किसानों को चूंकि वजीर-ए-आजम मोदी और उनकी सरकार पर एतबार नहीं है इसीलिए मोदी के एलान के बाद भी किसान यूनियनों ने लखनऊ की पंचायत से छब्बीस नवम्बर को आंदोलन का एक साल पूरा होने के सिलसिले में गाजीपुर, सिंघु और टिकरी बार्डर्स पर अपने सभी प्रोग्राम जारी रखे।
हिसाम सिद्दीकी
नई दिल्ली: वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने अचानक तीनों किसानी बिलों को वापस लेने का फैसला करके उसका एलान भी कर दिया। इसके बावजूद किसान यूनियनें वजीर-ए-आजम मोदी का एतबार करने के लिए तैयार नहीं हैं।
संयुक्त किसान मोर्चा ने साफ कह दिया है कि एमएसपी पर कानूनी गारण्टी, लखीमपुर में चार किसानों को कुचल कर मारने वाली गाड़ी के मालिक मरकजी मिनिस्टर आफ स्टेट अजय मिश्रा उर्फ टेनी की बर्खास्तगी, आंदोलन के दौरान किसानों के खिलाफ दर्ज मुकदमात की वापसी, आंदोलन के दौरान शहीद तकरीबन सात सौ किसानों के घरवालों को माली मदद, पेंडिंग बिजली संशोधन, बीज कानून और दूध पर बनने वाले कानून जैसे मसायल हल कराए बगैर किसान अपना आंदोलन खत्म नहीं करने वाले हैं।
किसानों का मोदी पर एतबार न करने की दूसरी बड़ी वजह किसान यह बताते हैं कि मोदी ने एलान किया था कि 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी कर दी जाएगी। 2022 शुरू होने वाला है। अब तक आमदनी में इजाफे की कोई कार्रवाई शुरू नहीं हुई है। तीसरी वजह है मोदी के कुछ बड़बोले खुशामदी पार्टी लीडरान और टीवी चैनलों में बैठे लोग, राजस्थान के गवर्नर कलराज मिश्र और उन्नाव से लोक सभा मेम्बर सच्चिदानंद साक्षी ने तो साफ कह दिया है कि हालात ठीक होने पर किसानी बिल दोबारा लाए जाएंगे।
मरकजी वजीर और गाजियाबाद से लोक सभा मेम्बर वीके सिंह ने जिस अंदाज में अब किसानी बिलों की तारीफें की हैं, उससे भी लगता है कि बिल दोबारा लाए जाएंगे। ऐेसे सियासतदानों के साथ-साथ मोदी की गुलाम मीडिया भी मामलात को खराब करने में पूरा तआवुन कर रहा है।
खबरें चला दी गईं कि किसान आंदोलन में खालिस्तानियों के शामिल होकर देश को सन् अस्सी की दहाई में ले जाने का खतरा था इसलिए मुल्क के मफाद में पीएम मोदी ने किसानी कानून वापस लेने का फैसला कर लिया। किसान इस खबर से बहुत नाराज हैं।
किसानों को चूंकि वजीर-ए-आजम मोदी और उनकी सरकार पर एतबार नहीं है इसीलिए मोदी के एलान के बाद भी किसान यूनियनों ने लखनऊ की पंचायत से छब्बीस नवम्बर को आंदोलन का एक साल पूरा होने के सिलसिले में गाजीपुर, सिंघु और टिकरी बार्डर्स पर अपने सभी प्रोग्राम जारी रखे।
माहिरीन का ख्याल है कि अगर मोदी तानाशाही न दिखाते और ये तीनों कानून लाने की तरह ही इन्हें वापस लेने का एलान अपनी मर्जी से न किया होता तो किसान नुमाइंदों और सरकार के दरम्यान बाकायदा मीटिंग और राय मश्विरा करके यह तीनों कानून वापस लिए होते तो शायद किसानों पर भी एखलाकी (नैतिक) दबाव रहता और वह दूसरे मतालबात के साथ अपना आंदोलन जारी रखने के बजाए वजीर-ए-आजम के एलान के बाद आंदोलन खत्म कर देते।
बाकी तमाम मुद्दों पर बातचीत जारी रह सकती थी। अब यकतरफा एलान करके मोदी खुद ही फंस गए हैं। पार्लियामेंट के सर्दी के एजलास में वह कानून भी वापस लेंगे और किसान अपनी बात के साथ-साथ आंदोलन भी जारी रखेंगे।
वजीर-ए-आजम मोदी ने अगर उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड और पंजाब असम्बली एलक्शन के पेशनजर अचानक किसानी कानूनों को वापस लेने का एलान किया है तो शायद वह बड़ी गलतफहमी में हैं। इन सभी जगहों के आम वोटर अब तक बीजेपी से इतनी दूर जा चुके हैं कि फिलहाल उनकी वापसी की कोई उम्मीद नहीं है। इसकी बड़ी वजह महंगाई, बेरोजगारी और मोदी के जरिए किए गए वादों का पूरा न होना है। अब किसान तबका किसी भी कीमत पर भारतीय जनता पार्टी और इसके लीडरान पर एतबार करने के लिए तैयार नहीं है।
गैस, डीजल, पेट्रोल की कीमतों और बिजली के बिलों में हुए बेतहाशा इजाफे का भी किसान तबके पर बहुत गहरा असर पड़ा है। किसानों का कहना है कि मोदी सरकार कुछ किसानों को सम्मान निधि के नाम पर दो-दो हजार रूपए चार महीनों में देती है। हमें इसकी जरूरत नहीं है। हम तो यह चाहते हैं कि हमें गैस सस्ती मिले, बिजली के बिल पहले जैसे हों और डीजल सस्ता हो ताकि हम ट्रैक्टरों का इस्तेमाल आसानी से कर सकें।
किसानों को सरकार पर इसलिए भी एतबार नहीं है कि एक तरफ किसानों का आंदोलन जारी रहा, दूसरी तरफ मोदी के धन्नासेठ दोस्त गौतम अडानी की कम्पनी के गोडाउन भी तेज रफ्तारी के साथ तामीर होते रहे। जाहिर है उन गोडाउन्स में मवेशी तो रखे नहीं जाएंगे, गल्ला ही स्टोर होगा।
कांग्रेस लीडर राहुल गांधी ने बारह जनवरी को ही कहा था कि सरकार को यह किसानी कानून हर सूरत में वापस लेने ही पड़ेगे। राहुल गांधी ने कहा था कि आप मेरी बात लिख लीजिए मोदी सरकार को ये तीनों काले कानून वापस लेने ही पड़ेगे। अब कांग्रेस मोदी के एलान को अपनी जीत बता रही है।
मेघालय के गवर्नर सत्यपाल मलिक ने भी बार-बार मोदी से कहा कि यह कानून वापस ले लीजिए वर्ना सियासी एतबार से बीजेपी तबाही तक पहुच जाएगी। देश ही नहीं अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा, आस्ट्रेलिया, यूरोपियन यूनियन समेत कम से कम बारह मुल्कों की पार्लियामेंट में भारत के किसानों के आंदोलन का जिक्र हुआ। इसपर तश्वीश जाहिर की गई, किसानों के साथ हमदर्दी जाहिर की गई, लेकिन वजीर-ए-आजम मोदी पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वह और उनके लोग किसान आंदोलन का मजाक ही उड़ाते रहे। वही मजाक उन्हें महंगा पड़ गया।
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