
संत विनोबा गीता पर प्रवचन करते हुए कहते हैं कि अंग्रेजी में हर साल कोई दस हजार नयी किताबें तैयार होती है| यही हाल दूसरी भाषाओं का है| ज्ञान का इतना प्रसार होते हुए भी मनुष्य का दिमाग अब तक खोखला ही कैसे बना हुआ है? कोई कहता है, स्मरणशक्ति कमजोर हो गयी है| कोई कहता है, एकाग्रता नहीं सधती| कोई कहता है, जो भी पढ़ते है सच ही मालूम होता है| कोई कहता है, अजी, विचार करने को फुरसत ही नहीं मिलती!
श्रीकृष्ण कहते है –“ अर्जुन, बहुत कुछ सुन-सुनकर चक्कर में पड़ी तेरी बुद्धि जबतक स्थिर नहीं होगी, तबतक तुझे योगप्राप्ति नहीं हो सकती| सुनना और पढ़ना अब बंद करके संतों की शरण ले| वहाँ जीवन-ग्रंथ पढ़ने को मिलेगा| वहाँ का ‘मौन व्याख्यान’ सुनकर तू ‘छिन्न-संशय’ हो जायेगा| वहाँ जाने से तुझे मालूम हो जायेगा कि लगातार सेवा-कर्म करते हुए भी हम अत्यंत शांत कैसे रहें; और बाहर से कर्म का जोर रहते हुए भी हृदय में अखंड की सितार कैसे बजती रहे|”
*क्रमश*:



