प्रदूषण भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा ख़तरा: गीता गोपीनाथ
दुनिया की शीर्ष अर्थशास्त्रियों में शामिल Gita Gopinath ने भारत के नीति-निर्माताओं को एक कड़ी चेतावनी दी है। उनका कहना है कि प्रदूषण भारत की अर्थव्यवस्था, निवेश और जन-स्वास्थ्य के लिए टैरिफ या व्यापार अवरोधों से कहीं बड़ा और गहरा ख़तरा बन चुका है।

दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) के दौरान बोलते हुए गीता गोपीनाथ ने कहा कि आर्थिक बहसों में अक्सर व्यापार युद्ध, टैरिफ और भू-राजनीति पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है, जबकि प्रदूषण चुपचाप अर्थव्यवस्था की जड़ों को कमजोर कर रहा है—और इसका असर लंबे समय तक रहता है।
दावोस में क्या कहा गीता गोपीनाथ ने
गीता गोपीनाथ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रदूषण सिर्फ़ पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर मैक्रो-इकॉनॉमिक संकट है। उन्होंने बताया कि प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारियाँ और समय से पहले मौतें सीधे-सीधे आर्थिक उत्पादकता को नुकसान पहुँचाती हैं।
उन्होंने आँकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि भारत में हर साल लगभग 16 से 17 लाख लोगों की समय से पहले मौत सिर्फ़ वायु प्रदूषण के कारण हो जाती है। यह संख्या अपने-आप में यह बताने के लिए काफ़ी है कि प्रदूषण अब एक “साइलेंट किलर” बन चुका है।
मौतें, बीमारी और आर्थिक नुकसान
गीता गोपीनाथ के अनुसार प्रदूषण से होने वाली ये मौतें और बीमारियाँ केवल स्वास्थ्य संकट नहीं हैं, बल्कि इनके आर्थिक परिणाम बहुत गहरे होते हैं।
• कामकाजी आबादी बीमार पड़ती है
• श्रम-उत्पादकता घटती है
• काम के दिन नष्ट होते हैं
• सरकार पर स्वास्थ्य खर्च का बोझ बढ़ता है
उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि प्रदूषण के कारण भारत जैसे देशों को हर साल GDP का कई प्रतिशत हिस्सा गंवाना पड़ता है, जब स्वास्थ्य खर्च, उत्पादकता में गिरावट और समय से पहले मौतों को जोड़ा जाता है।
निवेश और विकास पर सीधा असर
गीता गोपीनाथ ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि प्रदूषण निवेश के फैसलों को भी प्रभावित करता है। खराब हवा और पानी वाले शहरों में कंपनियाँ और कुशल पेशेवर बसने से कतराते हैं।
ऐसे इलाकों में:
• कारोबार की लागत बढ़ती है
• कुशल श्रमिकों को आकर्षित करना मुश्किल होता है
• जीवन की गुणवत्ता गिरती है
• लंबे समय की स्थिरता पर सवाल खड़े होते हैं
भारत अगर खुद को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस हब के रूप में स्थापित करना चाहता है, तो पर्यावरणीय गुणवत्ता को नज़रअंदाज़ करना उसके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।
प्रदूषण और असमानता
गीता गोपीनाथ ने यह भी रेखांकित किया कि प्रदूषण का सबसे ज़्यादा असर गरीबों, बच्चों, बुज़ुर्गों और असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों पर पड़ता है।
प्रदूषण से जुड़ी बीमारियाँ:
• परिवारों को ग़रीबी की ओर धकेलती हैं
• बच्चों की पढ़ाई प्रभावित करती हैं
• मानव पूंजी (Human Capital) को कमजोर करती हैं
इससे असमानता बढ़ती है और विकास की रफ्तार और धीमी हो जाती है।
भारत के नीति-निर्माताओं को क्यों सुननी चाहिए यह बात
गीता गोपीनाथ की यह चेतावनी इसलिए भी अहम है क्योंकि वह किसी पर्यावरण कार्यकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे प्रभावशाली आर्थिक संस्थाओं में से एक IMF की शीर्ष नेतृत्वकर्ता के रूप में सामने आई है।
उनका साफ़ संदेश है:
प्रदूषण नियंत्रण को पर्यावरण नीति नहीं, बल्कि आर्थिक सुधार की तरह देखा जाना चाहिए।
अगर भारत ने प्रदूषण को गंभीरता से नहीं लिया, तो उसे आने वाले वर्षों में:
• बढ़ता स्वास्थ्य खर्च
• कमज़ोर उत्पादकता
• घटता निवेश
• और अस्थिर आर्थिक विकास
जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।
निष्कर्ष
भारत के लिए संदेश साफ़ है—आर्थिक विकास और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। जो विकास मॉडल प्रदूषण को नज़रअंदाज़ करता है, वह अल्पकाल में भले ही फायदे दिखाए, लेकिन लंबे समय में देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर ही करेगा।
दावोस से आई यह चेतावनी सिर्फ़ एक भाषण नहीं, बल्कि नीति-निर्माताओं के लिए एक गंभीर अलार्म है।


