राष्ट्रीय नव निर्माण के लिए आम सहमति और सर्वदलीय मंच बनाइए

अराजकता और विप्लव का इंतज़ार न करें

राम दत्त त्रिपाठी,

वरिष्ठ पत्रकार, एवं राजनीतिक विश्लेषक , लखनऊ 

कोरोना वायरस  से  महामारी के इस संकट में  सबसे हैरानी वाली बात मुझे यह लगती है कि हमारे सिस्टम में देश के आम आदमी के रहन- सहन, उसकी समस्याओं और ज़रूरतों  की न तो समझ  है और न ही  समझने की इच्छा है. इच्छा के लिए दिल में संवेदना  चाहिए, जिसका अभाव स्पष्ट दिखता है. दूसरा  राजनीतिक दलों , सरकार  , प्रशासन और न्यायपालिका में जवाबदेही का कोई सिस्टम कारगर रह गया है. सिस्टम से मेरा अभिप्राय समूचे स्टेट के सिस्टम से है, जिसमें विधायिका, राजनीतिक कार्यपालिका, अफ़सरशाही और अदालत सब शामिल हैं. सिस्टम या व्यवस्था में पक्ष विपक्ष सभी शामिल हैं .

सबसे बड़ी वजह यह कि ये सब अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आम आदमी और समाज से दूर रहते हैं. वह अभेद्य सुरक्षा के घेरे में रहते हैं और कोई नागरिक उनसे बराबरी से  आँख मिलाकर बात नहीं कर सकता. वे न पैदल चलते हैं, न साइकिल से और न पब्लिक ट्रांसपोर्ट से, न ही किसी पार्क में टहलते मिलते हैं. ट्विटर पर वायरल  हो रहा यह चित्र देखिए जिसमें एक नागरिक लंदन के  एक पार्क में प्रधानमंत्री बोरिस जोनसन को अपने मन की  सुना रहा है और वह डर नहीं महसूस करता. यहाँ जन मन की बात सुनने की इच्छा ही  नहीं है. सारा संवाद एकतरफ़ा वह भी रेडियो, टीवी या अख़बार के माध्यम से है. आप यहाँ शायद ग्राम प्रधान से भी इस तरह बहस नहीं कर सकते. समाज यह अपेक्षा भी नहीं करता.

व्यवस्था  को इस बात का एहसास ही नही था कि खेती किसानी  घाटे का सौदा होने और परम्परागत ग्रामीण कुटीर उद्योग बर्बाद होने से गाँव उजाड़ हो चुके हैं.  करोड़ों  लोग अपने घर गाँव से पाँच से से लेकर दो हज़ार किलोमीटर दूर रोज़ी रोटी कमाने जाते हैं. और वे बहुत कम पगार पर कष्टकारी  परिस्थितियों में काम करते हैं. 

इनमें से ज़्यादातर के पास न नियुक्ति पत्र होता है , न कोई जॉब सेक्योरिटी . बहुत से लोग अपना खुद का छोटा मोटा कारोबार कर लेते हैं . या फिर स्ट्रीट वेंडर वग़ैरह हैं . किराया देने की क्षमता न होने से एक झुग्गी या कोठरी में कई लोग साझे में रहते और सोते हैं. पानी के लिए हैं पम्प पर लाइन लगाते है. और शौच जाने के लिए भी अपनी बारी का इंतज़ार करना पड़ता है. ये लोग जो आठ दस या पंद्रह बीस हज़ार कमाते हैं, उसका एक हिस्सा गाँव में अपने माँ बाप या पत्नी और बच्चों को गुजर बसर के लिए भेज देते हैं. कोरोना लॉक डाउन में जल्दी ही पैसा खतम हो गया . भूखे मरने के अलावा इस बात का भी डर कि वे वहाँ के माहौल में शारीरिक दूरी नहीं बना सकते और इसलिए वहाँ बीमारी का शिकार होने का ख़तरा अपने गाँव घर से कहीं ज़्यादा है. ऐसे में जान है तो जहान का मतलब उनके लिए हर हाल में अपने घर पहुँचना है. 

बिना तैयारी यकायक लॉकड़ाउन और यातायात बंद होने से वे सहम गए.  पर उन्होंने हफ़्तों भरोसा किया कि सरकार रेल बस चलाएगी और वे घर जा सकेंगे.  मेरे फ़ोन पर हर रोज़ देश भर से लोगों के फ़ोन आते हैं . वे कहते हैं कि खाने को कुछ नहीं है. वे सिर्फ़ यह जानना चाहते हैं कि रेल बस कब खुलेंगी. इन लोगों से आन लाइन पंजीकरण की जो व्यवस्था की गयी उसमें स्मार्ट फ़ोन, डेटा और अंग्रेज़ी का ज्ञान आवश्यक है. ऐसी अपेक्षा करना भी ग़लत है. यही सिस्टम की नासमझी भी दर्शाता है. 

पार्टी मेम्बर बनाने के लिए एक मिस काल पर्याप्त होती है  और संकट  में फँसे लोगों के लिए स्मार्ट फ़ोन पर अंग्रेज़ी का फार्म. मक़सद समझ नहीं आता सिवा इसके कि सबका लेख जोखा रखकर  बाद में चुनाव के समय एहसान भुनाया जाए. 

प्रवासी मज़दूरों के अलावा लाखों ऐसे लोग हैं जो इलाज के लिए दिल्ली, मुंबई गए थे, या बारात लेकर गए थे और वे सब फँसे हैं. उन्हें अपनी गाड़ियों से वापस आने देने में क्या परेशानी थी. वे दूसरे शहर में कहाँ रहें, क्या खाएँ ? इनको अपनी गाड़ी से वापस क्यों नहीं आने दिया गया? 

महीने भर में लोगों का  धैर्य जवाब दे जाना समझा जा सकता है. अब वे सड़क मार्ग से जाने लगे तो बजाय रास्ते में उनके लिए दाना पानी का इंतज़ाम करने  के बजाय पुलिस डंडे मारने लगी.  तब वे पथरीली रेल पटरियों पर चलने लगे और औरंगाबाद में पलक झपने पर कुचल गए. ग़रीबी निशानी के तौर पर सूखी रोटियाँ पटरियों पर बिखरी मिलीं. शायद ही  कोई होगा भारत की सामूहिक  आत्मा को इस हादसे से तकलीफ़  पहुँची . 

अब तो हमें स्वीकार कर लेना चाहिए की देश में कम से कम पचास फ़ीसदी गरीब हैं. लेकिन योजनाएँ बनाने वालों की प्राथमिकताएँ कुछ और हैं. योजनाएँ बनाने वालों के लिए बड़ी – बड़ी  मूर्तियाँ और दिल्ली में नयी संसद , नए प्रधान मंत्री आवास पर बीस पचीस हज़ार करोड़ का बजट आबंटित करने पर ग्लानि नहीं होती.

सिस्टम को यह तो पता होना चाहिए था कि महामारी अथवा पब्लिक हेल्थ की समस्या में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली ही  काम आएगी. मगर निहित स्वार्थ के लिए वहाँ केवल बिल्डिंग बनाने और ग़ैर ज़रूरी मशीनें ख़रीदने पर बजट खर्च किया गया. उदाहरण के लिए हर ज़िला अस्पताल में दो डायलिसिस मशीनें भेजी गयीं . पर डाक्टर , नर्स और टेक्नीशियन नहीं. 

ख़रीद की केंद्रीकृत व्यवस्था का ही परिणाम था कि लखनऊ  किंग जार्ज मेडिकल कालेज और एस जी पी जी आई अस्पताल में पी पी ई तो दूर मास्क तक नहीं थे, और एक नर्स को चिल्लाकर कहना पड़ा. इसी व्यवस्था में महँगे दाम पर ख़राब या अनुपयोगी टेस्ट किट ख़रीदी गयीं. 

यहाँ मैं उन तमाम बातों की चर्चा नहीं करूँगा कि  जब वियतनाम, ताइवान और सिंगापुर जैसे देश कोरोना को कंट्रोल करने में सारा ज़ोर लगाए थे हमारे यहाँ अमरीकी राष्ट्रपति को अहमदाबाद और आगरा घुमाने की क्या ज़रूरत थी ?. उनके साथ जो तमाम लोग आए थे , उनमें भी बहुतेरे संक्रमण का शिकार रहे होंगे. अगर विदेशों  जनवरी अंत में चीन से सूचना आने के बाद हवाई यात्रियों को एयरपोर्ट पर रोक कर पंद्रह दिन का एकांत वास करा दिया जाता, तो क्या वायरस फैलने से रोकने में मदद  नहीं मिलती.?

कोरोना के चलते बाकी रोगी इलाज के लिए मरीज मारे मारे मारे घूम रहे हैं . सरकारी अस्पताल वाले भी उन्हें नहीं देखते . प्राइवेट अस्पताल बंद ही हैं. 

जो नहीं हुआ उसे छोड़िए. जो हो रहा है उस पर गौर कीजिए. जब थूकने से कोरोना वायरस फैलता है तो पान मसाला की बिक्री खोलने का निर्णय  क्या जनता के हित में है? जब सड़क पर अकेले चलने वाले को डंडे पड़ते हैं तो शराब की दुकानों पर लम्बी लाइनें क्यों लगवायी जा रही हैं? क्या यह सब केवल सरकार का राजस्व बढ़ाने के लिए हुआ या किसी का दबाव भी है?

श्रम क़ानून लागू करने की मशीनरी पहले से लुंज- पुंज  थी तो फिर श्रम क़ानूनों को निलम्बित करने की क्या आवश्यकता थी. किन डाक्टरों की सलाह पर काम के घंटे आठ से बढ़कर बारह किए गए. यह दर्शाता है क़ि निर्णय लेने के पीछे किस वर्ग का हित साधा जा रहा है. शायद अभी यह समझ नहीं है की उद्योग व्यापार चलाने और बढ़ाने के लिए पूँजी से कम  महत्व श्रम और तकनीकी विकसित करने वाले का नहीं है. 

न्यायपालिका जिस पर लोगों के जीवन रक्षण के मौलिक अधिकारों के संरक्षण की ज़िम्मेदारी है वह भी सक्रिय भूमिका नहीं निभा रही. या मुँह फेर लेती है.ख़ारिज नहीं किया तो  तारीख़ पर तारीख़.

दीवारों पर साफ़ लिखा दिख रहा है आने वाले कुछ महीनों में चुनौतियाँ अभूतपूर्व और गम्भीर होने वाली हैं. ऐसे में हमारी राष्ट्रीय , प्रांतीय , ज़िला – नगर स्तरीय और क़स्बा या ग्राम स्तर तक प्राथमिकताएँ स्पष्ट होनी चाहिए. 

सर्वोच्च प्राथमिकताएँ 

पहला – कोरोना बीमारी का देश व्यापी फैलाव का रोकथाम और इलाज. विशेषकर तहसील और ज़िला स्तर पर. बड़े पैमाने पर डाक्टरों, नर्सों, तकनिशियनों की भर्ती. 

दूसरा – बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी रोकने के लिए खेती, बाग़वानी, पशुपालन और कुटीर और लघु उद्योगों का जाल बिछाना. 

तीसरा : शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन. लोगों को उत्पादन और तरह – तरह के हुनर सिखाना. इसमें शहरों से लौटे हुनरमन्द लोगों का सहयोग लिए जा सकता है. 

चौथा ; आधुनिक चिकित्सा, आयुर्वेद, विज्ञान , सस्ते और प्राकृतिक सामग्री से भवन निर्माण, परिवहन, सिंचाई, पेय जल और तकनीकी के हर क्षेत्र में शोध को बढ़ावा.

पाँचवा ; राजनीतिक दलों में आंतरिक लोक तंत्र और सेवा  भाव वालों को महत्व.

छठा : ईमानदार और कुशल अधिकारियों को महत्वपूर्ण दायित्व.

सातवाँ – सत्ता एवं  प्रशासनिक विकेंद्रीकरण 

आठवाँ : पर्यावरण सुधार और जल संरक्षण के लिए बड़े पैमाने पर वन उगाना, तालाब, कुओं और झीलों का निर्माण, पुनर्निर्माण.

नौवाँ ; कोयले और पेट्रोल का काम खर्च.सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा को बढ़ावा.

दसवाँ  ; सुरक्षा, अपराध नियंत्रण, दंड और न्याय व्यवस्था को मज़बूत करना तथ इनका भी विकेंद्रीकरण.

ग्यारहवाँ  : राजस्व संग्रह के नए उपाय, जिसमें धनिक वर्ग से अधिक कर लेना. 

देश में जो हालात बन रहे हैं और मुंबई, सूरत, दिल्ली, लुधियाना जैसे बड़े शहरों से कामगार डर के मारे भाग कर गाँव आ रहे हैं, आश्चर्य नहीं होगा अगर अगले एक महीने में कोरोना बीमारी का प्रसार ग्रामीण क्षेत्रों में हो जाए. इसलिए अभी सारा ज़ोर निचले स्तर तक सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ मज़बूत करने पर होना चाहिए. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और ज़िला अस्पताल के स्तर पर त्वरित रिस्पोंस की ज़रूरत होगी. 

शहर और देहात में जो करोड़ों लोग बेरोज़गार हो रहे हैं, जिनके धंधे बंद हो गए हैं, उनके लिए रोज़गार पैदा करना सबसे बड़ी चुनौती है.

उद्योग कारख़ाने बड़े व्यापार छोड़िए केवल शादियों से लगभग पचास हज़ार करोड़ का कारोबार होता है जिसमें कैटरिंग, तम्बू,कनात , कपड़े, ज़ेवर और बैन बाजा आदि में लाखों लोग जीविका पाते हैं. यह सब ठप्प है. बाज़ार बंद होने से तमाम वस्तुओं की खपत नही हो रही है. जैसे लखनऊ में चिकन के कपड़े, साड़ियाँ, जूते, प्रसाधन सामग्री आदि आदि बहुत कुछ. चलने वाले संगठित उद्योग और सरकार में भी वेतन भत्तों में कटौती तय है. इस तरह बेरोज़गारी और आर्थिक मंदी अब एक बड़ी चुनौती बनकर आने वाली है, जिसका सिलसिला नोट बंदी से शुरू हुआ था.

वकील , डाक्टर, आर्किटेक्ट  और न जाने कितने प्रोफेशनल हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं . रेस्टोरेन्ट, होटल , पर्यटन , सिनेमा, मनोरंजन, जिम , ब्यूटी पार्लर , हेयर कटिंग सैलून जाने कितने क्षेत्र अभी लंबी अवधि के लिए प्रभावित रहेंगे . 

आर्थिक मंदी से मिडिल क्लास को भी झटका लगा है. शहरों में जिन लोगों ने अपनी जमा पूँजी से किराए पर चलाने के लिए घर बनवाए, उनकी आमदनी के ज़रिए  होंगे. जो लोग पी एफ़ ग्रेचुटी की एफ़ डी से ब्याज पर खर्च चलाते हैं उनका क्या होगा? या जिनकी पूँजी शेयर बाज़ार में लगी है वे कब तक इंतज़ार करें. 

सदी की सबसे बड़ी आर्थिक मंदी  ने दस्तक दे दिया है जिससे कोई अछूता नहीं रहेगा. न छोटा न बड़ा, न गरीब न अमीर.जब आर्थिक हालात ख़राब होंगे, अपराध  बढ़ सकते हैं.इस परिस्थिति में सामाजिक  असंतोष और जनांदोलन बढ़ना भी सामान्य बात है.उनसे धीरज के साथ व्यवहार करके भरोसे में लेना होगा. लाठी और जेल से काम नहीं चलेगा.इसलिए अपराध नियंत्रण, क़ानून व्यवस्था  और लोक व्यवस्था के लिए भी आने वाले दिन कठिन होंगे. 

विकेंद्रीकरण समय की ज़रूरत 

मेरा मानना है कि विकास और उत्पादन का पूँजी और मशीन प्रधान  केंद्रीकृत माडल फ़्लॉप हो चुका है. शहरीकरण से अन्य अनेक समस्याएँ पैदा हुईं हैं और मनुष्य की मनुष्य या पड़ोसी के प्रति हम दर्दी की भावना क्षीण हो गयी है. कोरोना ने और भी दूरी बढा  दी है.

 हमें इस बात को स्वीकार करना चाहिए.अब हमें उत्पादन, वितरण और शासन तीनों  का  विकेंद्रीकरण करके रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए शहर और गाँव स्थानीय पर आत्म निर्भर बनाना होगा.बड़े शहरों के बजाय छोटे क़स्बों को रोज़गार, उद्योग व्यापार का केंद्र बनाना होगा , जिससे अग़ल बग़ल के गाँवों को जोड़ा जा सके. छोटी – छोटी ग्राम सभाओं का पुनर्गठन कर (न्यूनतम पाँच हज़ार की आबादी ) व्यावहारिक ढाँचा बनाना होगा. इन ग्राम सभाओं के पास अपना सचिवालय हो जिसमें प्रशासनिक, वित्तीय और तकनीकी कर्मचारी हों. प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य और स्थानीय रोज़गार प्रबंध इनके अधीन हो.  

भारत को शिक्षित , अशिक्षित और प्रोफेशनल एजुकेशन वाले यानि सभी लोगों को उनके निवास के आस पास रोज़गार पर ध्यान देना होगा . गाँवों में खेती, बाग़वानी, पशु पालन, कपड़ा एवं अन्य कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना होगा. अब कामगार जल्दी शहर जाने के मूड में नहीं है. शहरी शिक्षित बेरोज़गारों के लिए भी रोज़गार का प्रबंध करना होगा.वहाँ भी विकेंद्रित कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना होगा. बड़े शहरों में नगर निकायों को भी मोहल्ला स्तर पर विकेंद्रीकरण करना होगा. नए नज़रिए और नए सिरे से राष्ट्र निर्माण का व्यापक कार्यक्रम बनाकर अभियान चलाना होगा. 

आज हम दवा, मास्क और छोटी – मोटी हर ज़रूरत के लिए चीन पर निर्भर हैं. लालफ़ीता शाही और करपशन  के कारण भारत के अधिकांश उद्योगपतियों ने अपने कारख़ाने या तो चीन, वियतनाम और दूसरी जगहों पर लगा लिए हैं, या चीन से सस्ता माल मंगाकर बेंचते हैं.  विदेशी पूँजी के नाम पर फ़र्जीवाड़ा बजाय सबसे पहले ऐसा माहौल दिया जाए कि वे अपने कारख़ाने भारत में लगाएँ और जो सामान भारत में बैन सकता है उसका आयात विदेश से न कराएँ. 

राष्ट्रीय सहमति और साझा मंच की ज़रूरत 

लेकिन यह कार्यक्रम कौन बनाएगा. बनाने वालों को क्या ज़मीनी हक़ीक़त पता है? पता कैसे होगी? सारे राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल हाईकमान या व्यक्ति केंद्रित हो गए हैं. सबका रहन – सहन जीवन शैली पाँच सितारा हो गयी है और ज़मीन से कटे हैं.  बाक़ी पार्टी पदाधिकारी केवल खाना पूरी  के लिए हैं. उनसे भी ज़मीनी हालात कोई नहीं पूछता. विधायकों को तो छोड़िए महत्वपूर्ण नीतियों, कार्यक्रमों और निर्णयों में मंत्रियों की भी राय नहीं ली जाती. आज हाई कमान की परिक्रमा करने वाले और पैसे वाले हाई टिकट पाते हैं, जिनके लिए समाज सेवा के बजाय अपने निहित स्वार्थ हैं. बहुत सारी समस्याओं की जड़ हमारी सड़ी हुई राजनीतिक दल प्रणाली और चुनाव में बड़े पैमाने पर खर्च है. नेता मोटा चंदा देने वालों के चंगुल में फँसे हैं.  

नौकरशाही प्रायः ठकुरसुहाती या जी हुज़ूरी में लगी रहती है. जो असहमति दर्ज करेंगे या अपना दिमाग़ लगाएँगे, उनके लिए दाएँ बाएँ बहुत से पद पहले से सृजित किए गए हैं. इस समय डर कुछ ज़्यादा है.  खुलकर राय देने में जोखिम है.वैसे जानकर लोगों का कहना है कि  राय ली भी नहीं  जाती. बस निर्णय सुनाया जाता है वह भी कई बार टेलिविज़न पर.  भारत में इतनी भौगोलिक, आर्थिक , सांस्कृतिक  और राजनीतिक विविधताएँ हैं, कोई एक आदमी कितना ही बुद्धिमान हो सही निर्णय नहीं ले सकता. नोटबंदी उसी की त्रासदी थी.

राष्ट्रीय सहमति के लिए साझा मंच बनें

हमारे देश में केरल से लेकर पंजाब  और तमिलनाडु से लेकर राजस्थान तक आज एक दो नहीं कई सत्ताधारी दल हैं. सब अपने – अपने को छोटे मोटे राजा या महारानी समझते हैं और वैसा ही व्यवहार करते हैं. 

 ज़रूरत है कि आने वाले दिनों के लिए राष्ट्रीय आम सहमति से कार्यक्रम बनें. जब आज़ादी आयी और पंडित नेहरू  और सरदार पटेल ने अपनी कैबिनेट के लिए कांग्रेस के ग्यारह नेताओं की सूची बनायी तो महात्मा गांधी ने उसे अस्वीकार कर दिया. कहा आज़ादी कांग्रेस को नहीं भारत को मिली है, इसलिए आधे मंत्री ग़ैर कांग्रेसी हैं. तब गांधी – नेहरू के  धुर विरोधी डा अम्बेडकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे लोग रखे गए जो न केवल विशेषज्ञ बल्कि तपे तपाए लोग थे जो खुलकर बहस काटने के बाद निर्णय लेते थे. राजनीतिक दलों में भी राजनीतिक आर्थिक प्रस्तावों पर खुलकर बहस होती थी. नीचे से ऊपर तक पदाधिकारियों का चुनाव होता था. उनका अपना व्यक्तित्व होता था और वे खुलकर बोल सकते थे. मनोनीत पदाधिकारी और मंत्री तो येस सर ही  कहेंगे .

संविधान रक्षा की शपथ लेने वाली नौकरशाही को भी फ़ाइल पर अपनी राय प्रकट करने की आज़ादी थी. अभी पचीस तीस साल पहले तक भी यह चल रहा था, क्षत्रपों के उभरने से पहले जो खुद को सर्वज्ञ मानते हैं. अब पहले से बता दिया जाता है की अमुक प्रस्ताव लाओ या यह टिप्पणी लिखो. यहाँ तक क़ि शासन के न्याय और विधि विभाग भी यही करने लगे हैं. 

आज देश में कांग्रेस सिस्टम ख़त्म हो चुका है. अनेक सत्ताधारी दल हैं. अनेक विपक्षी दल हैं.एक पार्टी और एक विचारधारा से संकट की इस घड़ी में देश का नव निर्माण नहीं हो सकता.  महत्वपूर्ण निर्णयों में सभी पार्टियों , मुख्य मंत्रियों और विपक्षी दलों के नेताओं की भागीदारी होनी ही चाहिए.

नोट ; लेखक राम दत्त त्रिपाठी छात्र जीवन में गांधी विनोबा एवं जय प्रकाश नारायण के  विचारों  से प्रेरित रहे.  सर्वोदय और जे पी आंदोलन से जुड़े थे. तभी से पत्रकारिता शुरू कर दी. इमर्जेंसी में डेढ़ साल जेल में रहे.   दैनिक भारत, अमृत प्रभात, संडे मेल और बीबीसी के लिए लम्बे समय तक कार्य किया. नीतिगत  मामलों के अध्ययन में रुचि है. सामाजिक कार्यों और आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं. 

प्रतिक्रिया 

आम सहमति और साझा मंच के लिए संवेदना का होना नितांत आवश्यक है और आपने यह बात स्पष्ट रूप से लिखी है।समवेदना के बिना स्वराज की कल्पना ही नहीं कि जा सकती है। यह लेख हमें बहुत सारे विचारों को साझा करने की बात करता है जिसकी नितांत आवश्यकता है। वर्तमान दौर में सिर्फ बोलने की ही बात दिखायी देती है। प्रत्येक व्यक्ति सिर्फ बोलना ही चाहता है, जनमानस में सुनने की और फिर गुनने की क्षमता को कार्पोरेटी तंत्र ने ध्वस्त कर रखा है। हमने प्रकृति को सुनना बन्द कर दिया है और उसका नतीजा हम भुगत भी रहे हैं। हमारे अन्दर सिर्फ अधिकारों की बात करने व सोचने की समझ पैदा की जा रही है। यह सोच कॉरपोरेटी व्यवस्था के लिए बहुत ही मनमाफ़िक है। यह आवश्यक है कि हम अपने अधिकारों की बात करें परंतु उसके पहले अपने कर्तव्यों की बात कहीं ज़्यादा जरूरी है। यह समय हमें स्वराज के लिए प्रेरित कर रहा है और कह रहा है कि हे मनुष्य अगर तुम अपने आप को बचाना चाहते हो तो यह काम सिर्फ स्वराज के रास्ते ही सम्भव है। गाँधी आज कहीं ज़्यादा प्रासंगिक दिखायी दे रहे हैं परंतु इसके लिए हमें अपनी आँखों से कॉरपोरेटी चश्मा उतारना होगा। अपने मन से नफ़रत की मजबूत होती दीवार को तोड़ना होगा। प्रकृति विजय की अभिमान भरी सोच को छोड़ना होगा और मानना होगा कि हम प्रकृति एक हिस्से हैं न किसी से कम और न किसी से ज़्यादा।अगर हम ऐसा कर सके तभी अपने वजूद को बचाने में सफल हो सकेंगे।
किसी तंत्र से जो ठीक इसके उलट की सोच पर खड़ा हो कैसे स्वराज की बात की जा सकती है, पर यह लम्बी लड़ाई है अपने वजूद को बचाने की। अभी तो हमें सिर्फ रोटी के बारे में सोचना है की कैसे हर भूखे को वह मिल सके और आपने जो हम सभी से साझा किया है उस रास्ते से हम इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। हमारे लोगों में इस समझ की दृष्टि उत्पन्न हो ऐसी ईश्वर से आकांक्षा के साथ
आपका
स्वप्निल , इलाहाबाद  विश्व विद्यालय

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तर्कसंगत है सॅपूर्ण आलेख ।
सामूहिक विचार विमर्श इस आपदा में ठोस परिणाम दे सकता है ।
विलॅबित निर्णय घातक परिणाम दे रहे हैं ।
लघु एवम मध्यम उद्योगों को तत्काल बढावा देना आवश्यक है ।
श्रम को पहली प्राथमिकता देनी होगी । पूॅजी सहायक है ।
ग्रामीण व कस्बे की तरक्की के स्थानीय सॅसाधनो को बढाये जाने की आवश्यकता है ।
विकास की वास्तविक समीक्षा कर मशीनों के सीमित उपयोग तथा प्रकृति का नाश करना तत्काल रोकना होगा ।भारतीय अर्थव्यवस्था का मूल तो गाँव गरीब किसानों मजदूरों श्रमिकों में निहित है । इसे गहराई से अध्ययन किया जाये ।
विमर्श की परॅपरा स्थापन से ही इस बड़ी आपदा का निदान सॅभव है । सामूहिक विमर्श के लिये मत भिन्नता रखने वाले को शत्रु मानने की मानसिकता नहीं चाहिये ।
देवी प्रसाद गुप्ता
मौदहा हमीरपुर उ प्र

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