नई विधानसभा इमारत या नई प्राथमिकताएँ ?
राम दत्त त्रिपाठी

उत्तर प्रदेश में नए विधानसभा भवन के प्रस्तावित निर्माण को लेकर चर्चा तेज़ है, लेकिन दिलचस्प तथ्य यह है कि अब तक राज्य सरकार की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसके बावजूद मीडिया में “सूत्रों के हवाले से” ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो नया विधानभवन बनना तय हो चुका हो।
यही स्थिति इस बहस को और ज़रूरी बना देती है—क्योंकि मामला केवल एक इमारत का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्राथमिकताओं, सार्वजनिक भूमि के उपयोग और सरकारी खर्च की दूरगामी संरचना से जुड़ा है।
पच्चीस करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में लाखों शिक्षित और प्रशिक्षित नौजवान रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं, छोटे व्यापारियों के धंधे चौपट हो रहे हैं और करोड़ों किसान अपनी उपज का लाभकारी मूल्य पाने को तरस रहे हैं।
नए मेडिकल कॉलेजों की इमारतें बन गईं पर पढ़ाने वाले नहीं हैं। अस्पतालों में डाक्टर नहीं हैं।
बेहतर होगा कि नीति निर्माता इनकी और ध्यान दें।
गोमतीनगर–सहारा शहर: ज़मीन तैयार, लेकिन उद्देश्य बदला जा रहा?
उपलब्ध जानकारियों के अनुसार, लखनऊ के गोमती नगर के विपुल खंड में बहुचर्चित सहारा शहर क्षेत्र में नये विधानभवन के निर्माण की संभावना को लेकर प्रशासनिक गतिविधियाँ तेज़ हैं।

खबरों के अनुसार शासन के निर्देश के बाद लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने कवायद शुरू कर दी है। कंसल्टेंट नियुक्त करने की प्रक्रिया चल रही है, जिसके ज़रिये डीपीआर और डिज़ाइन तैयार किए जाने हैं। खबरों के मुताबिक:
• सहारा शहर क्षेत्र में कुल 245 एकड़ भूमि खाली कराई गई है
• 75 एकड़ LDA और 170 एकड़ नगर निगम के कब्ज़े में है
• ज़मीन की पैमाइश रिपोर्ट शासन को भेजी जा चुकी है
• उच्च स्तर पर निर्माण को लेकर सैद्धांतिक सहमति मानी जा रही है
प्रशासन का तर्क है कि यह लोकेशन ट्रैफिक, पार्किंग और वीआईपी मूवमेंट के लिहाज़ से उपयुक्त है। लेकिन यहीं से विवाद और गहराता है।
महत्वपूर्ण तथ्य: इस ज़मीन का मूल उद्देश्य क्या था?
सहारा शहर की जिस ज़मीन पर अब नए विधानभवन की बात हो रही है, वह भूमि नगर निगम ने सहारा ग्रुप को मूल रूप से दो उद्देश्यों के लिए दी थी—
1. शहरी ग़रीबों के लिए सस्ते आवास
2. बच्चों और नागरिकों के लिए सार्वजनिक पार्क व मनोरंजन स्थल
बाद में इस भूमि पर सुब्रत राय सहारा द्वारा ग़ैर-कानूनी ढंग से व्यावसायिक निर्माण कर लिया गया, जिसके कारण यह ज़मीन वर्षों तक अपने मूल सामाजिक उद्देश्य से भटक गई।अब जब यह भूमि खाली हो चुकी है, तो एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—
क्या इस ज़मीन का उपयोग अब मूल सार्वजनिक उद्देश्य— यानी ग़रीबों के आवास और बच्चों के पार्क—के लिए नहीं होना चाहिए?
यदि सार्वजनिक भूमि, जो सामाजिक कल्याण के लिए आरक्षित थी, उसे विधान भवन के लिए पुनः उपयोग में लाया जाता है, तो यह शहरी न्याय और नीति-नैतिकता दोनों पर सवाल खड़े करता है।
लोकेशन बनाम ट्रैफिक: समस्या सुलझेगी या शिफ्ट होगी?
सहारा शहर चारों ओर से गोमतीनगर और गोमतीनगर विस्तार की घनी आबादी से घिरा हुआ है। इस क्षेत्र तक पहुँचने के लिए गोमती नदी के पुलों पर निर्भरता अपरिहार्य है। पहले से ही:
• पीक आवर्स में पुलों पर भारी ट्रैफिक
• आवासीय इलाक़ों में संकरी आंतरिक सड़कें मौजूद हैं। ऐसे में:
• विधानसभा सत्र
• वीआईपी मूवमेंट
• सुरक्षा काफ़िले
जुड़ने से गोमती के पुलों पर ट्रैफिक दबाव और बढ़ना तय माना जा रहा है। यानी जिस समस्या को हल करने का दावा किया जा रहा है, वह नई जगह पर और विकराल हो सकती है। उदाहरण के लिए कुछ साल पहले हाईकोर्ट का नया भवन गोमती नगर में व्यस्त फैजाबाद रोड से सटाकर बनाया गया जो वर्तमान में ट्राफिक जाम और अव्यवस्था से जूझता है .
वर्तमान विधानसभा: समस्या अलग है, समाधान मौजूद है
यह सच है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा के मौजूदा इलाके में अधिवेशन न होने पर भी ट्रैफिक जाम रहता है। लेकिन यह समस्या विधानसभा की उपस्थिति से ज़्यादा शहरी अव्यवस्था और व्यावसायिक दबाव से जुड़ी है।

चित्र परिचय : लोक भवन विधान सभा मार्ग लखनऊ, यहाँ मुख्यमंत्री कार्यालय स्थित है
कुछ वर्षों पहले समाजवादी पार्टी सरकार ने विधानसभा भवन के ठीक सामने लोक भवन का निर्माण करवा दिया जहां मुख्यमंत्री कार्यालय है . इसके कारण पहले से व्यस्त विधानसभा मार्ग पर ट्राफिक लोड बढ़ गया . क़ायदे से वहाँ लोगों के एक पार्क बनाने की जरूरत थी
समाधान मौजूद हैं:
• आसपास की निजी कमर्शियल प्रॉपर्टी हटाकर
• गवर्नर हाउस की बाउंड्री पीछे खिसकाकर
• सड़कों से अतिक्रमण हटाकर और नियोजित पार्किंग विकसित कर मौजूदा विधानसभा क्षेत्र को कहीं अधिक कार्यक्षम बनाया जा सकता है।
इतिहास का तथ्य: 425 विधायक इसी सदन में बैठते थे
उत्तराखंड बनने से पहले, जब उत्तर प्रदेश अविभाजित था, तब विधानसभा में 425 सदस्य हुआ करते थे—और यही मौजूदा विधानसभा मंडप उन्हें समायोजित करता था।यदि यही भवन पहले 425 विधायकों के साथ काम कर सकता था, तो आज 403 सदस्यों के लिए इसे अचानक अपर्याप्त बताना स्वाभाविक प्रश्न खड़े करता है।
नियमावली बनाम हकीकत: लोकतंत्र को समय नहीं
विधानसभा की नियमावली के अनुसार सदन को न्यूनतम 90 दिन चलना चाहिए।
लेकिन पिछले लगभग एक दशक में:
• औसत सत्र 20–30 दिनों तक सिमट गए
• कुछ वर्षों में यह 15–16 दिन तक ही सीमित रहे
जब सदन चलता ही नहीं, तो सवाल उठता है । नई इमारत बनाकर कौन-सी लोकतांत्रिक प्रक्रिया मजबूत होगी? हम देख सकते हैं कि दिल्ली में अरबों रुपये खर्च करके नई संसद तो बन गई लेकिन केवल नई इमारत से संसद के संचालन में तो कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ।
विदेशों का अनुभव: इमारत नहीं, व्यवस्था बदली

ब्रिटेन की संसद आज भी Palace of Westminster जैसी ऐतिहासिक इमारत में चलती है। फ्रांस, कनाडा और जर्मनी जैसे देशों ने पुरानी संसद इमारतों को संरक्षित रखते हुए हाइब्रिड और डिजिटल कार्यप्रणाली अपनाई है। दुनिया का अनुभव बताता है—
आधुनिक लोकतंत्र के लिए नई इमारत अनिवार्य नहीं, लेकिन नई कार्यशैली अनिवार्य है।
❗ एक और व्यावहारिक सवाल: सरकार का पूरा ढांचा भी शिफ्ट होगा?
इस बहस का एक अक्सर अनदेखा पहलू यह भी है कि यदि विधानसभा नई जगह जाती है, तो—
• मुख्यमंत्री कार्यालय
• मंत्रियों के दफ्तर
• प्रमुख सचिवालय
• प्रशासनिक विभाग
को भी वहीं स्थानांतरित करना पड़ेगा। यह न केवल बेहद खर्चीला, बल्कि सरकार का पूरा तंत्र एक जगह और विधानसभा दूसरी जगह—यह स्थिति निर्णय प्रक्रिया को और जटिल बना सकती है।
निष्कर्ष: इमारत से पहले नीति और नैतिकता
सरकार आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कह रही, लेकिन
• ज़मीन नापी जा रही है
• कंसल्टेंट चुने जा रहे हैं
• माहौल बनाया जा रहा है
तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसके साथ यह भी स्पष्ट है कि:
• जिस ज़मीन का मूल उद्देश्य ग़रीबों और बच्चों के लिए था
• जिसे शहरी कल्याण के लिए सुरक्षित किया गया था उसका उपयोग अन्य उपयोग के लिए करना नीतिगत पुनर्विचार मांगता है।
लोकतंत्र इमारतों से नहीं, नीति, प्राथमिकता और समय से मजबूत होता है। उत्तर प्रदेश के लिए भी यही कसौटी होनी चाहिए।


