आज मैंने अपने लैपटॉप के लिए ऑनलाईन एक नया माउस खरीदा। साधारण-सा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण। लेकिन पैकेट खोलते ही उस पर लिखा मिला—Made in China।
यह कोई असाधारण बात नहीं है। आज भारत के बाजार में मिलने वाले अधिकांश छोटे-बड़े इलेक्ट्रॉनिक उपकरण—माउस, कीबोर्ड, मोबाइल एक्सेसरी, चार्जर, एलईडी लाइट—किसी न किसी रूप में विदेशों, खासकर China से आयातित होते हैं।
एक साधारण उपभोक्ता के लिए यह सिर्फ खरीदारी का अनुभव है, लेकिन अर्थव्यवस्था के नजरिये से देखें तो यह एक बड़ा सवाल खड़ा करता है—जब हम रोजमर्रा के इतने छोटे उपकरण भी खुद नहीं बना रहे, तो अपने युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार कहाँ से पैदा करेंगे?
भारत आज दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजारों में से एक बन चुका है। मोबाइल फोन से लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक, यहाँ की मांग तेजी से बढ़ रही है। लेकिन उत्पादन का बड़ा हिस्सा अभी भी बाहर हो रहा है। इसका मतलब यह है कि जिन कारखानों में ये वस्तुएँ बनती हैं, वहाँ रोजगार भी दूसरे देशों में पैदा होता है।
पिछले चार दशकों में China ने इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और उपभोक्ता वस्तुओं के विशाल उत्पादन नेटवर्क खड़े किये। करोड़ों लोगों को कारखानों, सप्लाई चेन और छोटे-बड़े सहायक उद्योगों में काम मिला। बाद में Vietnam और South Korea जैसे देशों ने भी इसी रास्ते पर चलकर बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा किये।
भारत की स्थिति अलग है। यहाँ आर्थिक विकास तो हुआ है, लेकिन रोजगार सृजन उसी अनुपात में नहीं हुआ। सेवा क्षेत्र—आईटी, बैंकिंग, टेलीकॉम—ने अर्थव्यवस्था को गति दी, मगर ये क्षेत्र सीमित संख्या में ही नौकरियाँ देते हैं। बड़े पैमाने पर रोजगार हमेशा विनिर्माण और छोटे उद्योगों से पैदा होता है।
दूसरी बड़ी समस्या हमारी शिक्षा प्रणाली है। हर साल लाखों युवक-युवतियाँ विश्वविद्यालयों से डिग्री लेकर निकलते हैं, लेकिन उद्योगों की शिकायत रहती है कि उनमें आवश्यक कौशल की कमी है। यानी एक ओर डिग्रीधारी बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है और दूसरी ओर उद्योगों को प्रशिक्षित तकनीशियन नहीं मिल रहे।
इसका परिणाम यह है कि भारत में बेरोजगारी और कौशल की कमी एक साथ दिखाई देती है। यह केवल शिक्षा की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे विकास मॉडल का सवाल है।
एक समय था जब खेती, कुटीर उद्योग और छोटे-मोटे स्थानीय उत्पादन गाँवों और कस्बों में रोजगार के स्रोत हुआ करते थे। धीरे-धीरे ये आधार कमजोर हुए और लाखों लोग काम की तलाश में शहरों की ओर बढ़े। शहरों में भी स्थायी रोजगार सीमित हैं, इसलिए बड़ी संख्या में लोग असंगठित और अस्थायी कामों में लगे हुए हैं।
अब तकनीक और डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ एक नई प्रवृत्ति सामने आयी है—गिग अर्थव्यवस्था। लाखों युवक ऐप आधारित डिलीवरी, कैब सेवा और अन्य प्लेटफॉर्म पर काम कर रहे हैं। लेकिन इन कामों में आय अनिश्चित है और सामाजिक सुरक्षा भी बहुत सीमित है।
ऐसी स्थिति में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि भारत की अर्थव्यवस्था भविष्य में सम्मानजनक और स्थायी रोजगार कैसे पैदा करेगी।
एक छोटे-से माउस पर लिखा “Made in China” दरअसल हमें याद दिलाता है कि केवल बाजार बन जाने से किसी देश की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होती। असली ताकत तब आती है जब वही वस्तुएँ अपने कारखानों में बनें, अपने युवाओं को काम दें और उनसे जुड़ी पूरी उत्पादन श्रृंखला देश के भीतर विकसित हो।
अगर भारत को करोड़ों युवाओं के लिए सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराना है तो उसे उपभोक्ता बाजार के साथ-साथ उत्पादन की अर्थव्यवस्था भी बनानी होगी। साथ ही शिक्षा प्रणाली को इस तरह बदलना होगा कि वह केवल डिग्री नहीं बल्कि वास्तविक कौशल दे सके।
क्योंकि अंततः किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थिरता इस बात पर भी निर्भर करती है कि मेहनत करने वाले नागरिक को अपने श्रम का सम्मानजनक प्रतिफल मिल सके। अगर यह भरोसा कमजोर पड़ता है तो आर्थिक समस्या धीरे-धीरे सामाजिक और राजनीतिक चुनौती का रूप ले सकती है।
— राम दत्त त्रिपाठी
(वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक)



