नसीमुद्दीन सिद्दीकी: बसपा से सपा तक — और ओवैसी फैक्टर
पहचान आधारित स्वतंत्र राजनीति का आकर्षण बना रहेगा
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा फेरबदल तब देखने को मिला जब रविवार को पूर्व कद्दावर मंत्री Naseemuddin Siddiqui नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने औपचारिक रूप से समाजवादी पार्टी Samajwadi Party की सदस्यता ग्रहण की। पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav अखिलेश यादव ने उन्हें सदस्यता दिलाई।
उनके साथ तीन बार विधायक रहे अनीस अहमद खान (फूल बाबू), 8–10 पूर्व विधायक, विभिन्न दलों के पदाधिकारी तथा राजकुमार पाल (अपना दल (S) के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष) भी सपा में शामिल हुए।इसको राजनीतिक पर्यवेक्षक विपक्षी खेमे के पुनर्गठन के संकेत के रूप में देख रहे हैं।
इस अवसर पर अखिलेश यादव ने कहा “यह ज्वाइनिंग पीडीए की जीत को और बड़ा करेगी.”
शुरुआती जीवन और राजनीतिक उभार
बुंदेलखंड क्षेत्र से आने वाले सिद्दीकी ने 1991 में पहली बार बांदा विधानसभा सीट से जीत दर्ज की। वे BSP के पहले मुस्लिम विधायक बने। 1993 में वे चुनाव हार गए, लेकिन 1995 में जब मायावती भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं, तब उन्हें एमएलसी बनाकर कैबिनेट मंत्री बनाया गया।
2007–2012 की पूर्ण बहुमत वाली BSP सरकार में उनके पास 18 मंत्रालय थे — और उन्हें “मिनी CM” कहा जाने लगा।
मायावती से टकराव और ऑडियो विवाद
2017 में BSP से निष्कासन के बाद सिद्दीकी ने मायावती पर टिकट वितरण में धन मांगने जैसे आरोप लगाए और बातचीत की रिकॉर्डिंग होने का दावा किया।हालांकि इन दावों की न्यायिक पुष्टि नहीं हुई, लेकिन इस प्रकरण ने BSP के अंदरूनी ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े किए।
कांग्रेस में सीमित असर
2018 में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जॉइन की।प्रदेश स्तर पर जिम्मेदारी मिली, लेकिन कांग्रेस की कमजोर संगठनात्मक स्थिति के कारण उनका प्रभाव सीमित रहा।
सपा में शामिल होना: PDA और राजनीतिक संदेश
सपा में शामिल होने के बाद सिद्दीकी ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में कहा:
“PDA की अवधारणा अखिलेश यादव ने ही शुरू की थी। PDA का मतलब है पिछड़ा वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक। इसके साथ ही उन्होंने समाज के सभी वर्गों पर ध्यान दिया। आज ब्राह्मण समुदाय जाति आधारित उत्पीड़न का सामना कर रहा है और इस मुद्दे पर भी उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई है। केवल बुलडोजर चलाने से सब कुछ हल नहीं होगा। असली बदलाव लोगों का दिल जीतने और उनके घावों को भरने से आएगा। मैंने अपनी प्राथमिकता तय की है — समाजवादी पार्टी, इसके नेता अखिलेश यादव और पूरा समाजवादी परिवार।”
उन्होंने यह भी कहा कि वे अपने सहयोगियों, 8–10 पूर्व विधायकों और अन्य दलों के पदाधिकारियों के साथ सपा में शामिल हुए हैं।
यह बयान दो स्तरों पर महत्वपूर्ण है:
1️⃣ सपा की PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) राजनीति को वैचारिक समर्थन
2️⃣ व्यापक सामाजिक असंतोष को साधने का प्रयास
ओवैसी और AIMIM फैक्टर
इस घटनाक्रम का एक अहम कोण है — All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen और उसके प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी।
AIMIM ने पश्चिमी यूपी और कुछ शहरी क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ाई है। ओवैसी का नैरेटिव मुस्लिम राजनीति के स्वतंत्र प्रतिनिधित्व पर आधारित है।
सिद्दीकी के आने से संभावित असर:
सपा के कद्दावर मुस्लिम नेता मोहम्मद आज़म ख़ान के जेल में होने से पार्टी में एक रिक्तता आई है। अब नसीमुद्दीन और उनके साथियों को लेकर
✔ सपा मुस्लिम नेतृत्व के एक साथ का संदेश दे सकती है
✔ AIMIM की संभावित सेंध को सीमित किया जा सकता है
✔ समूहगत शामिलीकरण से विपक्षी खेमे में मनोबल बढ़ेगा
लेकिन:
पहचान आधारित स्वतंत्र राजनीति का आकर्षण बना रहेगा
यदि सपा प्रतिनिधित्व में संतुलन नहीं रखती, तो AIMIM का स्पेस खत्म नहीं होगा।
पर यह भी सच है कि सपा खुलकर मुस्लिम कार्ड नहीं खेल सकती क्योंकि ऐसा करने पर भाजपा को हिंदू मतों को गोलबंद करने में और सहूलियत होगी।
राजनीतिक शिफ़्ट
नसीमुद्दीन सिद्दीकी का सपा में शामिल होना केवल एक नेता की वापसी नहीं, बल्कि एक समूहगत राजनीतिक शिफ्ट है।उनकी यात्रा — BSP में “मिनी CM” की हैसियत से लेकर मायावती से टकराव, कांग्रेस चरण और अब सपा में PDA राजनीति के समर्थन तक — उत्तर प्रदेश की बदलती सत्ता संरचना का संकेत देती है।
अब असली सवाल यह है —
क्या यह कदम 2027 के चुनावी समीकरणों में वास्तविक बदलाव लाएगा, या केवल प्रतीकात्मक संदेश तक सीमित रहेगा?



