयोजित होते रहे हैं जिसमें काठमांडू का कार्यक्रम हिंसक हुआ है। राजा वादियों के समर्थन में जगह जगह भारी भीड़ तो उमड़ी लेकिन इसे पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र के पक्ष में लहर या आंधी नहीं कह सकते। आखिर राजशाही के खिलाफ 1996 से 2006 तक चले जनयुद्ध में आम जनता ही भागीदार रही। हजारों आंदोलनकारियों ने अपनी जान भी दी। ऐसे में राजशाही के समर्थन में इसी जनता का पुन: उठ खड़ा होना न तो संभव है और न ही संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था है। यहां यह भी गौर करने की बात है कि जिन भी देशों में लोकतंत्र स्थापित हुआ वहां चुनी हुई सरकार से लाख मतभेद के बावजूद राजनीतिक दलों ने लोकतंत्र को ही प्राथमिकता दी है। लोकतंत्र को मजबूती देना राजनीतिक पार्टियों की सामूहिक जिम्मेदारी है। नेपाल की राजनीति में राजशाही या हिंदू राष्ट्र की मांग के बहाने जो उथल पुथल मचा है,समझा जाना चाहिए कि नेपाल की राजनीतिक पार्टियां इससे जरूर सबक ली होंगी और वे आपसी मतभेद भुलाकर जनता की भलाई और लोकतंत्र की मजबूती पर अब से जरूर ध्यान देंगी।