जलवायु संकट और सत्ता: कैसे टूट रहा है धरती का ईको सिस्टम

दुनिया वही गलती क्यों दोहरा रही है, जिसे सभ्यताएँ पहले ही समझ चुकी थीं?

राम दत्त त्रिपाठी

आज दुनिया भर के वैज्ञानिक साफ़-साफ़ कह रहे हैं—धरती अब खतरे की हद के बहुत करीब पहुँच चुकी है।

मौसम बिगड़ रहा है, गर्मी जानलेवा हो रही है, पानी और हवा ज़हर बनते जा रहे हैं और प्रकृति का ईको सिस्टम टूट रहा है

लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन अमीर देशों ने सबसे ज़्यादा प्रदूषण फैलाया, वही आज जलवायु से जुड़ी अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटते दिख रहे हैं।

और इसका सबसे बड़ा खामियाज़ा भुगत रहे हैं—गरीब लोग, छोटे किसान, आदिवासी और आने वाली पीढ़ियाँ।

आज जो कुछ हो रहा है—भयंकर गर्मी, बाढ़, सूखा, जहरीली हवा-पानी—ये कोई आने वाला खतरा नहीं है।

ये आज की सच्चाई है।

और सच यह है कि जलवायु संकट कोई सिर्फ वैज्ञानिक या तकनीकी समस्या नहीं है।

यह सत्ता, विकास और नैतिकता की नाकामी का नतीजा है।

अमीर देश, बड़ी बातें… और पीछे हटती जिम्मेदारी

दुनिया दशकों से जलवायु बैठकों और समझौतों की बात कर रही है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है।

अमेरिका जैसे देश—जो इतिहास में सबसे ज़्यादा ग्रीनहाउस गैसें छोड़ चुके हैं—वहाँ सरकार बदलते ही जलवायु नीति भी बदल जाती है।

कभी पर्यावरण नियम कड़े, तो कभी ढीले।

कभी जलवायु समझौते, तो कभी उनसे बाहर निकलने की तैयारी।

यूरोप में भी हालात बहुत उत्साहजनक नहीं हैं।

ऊर्जा संकट, महँगाई और दक्षिणपंथी राजनीति के दबाव में जलवायु फैसलों की रफ्तार धीमी पड़ गई है—जबकि खतरा तेज़ी से बढ़ रहा है।

यह सिर्फ नीतियों की नाकामी नहीं है।

यह उस विकास मॉडल की असलियत दिखाता है, जो मुनाफे को सबसे ऊपर रखता है।

जलवायु संकट अचानक नहीं आया

आज का जलवायु संकट किसी संयोग का नतीजा नहीं है।

यह सीधे-सीधे इन चीज़ों से जुड़ा है—

• कोयला, तेल और गैस पर निर्भरता

• जंगलों की अंधाधुंध कटाई

• बिना सीमा का उपभोग

• और “जितना ज़्यादा, उतना अच्छा” वाली सोच

इस व्यवस्था का फायदा कुछ बड़ी कंपनियों और अमीर तबकों को होता है।

लेकिन इसकी कीमत चुकाते हैं—

• गरीब लोग

• छोटे किसान

• बच्चे

• और आने वाली पीढ़ियाँ

सरकारें प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को छूट देती हैं, पर्यावरण नियम कमजोर करती हैं और ताकतवर कॉरपोरेट दबाव में जरूरी फैसले टालती रहती हैं।

इसलिए साफ़ है—

जलवायु संकट एक गलत विकास सोच का सीधा नतीजा है।

चरक संहिता: जब ईको सिस्टम टूटता है

लगभग दो हजार साल पहले लिखी गई चरक संहिता में आज के हालात की हैरान कर देने वाली झलक मिलती है।

जनपदोध्वंस अध्याय में कहा गया है—

जब हवा, पानी, ज़मीन और मौसम बिगड़ जाते हैं, तो पूरे समाज में बीमारियाँ और तबाही फैलती है।

लेकिन चरक साफ़ कहते हैं—

यह प्रकृति की गलती नहीं होती।

इसके पीछे कारण होते हैं—

• अनैतिक शासक

• अन्यायपूर्ण व्यवस्था

• लालच

• और नैतिक जिम्मेदारी का खत्म होना

आज जब मौसम उल्टा-पुल्टा हो रहा है, नदियाँ सूख रही हैं, जंगल खत्म हो रहे हैं—तो यह उसी चेतावनी को सच साबित करता है।

जलवायु संकट कोई प्राकृतिक दुर्घटना नहीं, बल्कि इंसानी नाकामी है।

चीन, ग्रीस और रोम भी यही कहते हैं

प्राचीन चीन में माना जाता था कि अगर शासक गलत रास्ते पर चला गया, तो प्रकृति उसके संकेत देती है—बाढ़, सूखा और अकाल के ज़रिये।

ग्रीस के दार्शनिक प्लेटो ने जंगलों की कटाई और ज़मीन के खराब होने को इंसानी लालच से जोड़ा।

रोमन विद्वानों ने चेताया था कि जरूरत से ज़्यादा खेती, खनन और दोहन ज़मीन को बंजर बना देगा।

आज पूरी दुनिया वही अनुभव कर रही है—बस पैमाना कहीं बड़ा है।

भारत: सबसे कम जिम्मेदार, लेकिन सबसे ज़्यादा प्रभावित

भारत ने दुनिया के मुकाबले कम प्रदूषण किया है, फिर भी आज वह जलवायु संकट की सबसे आगे की पंक्ति में खड़ा है।

हिमालय और पानी

हिमालय की बर्फ़ घट रही है।

ग्लेशियर पिघल रहे हैं।

गर्मियों में नदियाँ सूखती हैं, बरसात में बाढ़ आती है।

नदियाँ नालियाँ बनती जा रही हैं

गंगा, यमुना, गोमती—सब सीवेज और रसायनों से भरी हैं।

पानी का संकट अब सीधा स्वास्थ्य संकट बन चुका है।

शहरों की हवा

दिल्ली ही नहीं, अब देहरादून जैसे शहर भी कई बार जहरीली हवा झेल रहे हैं।

यह साफ़ संकेत है कि ईको सिस्टम गड़बड़ा चुका है।

जंगल कटेंगे, बीमारियाँ बढ़ेंगी

जंगल कटते हैं, तो गर्मी बढ़ती है, बारिश बिगड़ती है और नई बीमारियाँ जन्म लेती हैं।

सबसे ज़्यादा नुकसान उन्हीं आदिवासी समुदायों को होता है, जो जंगल बचाते आए हैं।

भारत उस विकास मॉडल की कीमत चुका रहा है, जिसे उसने बनाया नहीं, लेकिन अब आंख मूंदकर अपना रहा है।

बिना सीमा का विकास = पक्का संकट

जब विकास बिना संयम के होता है,

जब सत्ता और कॉरपोरेट एक साथ खड़े हो जाते हैं,

और जब प्रकृति को सिर्फ “संसाधन” समझा जाता है—

तो संकट तय है।

यही बात हर सभ्यता ने कही थी।

और आज जलवायु विज्ञान उसी की पुष्टि कर रहा है।

महात्मा गांधी ने दशकों पहले जो चेतावनी दी थी, वही आज जलवायु संकट की असल जड़ है—लालच। धरती के पास ज़रूरत के लिए बहुत कुछ है, लेकिन लालच के लिए कुछ भी काफ़ी नहीं।

“पृथ्वी के पास हर व्यक्ति की ज़रूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त है,

लेकिन हर व्यक्ति के लालच को पूरा करने के लिए नहीं।”

— महात्मा गांधी

रास्ता अभी भी बचा है

जलवायु संकट कोई मशीन से हल होने वाली समस्या नहीं है।

यह सोच बदलने की मांग करता है।

अगर विकास, उपभोग और सत्ता की दिशा नहीं बदली,

तो कोई तकनीक हमें नहीं बचा पाएगी।

आज भी हमारे पास विकल्प है—

• या तो लालच और टूटते ईको सिस्टम का रास्ता

• या वह समझ, जो सीमाओं, जिम्मेदारी और सामूहिक भलाई पर टिकी थी.

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