टीबी, प्रदूषण और ड्रग-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया की चुनौती: पद्मश्री प्रो. डॉ. राजेंद्र प्रसाद से बातचीत

राम दत्त त्रिपाठी

Ram Dutt Tripathi
Ram Dutt Tripathi , senior journalist

भारत समेत दुनिया के कई देशों के सामने आज सार्वजनिक स्वास्थ्य की नई और जटिल चुनौतियाँ खड़ी हो रही हैं। टीबी (तपेदिक) का खतरा, तेजी से बढ़ता वायु प्रदूषण, एंटीबायोटिक के दुरुपयोग से पैदा हो रहे ड्रग-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया, और अस्पतालों में फैलने वाले संक्रमण—ये सभी मिलकर स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए गंभीर संकट का संकेत दे रहे हैं।

इन मुद्दों पर वरिष्ठ पत्रकार Ram Dutt Tripathi ने देश के प्रसिद्ध चेस्ट फिजिशियन और टीबी विशेषज्ञ Padmshri Dr Professor Rajendra Prasad से विस्तार से बातचीत की। करीब पौन घंटे चली इस विशेष चर्चा में डॉ. प्रसाद ने न केवल टीबी के इलाज और पहचान में हुई महत्वपूर्ण प्रगति पर प्रकाश डाला, बल्कि प्रदूषण, एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और कमजोर होती रोग प्रतिरोधक क्षमता जैसी नई चुनौतियों पर भी गंभीर चेतावनी दी।

लगभग पाँच दशकों के अपने चिकित्सा अनुभव के आधार पर डॉ. प्रसाद बताते हैं कि टीबी से लड़ाई केवल दवाओं से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए बेहतर चिकित्सा व्यवस्था, प्रदूषण नियंत्रण, जिम्मेदार एंटीबायोटिक उपयोग और स्वस्थ जीवनशैली—इन सभी का एक साथ होना जरूरी है।

टीबी के क्षेत्र में आने का फैसला

डॉ. राजेंद्र प्रसाद बताते हैं कि उन्होंने 1976 में टीबी के क्षेत्र में काम करने का निर्णय लिया। उस समय उनके कई सहयोगियों ने उन्हें सलाह दी कि इस क्षेत्र में आने से उनका करियर सीमित हो सकता है। लेकिन उन्होंने इस सलाह को नज़रअंदाज़ करते हुए टीबी और फेफड़ों की बीमारियों के इलाज को अपना लक्ष्य बनाया।

उनका उद्देश्य केवल चिकित्सक के रूप में काम करना नहीं था, बल्कि टीबी विभाग को आधुनिक पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के रूप में विकसित करना था। समय के साथ उन्होंने इसे एक मजबूत संस्थान के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया।

डॉ. प्रसाद ने बातचीत में यह भी साझा किया कि जब उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किए जाने की सूचना मिली तो वे भावुक हो गए। उनके अनुसार यह सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं बल्कि टीबी और पल्मोनरी मेडिसिन के क्षेत्र में काम करने वाले सभी डॉक्टरों के लिए प्रेरणा है।

टीबी की पहचान और इलाज में प्रगति

पिछले डेढ़ दशक में टीबी की पहचान और इलाज में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। पहले टीबी की जांच और पुष्टि में काफी समय लगता था, लेकिन अब आधुनिक मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक तकनीकों के कारण बीमारी का पता बहुत जल्दी चल जाता है।

डॉ. प्रसाद के अनुसार उपचार के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव आया है। पारंपरिक टीबी उपचार आम तौर पर छह महीने तक चलता था, लेकिन नए शोध संकेत दे रहे हैं कि भविष्य में इसे घटाकर तीन या चार महीने तक किया जा सकता है।

उन्होंने ड्रग-रेजिस्टेंट टीबी (MDR-TB) के खतरे पर भी विस्तार से चर्चा की। उनके अनुसार यह समस्या अक्सर तब पैदा होती है जब मरीज दवा का पूरा कोर्स नहीं करते या उपचार सही तरीके से नहीं लिया जाता। पहले इस प्रकार की टीबी का इलाज कई वर्षों तक चलता था, लेकिन नई दवाओं और बेहतर उपचार प्रोटोकॉल के कारण अब इसे छह से नौ महीनों में नियंत्रित किया जा सकता है।

प्रदूषण और फेफड़ों की बीमारियाँ

बातचीत के दौरान चर्चा पर्यावरणीय कारकों की ओर भी मुड़ी। डॉ. प्रसाद का कहना है कि आज वायु प्रदूषण फेफड़ों से जुड़ी कई बीमारियों के पीछे एक प्रमुख कारण बन रहा है। प्रदूषित हवा से सीओपीडी, अस्थमा और इंटरस्टिशियल लंग डिज़ीज़ जैसी बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।

उन्होंने चेतावनी दी कि केवल हवा ही नहीं, बल्कि पानी और खाद्य श्रृंखला में मौजूद भारी धातुएँ भी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा हैं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने क्रोमियम जैसे धातुओं से होने वाले प्रदूषण का उल्लेख किया, जो पानी और भोजन के माध्यम से शरीर में पहुँच सकता है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता का महत्व

डॉ. प्रसाद के अनुसार टीबी से बचाव में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका इम्यूनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) की होती है। कई बार व्यक्ति टीबी के बैक्टीरिया के संपर्क में आता है, लेकिन बीमारी तभी विकसित होती है जब शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो।

इसलिए स्वस्थ जीवनशैली बेहद जरूरी है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और मधुमेह जैसी बीमारियों का सही नियंत्रण शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में मदद करता है।

अस्पतालों में संक्रमण की समस्या

बातचीत में अस्पतालों के आईसीयू और ऑपरेशन थिएटर में होने वाले संक्रमण का मुद्दा भी उठा। डॉ. प्रसाद ने कहा कि अस्पताल-जनित संक्रमण आज एक बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। इससे बचने के लिए अस्पतालों में कड़े स्वच्छता मानकों और Infection Control Protocol संक्रमण नियंत्रण प्रोटोकॉल का पालन जरूरी है।

उन्होंने यह भी कहा कि मेडिकल शिक्षा में सुधार आवश्यक है ताकि डॉक्टर एंटीबायोटिक का उपयोग जिम्मेदारी से करें। एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल ही ड्रग-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया की समस्या को बढ़ाता है।

दवा का पूरा कोर्स जरूरी

डॉ. प्रसाद ने मरीजों की जिम्मेदारी पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि टीबी या किसी भी संक्रमण के इलाज में दवा का पूरा कोर्स करना बेहद जरूरी है। बीच में दवा छोड़ देने से बैक्टीरिया मजबूत हो जाते हैं और दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं।

सरकार और समाज दोनों की भूमिका

बातचीत के अंत में डॉ. प्रसाद ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण और चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे। साथ ही समाज और व्यक्तियों को भी अपनी जीवनशैली में सुधार लाना होगा।

उन्होंने बेहतर नींद के लिए एक सरल नियम भी बताया—10-3-1 नियम। इसके अनुसार सोने से दस घंटे पहले कैफीन से बचना चाहिए, तीन घंटे पहले भोजन या शराब बंद कर देनी चाहिए और सोने से एक घंटे पहले स्क्रीन का उपयोग नहीं करना चाहिए।

सार्वजनिक स्वास्थ्य का बड़ा प्रश्न

डॉ. राजेंद्र प्रसाद के अनुसार आज टीबी, प्रदूषण और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जैसी चुनौतियाँ आपस में जुड़ी हुई हैं। इनसे निपटने के लिए चिकित्सा व्यवस्था, सरकारी नीतियों और व्यक्तिगत जीवनशैली—तीनों स्तरों पर बदलाव जरूरी है।

यह बातचीत इस बात की याद दिलाती है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य केवल अस्पतालों का विषय नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण, शिक्षा और समाज के सामूहिक व्यवहार से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

कृपया पूरा इंटरव्यू यहाँ सुनें

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