कृषि बिलों से उत्तराखंड के किसानों की संवरेगी किस्मत

कृषि कानूनों को लेकर भले ही हो-हल्ला मचा हो, मगर हकीकत में ये कानून किसानों के व्यापक हित में हैं। उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यही तस्वीर उभर कर सामने आती है। खासकर, पर्वतीय क्षेत्रों के मामले में।

वहां खेती तो हो रही, मगर किसानों में खेती को लेकर व्यावसायिक सोच विकसित नहीं हो पाई है। कृषि कानूनों से उनमें न सिर्फ यह सोच विकसित होगी, बल्कि पौष्टिकता से लबरेज मंडुवा, झंगोरा, राजमा, लाल चावल जैसे कृषि उत्पादों का उत्पादन बढ़ेगा। साथ ही तमाम कंपनियां और संस्थाएं इन कृषि उत्पादों की खरीद के लिए किसानों की चौखट तक पहुंचेंगी।

विषम भूगोल वाले उत्तराखंड में किसानों की संख्या 8.81 लाख है। इनमें 93 फीसद लघु एवं सीमांत किसान हैं, जिनके पास छोटी-छोटी जोत हैं। ऐसे किसानों की संख्या सर्वाधिक पर्वतीय क्षेत्र में है, जहां के जैविक कृषि उत्पाद पौष्टिकता से लबरेज हैं। बदली परिस्थितियों में स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से इनकी मांग भी है। बावजूद इसके पर्वतीय क्षेत्र में खेती व्यावसायिक आकार नहीं ले पाई है। ऐेसे में कृषि कानूनों के धरातल पर उतरने से यहां के किसानों को फायदा होगा।

अभी तक यहां के किसान अपनी कृषि उपज को राज्य में संचालित 27 कृषि मंडियों में बेचते आ रहे थे। अब उन्हें कहीं भी उपज को बेचने की आजादी है। यही नहीं, कृषि उत्पादों की खरीद को नए खरीदार भी उनसे संपर्क करेंगे। जाहिर है कि बाजार मिलने पर उन्हें उपज के अच्छे दाम मिलेंगे और वे कृषि उपज बढ़ाने पर भी ध्यान केंद्रित करेंगे।

एसजीआरआर पीजी कॉलेज देहरादून के अर्थशास्त्री और प्राचार्य प्रो. वीए बौड़ाई ने कहा, उत्तराखंड की परिस्थितियां देश के अन्य हिस्सों से एकदम अलग हैं। यहां के पहाड़ी क्षेत्र को देखें तो वहां कृषि जीवन यापन का एक आधार तो है, मगर यह अभी तक व्यावसायिक आकार नहीं ले पाई है। कृषि बिलों से किसानों को लाभ मिलेगा। कृषि उत्पादों की खरीद को तमाम कंपनियां व संस्थाएं उनसे संपर्क करेंगी। इससे यहां के कृषि उत्पादों को देश-दुनिया में बाजार तो मिलेगा ही किसानों को अच्छी आमदनी भी होगी। आने वाले दिनों में कृषि कानून यहां की ग्रामीण आर्थिकी संवारने की दिशा में बड़ा कदम साबित होंगे।

कृषि विभाग के उप निदेशक (विपणन) डीके सिंह ने बताया कि कृषि कानून उत्तराखंड के किसानों के व्यापक हित में हैं। अभी तक वे मंडी क्षेत्रों के अंतर्गत ही अपनी कृषि उपज को बेचते थे, लेकिन अब वे कहीं भी उपज बेच सकते हैं। इसका सर्वाधिक फायदा यहां के लघु और सीमांत किसानों को मिलेगा।

निरंतर हो रही धान की खरीद
उत्तराखंड में धान की खरीद लगातार हो रही है। कृषि विभाग के उप निदेशक विपणन डीके सिंह बताते हैं कि राज्य में धान खरीद के लिए 45 खरीद केंद्र खोले गए हैं। इनमें न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर ए-श्रेणी का धान 1888 रुपये और सामान्य श्रेणी का धान 1868 रुपये प्रति कुंतल के हिसाब से किसान बेच रहे हैं। यह खरीद खाद्य विभाग कर रहा है।

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