काहे गइला परदेस
प्रदीप नाथ त्रिपाठी , महराजगंज
सड़को पर चलता हुआ पथिक मंजिल पर पहुँच कर सोच रहा है कि मैं एक विजयी योद्धा हूँ मेरे स्वागत के लिए पूरा नगर अगर नही तो कम से कम परिवार के लोग ही आएंगे.मगर मंजिल भले ही आ गई , पर उसका घर उससे बहुत दूर हो गया ।
वो आज उस प्राचीन काल के उस यात्रियों का दंश झेल रहा है जो सात समंदर पार से आने पर समाज मे झेलना पड़ता था। आज कोरोना का संक्रमण जिस गति से फैल रहा है उसके फैलाव को रोकने के लिए शासन प्रशासन के तरफ से जो सतर्कता बरती जा रही है वो उच्च पदों पर बैठे लोगो का मास्टर प्लान अब कही न कही से फेल होता दिख रहा है।
भारत की आत्मा गाँवो में बसती है गाँव का नागरिक एक जिम्मेदार नागरिक होता है वो अपने परिवार के पालन पोषण के लिए देश विदेश में जाता है एक वर्तमान लेकर जाता है और एक भविष्य की परिकल्पना में दिन रात जी जान लगा के मेहनत करता है. कितनी पीड़ा वेदना को सहकर वो भविष्य की सुखद स्मृतियों के लिए डूबता उतराता रहता है. उसका स्वाभिमान उसको कई बार बहुत कुछ करने से रोकता है पर वो अपने और अपने परिवार के लिए सब समझौता कर लेता है ।
इस विपदा की घड़ी में भी वो समझौता कर लेता पर पेट की आग ने उसे वो करने पर मजबूर कर दिया जो कि गाँव गिराव का एक गरीब कभी न करने की सोचता. कोई मुम्बई से कोई पंजाब से कोई हरियाणा से ,दिल्ली से,कोलकाता से जैसे पाया चल दिया कोई पैदल कोई मिक्सर मसीन में कोई कन्टेनर में कोई सायकल से एक मजदूर जो भविष्य का एक सपना लेकर गया आज उसका सपना किसी बालू की इमारत के जैसी डह गईं . वो सिर्फ अपने अतीत के सपनो में खोया रहा वर्तमान कुछ न रह गया भविष्य उसका एक काली स्याह रात जैसी हो गई ।

कुछ समय पहले सूरीनाम के इतिहास विभाग के प्रोफेसर मोरिस हसन खान जी से एक मुलाकात हुई . उनके पूर्वज एक गिरमिटिया मजदूर के रूप में नील और गन्ने की खेती के लिए सूरीनाम गए और वही के होकर रह गए ।पर पूर्वजों की वो पीड़ा और वेदना क्या होती है एक प्रवासी मजदूर की जब आप मुंशी प्रेमचन्द बनियेगा तब ही अनुभव कर पायेगा।सरकार ने आज कोरेन्टी (संग रोधक) घर मे करने के लिए प्रवासी कामगारों को बाहर न निकलने का फरमान सुना दिया पर. उन्हें क्या पता है कि उस प्रवासी के घर मे इतने कमरे है कि नहीं जहाँ वो अपने आप को कोरेन्टीन कर सकेगा । वो कल अपने भाग्य पर रो रहा था, आज भी वो अपने भाग्य पर रो रहा है . वो अपने अंदर उस कोरोना रूपी दुश्मन से भयभीत है और बार बार वो सोचने पर बरबस ही मजबूर हो रहा है और उसके परिवार के लोग अंततः कहने लगे “काहे गइला परदेस”.




