जब प्रयागराज 1857 में ही आज़ाद हो गया था

लेखक वीरेन्द्र पाठक प्रयागराज
वीरेन्द्र पाठक

वीरेंद्र पाठक, वरिष्ठ पत्रकार, प्रयागराज 

इलाहाबाद जिसे प्रयागराज के रूप में जाना जाता है अंग्रेजों से 10 दिनों तक पूरी तरह आजाद हो गया था! आप यह बात सुनकर चौक गये होंगे लेकिन सच्चाई यही है जिसे भारतीय इतिहासकारों ने समेट कर खत्म कर दिया।

7 जून से 16 जून 18 57 में इलाहाबाद में जन विद्रोह हुआ। इस विद्रोह मैं पहले सिख रेजीमेंट के विद्रोही सिपाही और बाद में प्रयाग वालों तथा मेवाती मिलकर प्रयागराज को आजाद करा लिया। प्रयागराज को आजाद ही नहीं कराया बल्कि अंग्रेजों से उस समय ₹3000000 छीन लिया जो बाद में नाना जी को दिया गया। इलाहाबाद की आजादी इसलिए हम कहते हैं की अविभाजित इलाहाबाद में पूरी तरह सत्ता 10 दिनों तक भारतीयों ने संभाली उन्होंने अपना कोतवाल नियुक्त किया अन्य अधिकारी नियुक्त करके पूरी तरह सत्ता चलायी हिंदुओं की ओर से रामचन्द्र ने और मुस्लिमों की ओर से मौलवी लियाकत अली ने विद्रोहियों की कमान संभाल कर इस जन विद्रोह का नेतृत्व किया हिंदू और मुस्लिम दोनों मिलकर लड़े और उन्होंने प्रयागराज को आजाद करा लिया। आजादी की कहानी मैं आपको सुनाता हूं। इस आजादी की कीमत भारतीयों को कितनी चुकानी पड़ी आज का युवा समझ ही नहीं सकता। भारतीय इतिहासकारों ने तो नहीं ब्रिटिश इतिहासकारों ने ही इसका अपने तरह से उल्लेख किया है एक दस्तावेज में उल्लेखित है कि 8 बैलगाड़ी 3 माह तक सूर्योदय से सूर्यास्त तक पेड़ों पर से भारतीयों की लाश उतारकर उन्हें ढोती रही। अब आप प्रयागराज की पहली आजादी के पहले दिन की दास्तां सुनाता हूँ।

 

6 जून 18 57 की रात 9:20 मिनट पर गंगा के उस पार झूंसी की तरफ से तोप का गोला आकाश में छूटा। गंगा के इस पार उस पर प्रतिक्रिया हुई , हवा में एक आतिशबाजी का वाण दारागंज नाव के पुल के पास से छूटा। इसी तरह छावनी से एक आतिशबाजी का वाण हवा में छूटा।
यह संदेश था विद्रोहियों का । पहले से तय संदेश के कारण, दारागंज पुल पर देसी सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। अंग्रेज अफसर जब तक सतर्क होते तब तक दारागंज में बने नाव के पुल की सुरक्षा के लिए तैनात 2 तोप का मुँह विद्रोहियों ने मोड़ दिया। सिक्ख बटालियन के सिपाही जो भागकर बनारस से इलाहाबाद आ गए थे उन्हें यह संदेश मिल गया कि अब नाव के पुल के जरिए वह सुरक्षित दारागंज यानी नगर प्रवेश कर सकते हैं। उन्होंने नाव के पुल के जरिए सुरक्षित दारागंज में प्रवेश कर लिया। “कमल” और “रोटी” का संदेश कई दिनों से विद्रोहियों के बीच में बांटा जा रहा था, आज वह सफल हो गया।

यह पहले से तय था की तोप के गोले के जवाब में जब दारागंज से देसी पलटन के जवान अग्निबाण छोड़ेंगे। इसका मतलब मैदान साफ है। दारागंज में पुल की सुरक्षा के लिए तैनात “हावर्ड” सकते में आ गया । छावनी में एलेग्जेंडर के नेतृत्व में सैनिक तैयार थे।देसी पलटने का रूख देखकर वह एलेग्जेंडर के पास भाग कर पहुंचा । देसी पलटन पर गोली चलाने का आदेश दिया किंतु उनकी सुरक्षा के लिए तैनात सिपाहियों ने एलेग्जेंडर को ही गोली मार दी। हावर्ड देसी पलटन के विद्रोह से सकते में आ गया अपने को घिरा देख वह मेस की ओर भाग लिया । बटालियन के सिपाही बनारस में अंग्रेजों की क्रूरता से नाराज थे। वह नगर में घुसते ही अंग्रेजों पर हमला कर दिया ।
अंग्रेजों को पहले ही यह सूचना मिल गई थी कि कुछ बड़ी गड़बड़ होने वाली है। इसीलिए काफी तैयारी कर ली थी। देशी पलटन व सिक्ख बटालियन के सिपाहियों के साथ अब “प्रयागवाल” भी विद्रोह और लूटपाट में शामिल हो गये। जहां पर भी यूरोपियों को देखा गया खोली मार दी गयी और लूट लिया गया। इस तरह चैथम लाइन से लेकर दारागंज तक सभी अंग्रेज मार दिये गये। मेस में खाना खा रहे सिपाहियों को बचने का मौका नहीं मिला किसी तरह कुछ भागकर किले तक पहुंच गये।अंग्रेजों की संपत्ति लूट ली गई और विद्रोह शुरू हो गया।


कुछ दिनों से

“कमल का फूल और रोटी” का वितरण हो रहा था । अंग्रेजों को यह वितरण कुछ संदिग्ध लग रहा था। खुफिया रिपोर्ट भी विद्रोह की खबर दे रही थी। ऐसे में अंग्रेज विद्रोह को दबाने के लिए जतन कर रहे थे।

19 मई 1857 को सर हेनरी लॉरेंस ने इलाहाबाद के अधिकारियों की सहायता और खजाने की देखभाल के लिए कुछ सिपाहियों को प्रतापगढ़ से यहां भेजा था। किंतु अंग्रेजों मात्र 6 सिपाहियों के बल पर खजाना ₹30 लाख रुपया किले तक भेजना उन्हें जोखिम भरा लगा। उन्हें लगा कि 30 लाख रुपए बड़ी रकम है किले में तैनात सिख सिपाही विद्रोह न कर बैठे।

बनारस से सिख रेजीमेंट 11 के सिपाही विद्रोह करके इलाहाबाद की ओर आ रहे थे। यह खबर अंग्रेजों को पहले ही पता लग गई थी। इसके चलते वह तैयारी कर रहे थे, किंतु विद्रोह तय था। 6 जून की रात 9:20 पर विद्रोह सिकखों और प्रयागवालों ने विद्रोह प्रारंभ कर दिया।

प्रयागराज की पहली आजादी महोत्सव विगत 3 वर्षों से मनाया जाता रहा है कोविड-19 के चलते इस बार प्रतीकात्मक रूप में चौक के पेड़ जहां पर भारी संख्या में लोगों को फांसी दी गई माल्यार्पण करके मनाया गया।

(प्रयाग से प्रयागराज तक- वीरेन्द्र पाठक)

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