उत्तराखंड की पहाड़ियाँ चेतावनी दे रही हैं और हम ध्यान नहीं दे रहे
शीशपाल गुसाईं , देहरादून
उत्तराखंड का माणा गांव, जो बद्रीनाथ के निकट स्थित है, अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। आज शुक्रवार को यहां से करीब 4 किमी ऊपर हिमखंड टूटने की दुःखद घटना ने न केवल यहां के बीआरओ मजदूरों, को संकट में डाल दिया, बल्कि यह हमें यह सोचने पर भी मजबूर करता है कि हम मानवता कितनी असहाय है जब प्रकृति अपनी पूरी शक्ति का प्रदर्शन करती है।
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आज सुबह माणा गांव में अचानक हिमखंड के टूटने से कई बीआरओ मजदूर दब गए हैं। यह घटना तापमान में अचानक परिवर्तन और लगातार हो रही बारिश का परिणाम है। उच्चतम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ की मोटी परतें, जो कि अक्सर नदियों के लिए जल स्रोत और फसलों के लिए वरदान मानी जाती हैं, अब एक विभीषिका का रूप ले चुकी हैं। भारी बर्फबारी और टूटते हिमखंड ने लोगों के जीवन को खतरे में डाल दिया है। इस क्षेत्र में पांच – पांच से लेकर छह -छह फीट तक बर्फ गिरी हुई है, जिससे सड़कें अवरुद्ध हो गई हैं और आपातकालीन सेवाओं के लिए पहुंचना मुश्किल हो गया है। स्थानीय प्रशासन और बचाव दल राहत एवं बचाव कार्य में जुट गए हैं, लेकिन गहरी बर्फ और कठिन भौगोलिक स्थितियों के कारण उनकी मेहनत को भी चुनौती मिल रही है।
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प्रकृति की इस शक्ति का सामना करने के लिए हमारी तैयारी सब से बौनी साबित होती है। जब भी ऐसे प्राकृतिक कष्ट आते हैं, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि हमें प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलने की जरूरत है। जो बर्फ गिरने वाली होती है, वह हमारे लिए महत्वपूर्ण होती है, लेकिन जब यह बर्फ अपने आप को खतरे में डालने वाली सूरत धारण कर लेती है, तो उसे नियंत्रित करना हमारी सीमाओं के बाहर हो जाता है।
माणा गांव: सांस्कृतिक धरोहर के साथ भारत-तिब्बत सीमा का द्वार
तिब्बत की सीमा माणा गांव से केवल 26 किमी दूर है, जो की भारत के उत्तर में स्थित एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह गांव न केवल अपनी भौगोलिक स्थिति के लिए जाना जाता है, बल्कि इसके अद्वितीय सांस्कृतिक और सामाजिक पहलुओं के लिए भी। माणा गांव, जो कि एक बड़ा गांव है, भारत-तिब्बत क्षेत्र के एक महत्वपूर्ण द्वार के रूप में कार्य करता है। यहां की सड़कें, जो तिब्बत की सीमा तक जाती हैं, की जिम्मेदारी सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) की है। माणा के ऊपर यह हिमस्खलन हुआ है। माणा गांव की एक विशेषता यह है कि शीतकाल में यहां के लोग निचले इलाकों 100 किमी दूर गोपेश्वर के निकट की ओर शिफ्ट हो जाते हैं। यह एक प्रकृति द्वारा बनाई गई प्राचीन परंपरा है, जो स्थानीय लोगों द्वारा सदियों से निभाई जा रही है। इस क्षेत्र में वर्षभर इंडो-तिब्बती सीमा पुलिस (आईटीबीपी), भारतीय सेना और बीआरओ की उपस्थिति रहती है। ये बल न केवल सीमा की सुरक्षा करते हैं, बल्कि आपातकालीन सेवाएं और सहायता भी प्रदान करते हैं। इन बलों की उपस्थिति से स्थानीय लोगों को सुरक्षा का अनुभव होता है, साथ ही इन्हें बाहरी दुनिया से जोड़ने का काम भी करता है। इनकी मौजूदगी यहां की सुरक्षा और संवेदनशीलता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
साहस और समर्पण की मिसाल: संकट में सैनिकों का निस्वार्थ योगदान
इस संकट के समय में, हमारे बहादुर सैनिकों ने अद्वितीय साहस एवं लगन का परिचय दिया। जब अधिकांश लोग हताश हो गए थे, तब हमारे जवानों ने निस्वार्थ भाव से रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। बर्फ में दबे मजदूरों को निकालने के लिए उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर कार्य कर रहे हैं। उनकी साहसिकता और कर्तव्यनिष्ठा सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी।
हिमालयी आपदा 2021: चमोली में 205 लापता, 32 किमी में तबाही, आर्थिक नुकसान 1500 करोड़
चमोली जिले में 7 फरवरी, 2021 को रैणी-तपोवन क्षेत्र में आई आपदा ने इस तथ्य को स्पष्ट कर दिया। इस आपदा ने 32 किलोमीटर के दायरे में व्यापक तबाही मचाई, जिसमें 77 शव और 35 मानव अंग बरामद हुए। 205 लोग लापता हो गए और आर्थिक नुकसान 1500 करोड़ रुपये का आंका गया। इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया कि हिमालयी क्षेत्र में भूगर्भीय हलचल और मानव गतिविधियों के बीच एक घातक संबंध है।
उत्तरकाशी हिमस्खलन 2022: पर्वतारोहण के खतरों की चेतावनी थी
4 अक्टूबर 2022 में उत्तरकाशी में द्रौपदी का डांडा में हुई हिमस्खलन की घटना, जिसमें 27 पर्वतारोहियों की जान चली गई, ने इस समस्या की गंभीरता को और अधिक उजागर किया है।अक्टूबर 2022 की घटना इस बात को दर्शाती है कि किस प्रकार प्राकृतिक आपदाएँ मानव जीवन को अप्रत्याशित रूप से प्रभावित कर सकती हैं। पर्वतारोहण जैसे साहसिक खेलों की बढ़ती लोकप्रियता ने जोखिम को बढ़ाया है, क्योंकि अधिक संख्या में लोग पर्वतों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। हिमस्खलन की घटनाएँ न केवल उन साहसी पर्वतारोहियों के लिए खतरा हैं, बल्कि स्थानीय निवासियों और पर्यटकों के लिए भी चिंता का कारण बन चुकी हैं।
*सूचना एवं लोक संपर्क निदेशालय : पांच बजे शाम तक 32 लोग सुरक्षित रेस्क्यू कर लिए गए हैं शेष 25 लोगों को निकालने का कार्य गतिमान
उत्तराखण्ड सूचना एवं लोक सम्पर्क निदेशालय देहरादून ने अपने फेसबुक पेज पर बताया है कि, आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार चमोली जनपद में बदरीनाथ धाम से 6 किलोमीटर आगे हिमस्खलन में फंसे लोगों के रेस्क्यू हेतु युद्ध स्तर पर राहत एवं बचाव कार्य जारी है। शाम 5:00 बजे तक 32 लोगों को सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया गया है, शेष 25 लोगों को निकालने की कार्रवाई गतिमान है। यही वक्तव्य डीएम चमोली श्री संदीप तिवारी का भी है। आपदा प्रबंधन सचिव श्री विनोद कुमार सुमन ने भी वाट्सएप पर सचित्र पांच पेज के प्रेस नोट में बताया कि वह और उनकी टीम मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर रेस्क्यू कराने के लिए तेजी से काम कर रहे हैं। प्रेस नोट से मालूम पड़ता है कि कल मौसम ठीक होते ही सरकार व वायु सेना बदरीनाथ माणा गांव में होंगी। उप निदेशक सूचना श्री रवि बिजारनिया रात्रि 9 बजे 33 लोगों को सुरक्षित निकालने का उल्लेख कर रहे हैं।
कैसे होता है हिमस्खलन?
हिमस्खलन, वस्तुतः, पर्वत की चोटी से बर्फ और बर्फ के टुकड़ों का अचानक गिरना होता है, जिसके प्रमुख कारणों में तापमान में वृद्धि, जलवायु परिवर्तन, और अव्यवस्थित मानवीय गतिविधियाँ शामिल हैं। जलवायु परिवर्तन ने उत्तराखंड के पारिस्थितिकी तंत्र पर गहरा प्रभाव डाला है, जिससे बर्फ के वितान में असंतुलन उत्पन्न हुआ है। वास्तव में, उत्तराखंड में हिमखंड टूटने की घटनाएँ केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं हैं, बल्कि यह एक संकेत हैं कि हमें अपनी पारिस्थितिकी के प्रति सजग रहना होगा। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने पर्यावरण की सुरक्षा करें और सुरक्षित पर्वतारोहण के लिए उपयुक्त दिशा-निर्देशों का पालन करें, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। हमें प्राकृतिक आपदाओं की गंभीरता को समझते हुए, एक सुरक्षित और स्थायी भविष्य के लिए कमर कसनी होगी। उत्तराखंड की बलवान पहाड़ियाँ हमें चेतावनी दे रही हैं, और हमें इस चेतावनी को गंभीरता से लेना चाहिए।