भारत में सार्वभौमिक मताधिकार: आज़ादी के संघर्ष से जन्मा वोट का अधिकार और आज SIR पर उठते सवाल
राम दत्त त्रिपाठी
भारत में आज नागरिकों के मताधिकार को लेकर गहरी बेचैनी है।
SIR (Special Intensive Revision) के ज़रिए मतदाता सूचियों की सघन जाँच हो रही है और बड़ी संख्या में लोगों के नाम तकनीकी कारणों से वोटर लिस्ट से हटाए जा रहे हैं।
कहीं काग़ज़ पूरे नहीं,
कहीं पते पर आपत्ति,
कहीं प्रवासी होने का संदेह।
ऐसे में यह सवाल बेहद ज़रूरी हो जाता है—
क्या भारत ने अपने लोकतंत्र की शुरुआत ही नागरिकों पर संदेह से की थी?
या फिर भरोसे से?
इसका जवाब हमें संविधान सभा से भी पहले,
आज़ादी के संघर्ष में मिलता है।
मताधिकार: संविधान की नहीं, आंदोलन की उपज
यह एक आम ग़लतफ़हमी है कि
हर बालिग़ को वोट देने का अधिकार
संविधान सभा की देन है।
सच्चाई यह है कि—
सार्वभौमिक मताधिकार भारत की आज़ादी की लड़ाई का वैचारिक हिस्सा था।
स्वतंत्रता की कल्पना सिर्फ़ सत्ता हस्तांतरण नहीं थी,
बल्कि जनता को राजनीतिक मालिकाना हक़ देने का विचार थी।
कांग्रेस और मताधिकार: आज़ादी से पहले की सोच
नेहरू रिपोर्ट और शुरुआती बहसें
1928 की नेहरू रिपोर्ट में भले ही व्यावहारिक सीमाएँ थीं,
लेकिन दिशा साफ़ थी—
भारत का भविष्य सीमित लोकतंत्र नहीं हो सकता।
यहीं से यह सोच मज़बूत हुई कि
राजनीतिक अधिकार किसी वर्ग की बपौती नहीं होंगे।
1931 का कराची अधिवेशन: निर्णायक मोड़
1931 Indian National Congress के कराची अधिवेशन ने महात्मा गांधी द्वारा पेश प्रस्ताव में
आज़ाद भारत की राजनीतिक आत्मा को शब्द दिए।
यहाँ कांग्रेस ने कहा—
• नागरिक क़ानून के सामने बराबर होंगे
• राज्य सामाजिक और आर्थिक न्याय का ज़िम्मेदार होगा
• लोकतंत्र जनता की भागीदारी पर आधारित होगा
संदेश बिल्कुल साफ़ था—
👉 आज़ाद भारत में अधिकार जन्म, जाति, संपत्ति या शिक्षा से तय नहीं होंगे।
यह स्पष्ट संकेत था कि
मताधिकार सार्वभौमिक होगा।
सीमित मताधिकार की विफलता: प्रांतीय चुनावों का सबक
1935 के अधिनियम के तहत हुए प्रांतीय चुनावों में—
• मताधिकार सीमित था
• करोड़ों लोग वोट से बाहर थे
इस अनुभव ने यह साफ़ कर दिया कि—
सीमित मतदाता सूची असली प्रतिनिधित्व नहीं देती।
कांग्रेस नेतृत्व के लिए यह एक चेतावनी थी—
आज़ाद भारत में यह गलती दोहराई नहीं जाएगी।
महात्मा गांधी: नैतिक आधार
Mahatma Gandhi

पश्चिमी संसदीय लोकतंत्र के अंध समर्थक नहीं थे,
लेकिन जन-भागीदारी के पक्ष में अडिग थे।
उनकी सोच के तीन मूल सूत्र थे—
• अनपढ़ होना नागरिक होने की अयोग्यता नहीं
• अगर आज़ादी जनता के लिए है, तो फ़ैसले का अधिकार भी जनता को
• लोकतंत्र ऊपर से नहीं, नीचे से बनता है
गांधी का समर्थन तकनीकी नहीं,
नैतिक था —
और वही समर्थन आंदोलन की आत्मा बना।
संविधान सभा: आंदोलन की सोच का औपचारिक रूप
जब Constituent Assembly of India ने
21 वर्ष की उम्र से हर नागरिक को वोट का अधिकार दिया,
तो यह कोई अचानक लिया गया फ़ैसला नहीं था।
यह था—
• स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक परिणति
• कांग्रेस प्रस्तावों का संवैधानिक रूप
• और औपनिवेशिक अविश्वास का पूर्ण त्याग
दुनिया जहाँ मताधिकार धीरे-धीरे बढ़ा रही थी,
भारत ने पूरा रास्ता एक झटके में तय किया।
“पहले पढ़ाओ, फिर वोट दो” — यह तर्क क्यों ख़ारिज हुआ?
कुछ सदस्यों ने कहा—
• अनपढ़ों को वोट नहीं
• पहले शिक्षा, फिर अधिकार
लेकिन जवाब साफ़ था—
अगर शिक्षा को शर्त बनाया जाता,
तो उन्हीं लोगों को सज़ा मिलती
जिन्हें औपनिवेशिक शासन ने जानबूझकर अनपढ़ रखा।
इसलिए तय हुआ—
लोकतंत्र को इंतज़ार नहीं करवाया जाएगा।
बाबासाहेब अंबेडकर: वोट कोई इनाम नहीं, सुरक्षा है

B. R. Ambedkar के लिए मताधिकार—
• दलितों की ढाल था
• ग़रीबों की ताक़त था
• हाशिए के समाज की आवाज़ था
उनका तर्क सीधा था—
राजनीतिक बराबरी पहले,
सामाजिक और आर्थिक बराबरी बाद में।

नेहरू की सोच:
लोकतंत्र सीखने की चीज़ नहीं, करने की चीज़ है .
Jawaharlal Nehru मानते थे— लोग लोकतंत्र में गलतियाँ भी करेंगे,
लेकिन लोकतंत्र उसी प्रक्रिया में सीखा जाता है।
अगर आज़ादी के साथ भरोसा नहीं दिया गया, तो आज़ादी अधूरी रह जाएगी।
महिलाओं को वोट: बिना अलग संघर्ष
भारत उन शुरुआती देशों में रहा जहाँ—
• महिलाओं को वोट का अधिकार
• बिना किसी अलग आंदोलन के
• सीधे संविधान में मिला
यह आज़ादी की लड़ाई में
उनकी बराबरी की भूमिका की स्वीकारोक्ति थी।
संविधान ने साफ़ क्या कहा?
अनुच्छेद 326 के तहत—
• एक व्यक्ति, एक वोट
• 21 वर्ष की उम्र (बाद में 18)
• बिना जाति, धर्म, लिंग, शिक्षा या संपत्ति की शर्त
1951–52 के पहले आम चुनाव में
17 करोड़ से ज़्यादा भारतीयों ने वोट दिया।
आज SIR पर आपत्ति क्यों हो रही है?
आज SIR की आलोचना केवल तकनीकी कारणों से नहीं हो रही।
सबसे बड़ा आरोप यह है कि यह प्रक्रिया राजनीतिक रूप से पक्षपाती (partisan) बनती जा रही है।
आलोचकों का कहना है कि—
• छानबीन का बोझ नागरिक पर डाला जा रहा है
• संदेह की शुरुआत नागरिक से की जा रही है
• और कुछ सामाजिक समूहों पर इसका असर असमान रूप से ज़्यादा पड़ रहा है
जब मताधिकार की प्रक्रिया
प्रशासनिक अभ्यास से राजनीतिक औज़ार बनती दिखे,
तो लोकतंत्र पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
इतिहास की कसौटी पर SIR
भारत ने जानबूझकर कहा था—
पहले नागरिक मानो,
फिर सुधार करो।
अगर आज मताधिकार को
पहले फ़िल्टर किया जाएगा,
तो यह उसी औपनिवेशिक सोच की वापसी होगी
जिसे आज़ादी के संघर्ष ने नकारा था।
मताधिकार कोई सरकारी सुविधा नहीं है।
यह आज़ादी के संघर्ष का वादा है।
अगर आज उस वादे को
प्रशासनिक और राजनीतिक फ़िल्टर से गुज़ारा जा रहा है,
तो इतिहास की रोशनी में सवाल पूछना
लोकतंत्र-विरोध नहीं—
लोकतंत्र की रक्षा है।
क्योंकि भारत में वोट
संविधान से पहले
आंदोलन में पैदा हुआ था।

