गंगा–यमुना सहित भारतीय नदियों में सीवेज संकट और शहरी नीति की विफलता

नदियाँ नालियाँ नहीं हैं

राम दत्त त्रिपाठी

भारत में नदियों की सफाई पर पिछले चार दशकों में हज़ारों करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। गंगा एक्शन प्लान से लेकर नमामि गंगे तक, हर सरकार ने यह दावा किया कि अब नदियाँ साफ होंगी। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए, मिशन बनाए गए, प्रोजेक्ट मंज़ूर हुए और रिपोर्टें तैयार की गईं।

लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि गंगा, यमुना, गोमती, रामगंगा, हिंडन और काली जैसी नदियाँ आज भी शहरी सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट से कराह रही हैं।

अब यह सवाल टालना संभव नहीं है—

अगर योजनाएँ हैं, तकनीक है और पैसा भी है,

तो हमारी नदियाँ आज भी गंदी क्यों हैं?

ईमानदार जवाब असहज है।

नदियाँ दुर्घटना से प्रदूषित नहीं हुईं।

उन्हें नीति के ज़रिये गंदा किया गया है।

1. मूल समस्या: नदियों को सीवर मान लेने की नीति

भारतीय शहरी नियोजन की सबसे बड़ी विफलता यह रही है कि नदियों को शहरों के सीवेज ढोने वाली नालियाँ मान लिया गया। शहरों की सीवर लाइनों का ढलान जानबूझकर नदी की ओर रखा गया। नालों को सीधे नदी से जोड़ा गया। और जब सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) फेल हुए—जो अक्सर होता है—तो सीवेज बिना किसी रोक-टोक के नदी में बहने लगा।

यह सब किसी दुर्घटना का परिणाम नहीं है।

यह डिज़ाइन की गई विफलता है।

हमने यह मान लिया कि नदी एक अंतहीन संसाधन है—जो शहरों की सारी गंदगी सह लेगी, खुद को साफ कर लेगी और चुपचाप बहती रहेगी। यही सोच नदियों की मौत का कारण बनी।

2. सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट: तकनीक नहीं, नीति की विफलता

सरकारों ने नदी सफाई का समाधान तकनीक में खोजा—सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट। लेकिन ज़मीनी अनुभव बताता है कि अधिकांश STP या तो पूरी क्षमता से काम नहीं करते या बिल्कुल ही फेल हो जाते हैं।

इसके प्रमुख कारण हैं:

• शहरों में सीवेज की मात्रा STP की क्षमता से कहीं अधिक

• अधूरा सीवरेज नेटवर्क—सीवेज प्लांट तक पहुँचता ही नहीं

• घरेलू सीवेज में औद्योगिक अपशिष्ट की मिलावट

• मानसून में प्लांट को बाईपास कर देना

• रखरखाव और निगरानी की भारी कमी

चार दशक बाद भी परिणाम शून्य हैं।

Yamuna Niver in Agra
Yamuna River in Agra

3. यमुना: दिल्ली से आगरा तक एक मरी हुई नदी

यमुना का सबसे भयावह रूप दिल्ली में दिखाई देता है। हिमालय से निकलने वाली यह नदी दिल्ली पहुँचते-पहुँचते लगभग एक नाला बन जाती है। यमुना की कुल लंबाई का केवल 2 प्रतिशत हिस्सा दिल्ली में है, लेकिन कुल प्रदूषण का लगभग 70 प्रतिशत यहीं डाला जाता है।

नजफगढ़, बारापुला और शाहदरा जैसे बड़े नाले सीधे यमुना में गिरते हैं। STP मौजूद हैं, लेकिन या तो वे पूरी क्षमता से नहीं चलते या उनके आउटफ्लो मानकों पर खरे नहीं उतरते।

आगरा में स्थिति और भी त्रासद है। ताजमहल के शहर में यमुना अधिकतर समय सूखी या काली दिखाई देती है। प्राकृतिक प्रवाह लगभग खत्म हो चुका है। नदी में जो पानी है, वह मुख्यतः सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट है।

4. गंगा: हरिद्वार से वाराणसी तक विरोधाभासों की नदी

हरिद्वार में गंगा को पवित्र माना जाता है, लेकिन शहर के भीतर कई नाले सीधे गंगा में गिरते हैं। धार्मिक आस्था और आधुनिक शहरी गंदगी का यह विरोधाभास गंगा की हालत बयान करता है।

कानपुर गंगा प्रदूषण का सबसे बड़ा उदाहरण है। यहाँ घरेलू सीवेज के साथ-साथ टेनरी उद्योगों का ज़हरीला अपशिष्ट दशकों से गंगा में जा रहा है। STP और CETP की घोषणाएँ हुईं, लेकिन ज़मीनी हकीकत नहीं बदली।

प्रयागराज में संगम की पवित्रता के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है। शहर के अधिकांश नाले सीधे गंगा और यमुना में गिरते हैं। कुंभ के समय अस्थायी इंतज़ाम होते हैं, लेकिन स्थायी समाधान नहीं।

वाराणसी में आधुनिक STP लगाए गए हैं, फिर भी कई स्थानों से कच्चा सीवेज गंगा में जाता है। यहाँ नदी साफ कम और रिपोर्ट ज़्यादा साफ दिखाई देती है।

5 गोमती: लखनऊ की जीवनरेखा या नाला?

गोमती लखनऊ की पहचान रही है, लेकिन आज यह शहर का सीवेज ढोने वाली नदी बन चुकी है। दर्जनों नाले सीधे गोमती में गिरते हैं। बहाव कम है, पानी ठहरा हुआ है और दुर्गंध आम बात है।

STP मौजूद हैं, लेकिन सीवेज की मात्रा और नदी की सहनशीलता के

बीच भारी असंतुलन है। गोमती यह दिखाती है कि राजधानी होना बेहतर नदी प्रबंधन की गारंटी नहीं है।

Gomti River in Lucknow
Gomti River in April 2025

6. रामगंगा: काग़ज़ों में साफ, ज़मीन पर गंदी

रामगंगा को अक्सर अपेक्षाकृत कम प्रदूषित नदी बताया जाता है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर शहरी नालों और औद्योगिक अपशिष्ट का असर साफ दिखता है। यहाँ भी वही कहानी दोहराई जाती है—STP हैं, लेकिन सीवेज का बड़ा हिस्सा बिना उपचार के नदी में चला जाता है।

7. हिंडन और काली: औद्योगिक ज़हर की नदियाँ

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की हिंडन और काली नदियाँ औद्योगिक प्रदूषण की भयावह मिसाल हैं। इनमें घरेलू सीवेज से अधिक औद्योगिक रसायन बहते हैं। कई इलाकों में भूजल और खेती तक प्रभावित हो चुकी है।

यहाँ नदी नहीं, ज़हरीला नाला बहता दिखाई देता है।

8. नमामि गंगे: सफाई मिशन या ठेका तंत्र?

नमामि गंगे को एक महत्वाकांक्षी सफाई मिशन के रूप में पेश किया गया। लेकिन समय के साथ यह एक ठेका-आधारित तंत्र बन गया।

राजनीतिक नेतृत्व, अफसरशाही, इंजीनियर, कंसल्टेंट और ठेकेदार—सभी के लिए परियोजनाएँ चलते रहना ज़रूरी है।

नदी साफ हो या न हो—प्रोजेक्ट चलते रहने चाहिए।

अगर नदी सचमुच साफ हो जाए, तो यह पूरा तंत्र सवालों के घेरे में आ जाएगा।

9. केंद्रीकृत शहरी शासन: नागरिकों की भूमिका कहाँ?

जल और सीवेज से जुड़े फैसले मंत्रालयों और मिशनों में होते हैं। नागरिक केवल करदाता बनकर रह जाते हैं। न उन्हें जानकारी मिलती है, न निगरानी का अधिकार।

जब तक सशक्त शहर सरकार, वार्ड-स्तरीय निर्णय और नागरिक निगरानी नहीं होगी, तब तक नदियों की हालत नहीं बदलेगी।

10. समाधान: सीवेज को नदी से अलग करो

समाधान जटिल नहीं है, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति माँगता है:

• विकेंद्रीकृत, स्थानीय सीवेज ट्रीटमेंट

• उपचारित पानी का पुनः उपयोग

• भूजल रिचार्ज

• वेटलैंड आधारित प्राकृतिक समाधान

सबसे ज़रूरी है—शहरों के सीवेज को नदियों से अलग करना

11. इकोलॉजिकल फ्लो: नदी को बहने दो

बिना पानी के नदी को साफ रखने का दावा

विज्ञान नहीं, पाखंड है।

नदी को ज़िंदा रखने के लिए उसका बहना ज़रूरी है।

निष्कर्ष: नदियाँ नहीं, शहर सुधारो

नदियों की सफाई कोई तकनीकी समस्या नहीं है।

यह एक राजनीतिक और नीतिगत चुनाव है।

जब तक हम यह नहीं मानेंगे कि नदियाँ नालियाँ नहीं हैं—

और शहरों को अपनी गंदगी खुद संभालनी होगी—

तब तक कोई मिशन, कोई योजना, कोई तकनीक

हमारी नदियों को नहीं बचा सकती।

( With input from ChatGPT)

Related Articles

Back to top button