वरिष्ठ गांधीवादी और पर्यावरण चिंतक डेविड भाई का निधन, लक्ष्मी आश्रम कौसानी से था गहरा जुड़ाव

कौसानी, उत्तराखंड | 9 मार्च 2026

आज सुबह जब हिमालय की चोटियों पर भोर की पहली किरण भी नहीं पहुँची थी, तभी कौसानी के लक्ष्मी आश्रम में एक ऐसी सात्विक लौ शांत हो गई जिसने पिछले पाँच दशकों से पहाड़ की बेटियों, समाज और हिमालयी पर्यावरण को अपने कर्म से आलोकित किया था।

प्रख्यात भूगोलविद, पर्यावरण प्रेमी और समर्पित गांधीवादी डेविड जेरार्ड हॉपकिंस (डेविड भाई) का 78 वर्ष की आयु में आज सुबह लगभग 4 बजे कौसानी स्थित लक्ष्मी आश्रम में निधन हो गया। उनके निधन की खबर फैलते ही देश भर के सामाजिक कार्यकर्ताओं, गांधीवादियों, पर्यावरण प्रेमियों और भूगोलविदों में शोक की लहर दौड़ गई।

लंदन में जन्म, लेकिन हिमालय में मिला जीवन का अर्थ

9 दिसंबर 1947 को लंदन में विनीफ्रेड और ग्लिन हॉपकिंस के घर जन्मे डेविड भाई की जीवन यात्रा एक असाधारण कहानी रही।

मिडलसेक्स और केंट के स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने 1969 में ब्रिस्टल विश्वविद्यालयसे भूगोल में बीए ऑनर्स किया और 1971 में लीड्स विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट सर्टिफिकेट ऑफ एजुकेशन प्राप्त किया।

यात्रा और पहाड़ों के प्रति गहरे आकर्षण ने उन्हें यूरोप से होते हुए एशिया की ओर खींचा। 1970 में वे सड़क मार्ग से तुर्की और अफगानिस्तान के दुर्गम खैबर दर्रे को पार कर भारत पहुँचे। गांधीजी के शिक्षा संबंधी आदर्शों और सरला बहन के कार्यों से प्रेरित होकर वे 1972 में पहली बार कौसानी आए और अंततः 1981 में यहीं स्थायी रूप से बस गए। बाद में उन्होंने भारत की नागरिकता भी ग्रहण कर ली।

हालाँकि उनका जन्म लंदन में हुआ था, लेकिन उनके जीवन का बड़ा हिस्सा हिमालय और यहाँ के लोगों के बीच बीता। धीरे-धीरे वे पूरी तरह भारतीय जीवन पद्धति में रच-बस गए।

सेवा पथ की सहचरी: हंसी बहन

डेविड भाई के जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय उनका विवाह भी था।

उन्होंने लक्ष्मी आश्रम की समर्पित कार्यकर्ता हंसी बहन से विवाह किया। यह केवल एक वैवाहिक संबंध नहीं, बल्कि दो समर्पित आत्माओं का ऐसा संगम था जिसने अपना जीवन गांधीवादी सर्वोदय और समाज सेवा को समर्पित कर दिया।

उनके निधन से हंसी बहन को गहरी व्यक्तिगत क्षति पहुँची है।

लक्ष्मी आश्रम के स्तंभ

लक्ष्मी आश्रम कौसानी के साथ उनका रिश्ता केवल कार्य तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें गहरा अपनापन था।

आश्रम की वरिष्ठ गांधीवादी राधा भट्ट के साथ मिलकर उन्होंने आश्रम के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सर्वोदय मंडल के साथियों के अनुसार वे राधा बहन के “आँख, नाक और कान” की तरह थे।

वे प्रतिदिन समय पर आश्रम के कार्यालय पहुँचते, छात्राओं को पढ़ाते, खादी भंडारों के संचालन में सहयोग करते और शाम की प्रार्थना में नियमित रूप से शामिल होते थे।

खादी के प्रसार और आश्रम की गतिविधियों को व्यवस्थित ढंग से संचालित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। आश्रम परिवार उन्हें अपने प्रमुख स्तंभों में से एक मानता है।

एक वैज्ञानिक का सलीका और साधक की सादगी

भूगोल के विद्यार्थी होने के कारण डेविड भाई को प्रकृति, पर्यावरण और उसके बदलावों का गहरा ज्ञान था।

उनके पास दशकों से संकलित वर्षा, हिमपात और तापमान का विस्तृत डेटा था, जो हिमालयी पारिस्थितिकी को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

उन्होंने सरला बहन की जीवनी का अंग्रेज़ी में अनुवाद कर उनके विचारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने में भी योगदान दिया।

उनकी यात्राओं के संस्मरण और 1970 की ऐतिहासिक सड़क यात्रा की दुर्लभ तस्वीरें भी एक अमूल्य धरोहर मानी जाती हैं।

एक सादगीपूर्ण जीवन की विरासत

शांत स्वभाव, सादगीपूर्ण जीवन और अपने काम के प्रति गहरी निष्ठा के कारण डेविड भाई सबके प्रिय थे।

राधा भट्ट ने मीडिया स्वराज से कहा ,”डेविड भाई ने सरला बहन की तरह अपना पूरा जीवन और शरीर हिमालय की सेवा में अर्पित कर दिया . “

अब वे हमारे बीच भले ही प्रत्यक्ष रूप में नहीं हैं, लेकिन उनका जीवन, उनके विचार और हिमालय तथा समाज के प्रति उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

पहाड़ों के इस सच्चे साधक और हिमालय के इस “सफेद फकीर” को विनम्र श्रद्धांजलि।

— बसंत पांडे की फेसबुक पोस्ट पर आधारित | संपादन: मीडिया स्वराज डेस्क

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