दिल्ली–एनसीआर प्रदूषण: वायु, जल, ध्वनि और स्वास्थ्य पर असर

 आंकड़े, असर और नीति की जरूरत

दिल्ली–एनसीआर दुनिया के उन शहरों में शामिल है जहाँ वायु, जल और ध्वनि—तीनों तरह का प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुँच चुका है। अदालतें और सरकारें समय-समय पर निर्देश देती हैं, पर वास्तविक सुधार नहीं दिख रहा। इस सर्वांगीण प्रदूषण का सबसे बड़ा असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर तत्काल ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में राजधानी क्षेत्र का जन-स्वास्थ्य संकट और गहरा जाएगा

1. वायु प्रदूषण: सांसों से दिल तक

दिल्ली की हवा हर सर्दी में ‘गंभीर’ श्रेणी में चली जाती है। PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण फेफड़ों की गहराई तक पहुँचकर सांस की बीमारियाँ—खांसी, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस—बढ़ाते हैं। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका असर सबसे तेज़ दिखाई देता है।

वायु प्रदूषण का दिल पर भी गंभीर असर होता है। लगातार प्रदूषित हवा में रहने से खून की नलियों में सूजन और ऑक्सीजन की कमी बढ़ती है। इसके परिणामस्वरूप हाई ब्लड प्रेशर, अनियमित धड़कन, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।

आंकड़े बताते हैं:

• 2025 के Air Quality Life Index के अनुसार दिल्ली‑NCR के लोगों की औसत जीवन प्रत्याशा प्रदूषण की वजह से लगभग 8.2 साल कम हो जाती है।

• 2023 में कुल मौतों का लगभग 15% (लगभग 17,188 मौतें) वायु प्रदूषण से जुड़ा था।

• औसत AQI: 2020 – 153, 2021 – 162, 2022 – 174, 2023 – 164, 2024 – 169, 2025 – 139 (सर्दियों में फिर से चरम स्तर)।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि प्रदूषण सिर्फ अस्थायी समस्या नहीं, बल्कि दीर्घकालीन जन-स्वास्थ्य संकट है।

2. जल प्रदूषण: पीने का पानी, पेट और किडनी पर असर

यमुना का दूषित जल, नालों का ओवरफ्लो और औद्योगिक कचरा दिल्ली के जल स्रोतों को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं। दूषित पानी से पेट और आंत के संक्रमण, टाइफाइड, पीलिया, दस्त और त्वचा रोग बढ़ रहे हैं। लंबे समय तक अशुद्ध पानी पीने से किडनी और लिवर भी प्रभावित होते हैं।

सर्वे और शोध बताते हैं कि राजधानी में जलजनित रोगों के मरीज हर मौसम में अस्पतालों में बड़ी संख्या में पहुँचते हैं, जिससे स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है।

3. ध्वनि प्रदूषण: मानसिक तनाव और सुनने की क्षमता पर असर

शहर में लगातार बढ़ता शोर—वाहन हॉर्न, निर्माण कार्य, मेट्रो, हवाई यातायात—लोगों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर डालता है। लंबे समय तक तेज आवाज़ें तनाव, नींद में खलल, चिड़चिड़ापन, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग बढ़ाती हैं। बच्चों में पढ़ाई और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता भी प्रभावित होती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार लगातार 55 डेसिबल से ऊपर शोर हानिकारक होता है, जबकि दिल्ली के कई इलाकों में यह स्तर रोज़ाना पार होता है।

4. सर्वांगीण प्रभाव: संयुक्त खतरा

तीनों प्रकार के प्रदूषण का संयुक्त असर और भी गंभीर है। हवा, पानी और ध्वनि की समस्या मिलकर शरीर पर लगातार तनाव डालती हैं। रोग‑प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ती है और सामान्य संक्रमण भी गंभीर बीमारी का रूप ले सकते हैं।

75% से अधिक दिल्ली‑NCR परिवारों ने बताया कि प्रदूषण के कारण खांसी, गले में जलन, सिर दर्द और नींद में खलल जैसी समस्याएँ रोज़मर्रा की जिंदगी में दिख रही हैं।

5. नीति–स्तरीय उपाय और भविष्य की राह

राजधानी को स्वस्थ बनाने के लिए सिर्फ अल्पकालिक उपाय पर्याप्त नहीं हैं। विशेषज्ञ कई नीति–स्तरीय पहलों पर जोर देते हैं:

वायु प्रदूषण के लिए

• वाहनों और निर्माण स्थलों पर सख्त नियंत्रण

• सार्वजनिक परिवहन का विस्तार

• NCR में पेड़ों की कटाई पर रोक और पुनर्वनीकरण

जल प्रदूषण के लिए

• यमुना में औद्योगिक अपशिष्ट और सीवर का पूर्ण नियंत्रण

• जल पाइपलाइन और सीवर नेटवर्क सुधार

• जल-उपचार और निगरानी बढ़ाना

ध्वनि प्रदूषण के लिए

• साइलेंस जोन का सख्त पालन

• हॉर्न और लाउडस्पीकर नियमों का कड़ाई से पालन

• निर्माण कार्यों का समय सीमित करना

निष्कर्ष

दिल्ली–एनसीआर का प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरणीय समस्या नहीं है—यह संपूर्ण जन-स्वास्थ्य संकट बन चुका है। वायु, जल और ध्वनि—तीनों का संयुक्त असर जीवन प्रत्याशा, बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों और अस्थमा/हृदय रोगियों पर गहरा प्रभाव डाल रहा है।

सरकार, विशेषज्ञ और समाज को मिलकर इसे गंभीर संकट मानकर ठोस नीति और व्यवहारिक कदम उठाने होंगे। तभी आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ और सुरक्षित दिल्ली मिल सकेगी।

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