1929 में गांधी की चेतावनी: हरिद्वार की गंदगी और गंगा प्रदूषण पर यंग इंडिया का लेख
आज जब गंगा के नाम पर Haridwar , Rishikesh हरिद्वार, ऋषिकेश एवं अन्य स्थानों पर विशाल कंक्रीट इमारतें खड़ी की जा रही हैं, नदी किनारे चौड़ी सीढ़ियाँ, कॉरिडोर, रिवरफ्रंट और धार्मिक पर्यटन के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाए जा रहे हैं, तब एक मूल प्रश्न बार-बार सामने आता है—क्या गंगा वास्तव में स्वच्छ हो रही है?
शहरों की अनियंत्रित बढ़ोतरी, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की अधूरी क्षमता, औद्योगिक अपशिष्ट का निरंतर प्रवाह और नदी के प्राकृतिक मार्ग पर बढ़ता encroachment अतिक्रमण आज गंगा की सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं। कई स्थानों पर शोधन के बिना बहता सीवर सीधे नदी में गिरता है। औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले रसायन और भारी धातुएँ जल की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। ऊपर से, तटों का तीव्र कंक्रीटीकरण नदी की प्राकृतिक स्वशुद्धि क्षमता और ground water recharge भूजल पुनर्भरण को कम करता है।
ऐसे समय में 1929 में लिखे गए Mahatma Gandhi के शब्द चौंकाते हैं। उन्होंने Haridwar में गंगा की केवल भौतिक गंदगी ही नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक गंदगी पर भी प्रश्न उठाया था। उनका लेख Young India (31 अक्टूबर 1929) में प्रकाशित हुआ था, जिसमें उन्होंने धार्मिक आडंबर, प्रशासनिक लापरवाही और सार्वजनिक असावधानी—तीनों को गंगा की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहराया।
आज लगभग एक सदी बाद, परिदृश्य बदला है—लेकिन प्रश्न वही हैं। क्या हमने नदी को केवल एक “प्रोजेक्ट” बना दिया है? क्या स्वच्छता का अर्थ केवल सौंदर्यीकरण रह गया है? क्या सीवेज और औद्योगिक प्रदूषण के मूल स्रोतों पर पर्याप्त कठोरता से काम हो रहा है?
गांधी की दृष्टि में गंगा की स्वच्छता केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं थी—वह चरित्र, अनुशासन और सामूहिक जिम्मेदारी का प्रश्न थी। नीचे प्रस्तुत लेख उसी ऐतिहासिक चेतावनी का पुनर्पाठ है।
⸻
गंगा प्रदूषित …..
हरिद्वार में भौतिक व नैतिक गंदगी
॥महात्मा गांधी ॥
मैं बड़ी-बड़ी आशाएँ लगाकर और बड़ी श्रद्धा से प्रेरित होकर हरिद्वार गया था। लेकिन जहाँ एक ओर गंगा की निर्मल धारा ने और हिमाचल के पवित्र पर्वत- शिखरों ने मुझे मोह लिया, वहाँ दूसरी ओर इस पवित्र स्थान पर मनुष्य के कामों से मेरे हृदय को कुछ भी प्रेरणा नहीं मिली।
मैंने हरिद्वार में देखा कि वहाँ नैतिक तथा शारीरिक दोनों ही तरहकी मलिनता है और यह स्थिति देखकर मुझे अत्यन्त दुःख हुआ।
आज भी धर्म के नाम पर गंगा की भव्य धारा दूषित की जाती है। अज्ञानी एवं विवेकशून्य स्त्री-पुरुष गंगा तट पर, जहाँ ईश्वर-दर्शन के लिए ध्यान लगाकर बैठना चाहिए, वहाँ पाख़ाना पेशाब करते हैं।
इन लोगों का ऐसा करना प्रकृति, आरोग्य तथा धर्म के नियमोंका उल्लंघन करना है। तमाम धर्मशास्त्रों में नदियों की धारा, नदी तट, आम सड़क और आमदरफ्त के दूसरे सभी स्थानों को गन्दा करने की मनाही है।
विज्ञानशास्त्र सिखाता है कि मनुष्य के मलमूत्रादि का नियमानुसार उपयोग करने से बहुत बढ़िया खाद तैयार की जा सकती है। आरोग्य शास्त्री कहते हैं कि उक्त स्थानों में मलमूत्रादि का विसर्जन करना मानव-समाज की घोर अवज्ञा करना है। यह तो हुई आलस्य और अज्ञान के कारण फैलनेवाली गन्दगी की बात। लेकिन धर्म के नाम पर जानबूझकर भी गंगाजल गन्दा किया जाता है।
विधिवत् पूजा कराने के लिए मुझे गंगा तट पर ले जाया गया। जिस पानी को लाखों लोग पवित्र समझकर पीते हैं, उसमें फूल, सूत, गुलाल, चावल, पंचामृत वगैरा चीजें इस विश्वास से डाली गई कि यह एक पुण्य कार्य है। मैंने इसका विरोध किया तो पण्डित-सुलभ उत्तर मिला कि यह तो युगों से चली आ रही एक सनातन प्रथा है। इस सबके अलावा मैने यह भी सुना है कि शहर की गन्दी नालियों का गन्दा पानी भी आकर नदी में ही मिलता है; यह एक बहुत बड़ा अपराध है।
यात्रियों की इतनी अधिक भीड़ के रहते हुए भी हरिद्वार का स्टेशन अब तक पुराने ढंग का और रद्दी है। स्टेशनपर यात्रियोंके लिए बहुत ही कम सुविधाएँ हैं। शहरकी गलियाँ संकरी और गन्दी हैं, और मालूम होता है कि रास्तों की मरम्मत नहीं की जाती। इस तरह अधिकारियों और जनता ने हरिद्वार को गन्दा बनाने में कोई कसर उठा नहीं रखी है।
यह तो हरिद्वार की भौतिक गन्दगी की राम-कहानी हुई। मुझे विश्वस्त सूत्र से पता चला है कि वहाँ की नैतिक गन्दगी इससे भो कहीं बढ़-चढ़कर है। हरिद्वार में रात-दिन होनेवाले व्यभिचार की जो बातें मैंने सुनी है, उनका उल्लेख मैं इन स्तम्भों में नहीं कर सकता।
इतना सब होते हुए भी कोई कारण नहीं कि हरिद्वार एक आदर्श तीर्थस्थल न बनाया जा सके। हिन्दू-धर्म को प्राचीन संस्कृति का पुनरुत्थान करने के उद्देश्य से स्थापित तीन शैक्षणिक संस्थाएँ हरिद्वारमें है; (ऋषिकुल, महाविद्यालय और स्व० श्रद्धानन्दजी का गुरुकुल)। इनके सिवाय हरिद्वार में और उसके आसपास अनेक धनाढ्य महन्त भी रहते हैं। ये सब, या इनमें से कोई एक ही संस्था, अगर चाहे तो, हरिद्वार को थोडे ही समय में आदर्श तीर्थस्थान बना सकती है।
जिस सार्वजनिक सभा में मैने हरिद्वार की भौतिक और नैतिक गन्दगी के सम्बन्ध में अपना दुख प्रकट किया था, उसके सभापति आचार्य रामदेवजी ने प्रतिज्ञा करके मुझे आश्वासन दिया है कि वह अपने गुरुकुल काँगड़ी के द्वारा, जिसे हरिद्वार लाया गया है, इन सुधारों के लिए भरसक प्रयत्न करेंगे। कुछ स्थानीय कार्यकर्ता भी इस परिस्थिति को सुधारने के लिए यथाशक्ति कोशिश कर रहे हैं।
जिस हरिद्वार में केवल स्वदेशी शक्कर का ही चलन है, वहीं हर साल सात लाख रुपयों के विलायती कपड़े का आयात किया जाता है। ज्वालापुर में, जो हरिद्वार का एक मुख्य भाग है, शराब और मांस की भी एक-एक दूकान है। कोई कारण नहीं कि हरिद्वार में पूर्ण मद्य-निषेध सफल न हो सके। हिन्दुओं के तीर्थ स्थान में मांस की दूकान का होना तो आश्चर्य ही की बात है। आशावादी आचार्यजी को आशा है कि वे हरिद्वार को स्वच्छ बना सकेंगे और मांस, शराब तथा विदेशी वस्त्र को वहाँ से निकाल सकेंगे। उनको यह आकांक्षा उनके अनुरूप है। ईश्वर करे यह पूरी हो।
अगर गुरुकुल के विद्यार्थी अपने विद्याभ्यास के साथ-साथ धर्म और देश की इस तरह सेवा भी करेंगे तो उनके लिए वह सबसे सच्ची शिक्षा होगी।
यंग इंडिया, ३१-१०-१९२९
स्रोत: संपूर्ण गांधी वांड्मय, खंड: 42, पृष्ठ: 81


