विश्वबैंक की चेतावनी: गंगा के मैदान जहरीली हवा में डूबे, हिमालय में बर्फ़ गायब
मीडिया स्वराज डेस्क
19 जनवरी 2026 विश्व बैंक की एक नई रिपोर्ट ने दक्षिण एशिया के सामने खड़े एक गहरे पर्यावरणीय संकट को उजागर किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, एक तरफ़ इंडो-गंगेटिक मैदानों में हवा ज़हर बन चुकी है, तो दूसरी ओर हिमालय में बर्फ़बारी लगातार घटती जा रही है। ये दोनों संकट अलग नहीं, बल्कि एक ही विनाशकारी कहानी के दो अध्याय हैं।
“A Breath of Change: Solutions for Cleaner Air in the Indo-Gangetic Plains and Himalayan Foothills” नामक इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान और पाकिस्तान के लगभग एक अरब लोग रोज़ जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं।
हर साल 10 लाख मौतें, औसत उम्र तीन साल कम
विश्व बैंक के अनुसार, हवा में मौजूद PM2.5 जैसे सूक्ष्म कण हर साल करीब 10 लाख असमय मौतों के लिए जिम्मेदार हैं। लंबे समय तक ऐसी हवा में सांस लेने से लोगों की औसत उम्र तीन साल से ज्यादा घट रही है।
इस प्रदूषण का असर सिर्फ़ सेहत तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि इलाज, कामकाजी नुकसान और पर्यावरणीय क्षति के कारण यह संकट पूरे क्षेत्र की GDP का करीब 10 प्रतिशत निगल रहा है।
पांच वजहें, जिनसे दम घुट रहा है
विश्व बैंक ने साफ तौर पर बताया है कि इंडो-गंगेटिक क्षेत्र में वायु प्रदूषण के पीछे ये पांच मुख्य कारण हैं:
• घरों में लकड़ी, उपले और कोयले से खाना पकाना
• बिना फिल्टर वाले प्रदूषक उद्योग
• पुराने और डीज़ल-आधारित वाहन
• पराली जलाना और असंतुलित खेती
• कचरे और प्लास्टिक का खुले में जलाया जाना
रिपोर्ट मानती है कि सिर्फ़ एक सेक्टर पर काम करने से समाधान नहीं निकलेगा।
‘35 by 35’ लक्ष्य: बचने का आखिरी मौका
विश्व बैंक ने एक साझा लक्ष्य सुझाया है —
👉 2035 तक PM2.5 को 35 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से नीचे लाना
इसके लिए तीन स्तरों पर काम ज़रूरी बताया गया है:
1. प्रदूषण घटाना – स्वच्छ रसोई गैस, बिजली आधारित उद्योग, इलेक्ट्रिक वाहन, पराली का वैज्ञानिक समाधान
2. लोगों की सुरक्षा – बच्चों और बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था और चेतावनी प्रणाली
3. मजबूत शासन – राज्यों और देशों के बीच समन्वय, सख्त नियम और निगरानी
हिमालय में बर्फ़ नहीं: जल संकट की घंटी
इसी बीच, हिमालय से आ रही खबरें और भी डराने वाली हैं। वैज्ञानिक रिपोर्टों के मुताबिक, इस साल कई इलाकों में बर्फ़ लगभग नहीं गिरी। इसे विशेषज्ञ “स्नो ड्रॉट” यानी बर्फ़ का सूखा कह रहे हैं।
हिमालयी बर्फ़ पिघलकर गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियों को जीवन देती है। कुल जल प्रवाह का करीब 25 प्रतिशत हिस्सा बर्फ़ से आता है। जब बर्फ़ ही नहीं गिरेगी, तो गर्मियों में:
• पीने के पानी की कमी
• खेती पर संकट
• भूजल पर अत्यधिक दबाव
• बिजली उत्पादन में गिरावट
जैसे हालात बनेंगे।
हवा और बर्फ़: एक ही संकट की दो शक्लें
विशेषज्ञ बताते हैं कि पराली, कोयला और डीज़ल से निकलने वाला ब्लैक कार्बन हिमालय की बर्फ़ पर जम जाता है, जिससे बर्फ़ तेज़ी से पिघलती है। यानी मैदानों का प्रदूषण सीधे हिमालय को नुकसान पहुँचा रहा है।
यह एक खतरनाक चक्र है —
गंदी हवा → गर्म हिमालय → कम बर्फ़ → कम पानी → ज़्यादा संकट
नीति निर्धारकों के लिए साफ संदेश
विश्व बैंक की रिपोर्ट का संदेश साफ है:
👉 सिर्फ़ घोषणाओं से काम नहीं चलेगा
👉 हवा, पानी और जलवायु को एक साथ देखना होगा
अगर अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में भारत और दक्षिण एशिया को सांस लेने लायक हवा और बहने लायक नदियों — दोनों के लिए संघर्ष करना पड़ेगा।
यह सिर्फ़ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व का सवाल है।



