80,000 पत्र और एक रेडियो: विश्व रेडियो दिवस पर अमेठी के श्रोता की अनसुनी कहानी

80,000 पत्र लिखने वाले श्रोता की मार्मिक कहानी

13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया जाता है।

UNESCO यूनेस्को ने 2011 से 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस World Radio Day घोषित किया। इस अवसर पर मैं अपने जीवन की वह कहानी साझा कर रहा हूँ, जो रेडियो से शुरू हुई और रेडियो पर ही आकार पाई।

1988 में जब मैं कक्षा 7 में पढ़ता था, तब आकाशवाणी लखनऊ के ‘घर आंगन’ कार्यक्रम में मैंने अपना पहला पत्र लिखा। उस पत्र में फिल्म शराबी का गीत “मुझे नौलखा मंगा दे रे…” सुनाने की फरमाइश की थी।

उसी वर्ष बीबीसी हिंदी रेडियो सेवा सुनना भी शुरू किया।

धीरे-धीरे रेडियो केवल एक साधन नहीं रहा — वह मेरी दुनिया बन गया।

रेडियो ने मुझे जीने की कला सिखाई। रेडियो ने मुझे अकेलेपन से बाहर निकाला।

बीमारी, संघर्ष और रेडियो

1991 में भीषण बुखार के कारण मैं लंबे समय तक बिस्तर पर रहा और पैरों में दिव्यांगता आ गई। उस कठिन दौर में मेरा सहारा रेडियो बना। लेटे-लेटे मैं आकाशवाणी और बीबीसी हिंदी सेवा सुनता रहा, और पत्र लिखता रहा।

मेरे पिताजी, जो सेवानिवृत्त प्राथमिक शिक्षक थे, मेरे सबसे बड़े सहायक थे। वे 20 किलोमीटर साइकिल चलाकर मेरे पत्र डाक पेटी में डालने जाते थे। उनकी पेंशन से रेडियो के सेल खरीदे जाते, पोस्टकार्ड खरीदे जाते और रेडियो चलता रहता।

भारतीय रेडियो श्रोता संघ की स्थापना

1995 में हमने भारतीय रेडियो श्रोता संघ का गठन किया।

उस समय 105 सदस्य थे, आज यह संख्या 130 से अधिक है।

इस संघ का पंजीकरण:

वॉइस ऑफ अमेरिका की हिंदी सेवा

• रेडियो डॉयचे वेले (द वॉयस ऑफ जर्मनी)

में हुआ।

डॉयचे वेले ने हमारे संघ को “सक्रिय एवं सर्वश्रेष्ठ क्लब” का पुरस्कार दिया और नई दिल्ली स्थित जर्मन दूतावास, चाणक्यपुरी में सम्मानित किया।

मुझे आकाशवाणी लखनऊ से “सर्वश्रेष्ठ श्रोता” पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।

रेडियो से सीख और शिक्षा

रेडियो ने मेरी पढ़ाई में भी मदद की।

आकाशवाणी के विद्यार्थी कार्यक्रमों से लाभ मिला।

बीमारी के कारण इंटर की परीक्षा छूट गई, लेकिन बाद में व्यक्तिगत परीक्षा से उत्तीर्ण किया।

स्नातक, परास्नातक और इग्नू से B.Ed. तक की पढ़ाई में रेडियो से प्रसारित ‘ज्ञानवाणी’ चैनल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पत्र लेखन की परंपरा

अब तक मैं लगभग 80,000 पत्र विभिन्न रेडियो सेवाओं को भेज चुका हूँ।

आज भी महीने में लगभग 100 पत्र लिखता हूँ।

डाकघर में पोस्टकार्ड मिलना बंद हो गया है, इसलिए लखनऊ GPO से हजारों पोस्टकार्ड खरीदकर लाता हूँ।

रेडियो की बदलती दुनिया

समय बदला।

शॉर्ट वेव बंद हुई।

बीबीसी हिंदी रेडियो सेवा (2011) बंद हुई।

वॉइस ऑफ अमेरिका हिंदी सेवा बंद हुई।

डॉयचे वेले हिंदी सेवा बंद हुई।

विविध भारती के पत्र कार्यक्रम सीमित हुए।

हमने बीबीसी हिंदी सेवा बचाओ आंदोलन भी चलाया

https://www.bbc.com/hindi/multimedia/2011/04/110415_audience_meet_gallery_psa

रेडियो और समाज

गांव के लोग आज भी पूछते हैं:

“रेडियो ने मौसम के बारे में क्या बताया?”

“बरसात कब होगी?”

आकाशवाणी सचमुच जन की वाणी है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम को भी मैंने आकाशवाणी लखनऊ से नियमित सुना है।

26 दिसंबर 2025 — एक मोड़

26 दिसंबर 2025 को पिताजी का निधन हो गया।

उनके जाने के बाद परिस्थितियाँ बदल गईं।

अब रेडियो के सेल, स्मार्टफोन रिचार्ज, डेटा — सब कठिन हो गया।

आज प्राथमिकता घर और परिवार है।

हम किसी से सहायता नहीं मांगते।

बस यह स्वीकार करते हैं कि समय बदल गया है।

जिस रेडियो पर वर्षों कार्यक्रम सुने, उसे सम्मानपूर्वक स्मृति के रूप में सुरक्षित रख दिया है।

अलविदा — लेकिन स्मृतियाँ अमर

रेडियो से जुदा होना मेरे लिए अत्यंत पीड़ादायक है।

लेकिन जीवन की जिम्मेदारियाँ पहले हैं।

आज की पीढ़ी से मेरा आग्रह है —

रेडियो सुनिए।

आकाशवाणी को पत्र लिखिए।

रेडियो संस्कृति को जीवित रखिए।

रेडियो केवल उपकरण नहीं —

यह ज्ञान का खजाना है।

यह जीवन का साथी है।

जय हिंद।

जय भारत।

जय हो रेडियो की।

प्रमोद कुमार श्रीवास्तव

अध्यक्ष — भारतीय रेडियो श्रोता संघ

जिला अमेठी, उत्तर प्रदेश

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