15 पीढ़ियों बाद खोज निकाली पुरखों की जन्मभूमि

केरल के पलक्कड़ के निवासी कुलपति राजेंद्र अनायत के पूर्वज गोहाना के निकले

केरल का द्वार कहे जाने वाले पलक्कड के रहने वाले डॉ. राजेंद्र कुमार अनायत ने 15 पीढ़ियों के बाद अपने पुरखों की जन्मस्थली खोज निकाली है।

वह फिलहाल हरियाणा के सोनीपत में स्थित दीनबंधु छोटूराम यूनिवर्सिटी साइंस एंड टेक्नोलॉजी (डीक्रस्ट) के कुलपति हैं।

डॉ. राजेंद्र कुमार की इस खोज की कहानी भी बड़ी रोचक है।

कुलपति डॉ. राजेंद्र कुमार अनायत अपने नाम के आगे ‘अनायत’ सरनेम तो लगाते हैं, लेकिन वह न तो इसका संदर्भ जानते थे और न ही मतलब।

कई बार उन्होंने अपने पिता से अनायत का अर्थ भी पूछा, लेकिन वे नहीं बता पाए।

पिता से जानकारी न मिली तो खुद खोज लिया सच

दीनबंधू छोटूराम यूनिवर्सिटी साइंस एंड टेक्नोलॉजी के कुलपति डॉ. राजेंद्र कुमार अनायत केरल के पलक्कड़ के रहने वाले हैं।

वीसी ने वर्षों पहले अपने पिता गोपाल अनायत वासुदेवन और दादा वासुदेवन भट्टार्थी अनायत से कई बार अपने सरनेम का अर्थ पूछा, लेकिन वे बता नहीं पाए।

विश्वविद्यालय के वीसी नियुक्त होने के बाद एक दिन उनके पास गोहाना के एक गांव के ग्रामीण महेंद्र सिंह शास्त्री मिलने पहुंचे।

उन्होंने बताया कि वे भी ‘अनायत’ हैं। इस पर कुलपति की जिज्ञासा हुई कि ये अनायत कौन होते हैं?

महेंद्र सिंह ने उन्हें बताया कि उनके गांव का नाम अनायत है और शायद आपके पुरखे भी इसी गांव से गए होंगे।

वीसी ने बिना साक्ष्य इसे मानने से इनकार कर दिया।

कुछ दिन बाद महेंद्र सिंह शास्त्री और ग्रामीण अजीत सिंह फिर से वीसी से मिलने पहुंचे। फिर वही बात उठी।

इसके बाद तय हुआ कि हरिद्वार में जाकर भाह की वंशावली वाली पोथी देखी जाए।

हरिद्वार में पूर्ण और उनके बेटे जो गांव अनायत के लोगों की वंशावली का रिकॉर्ड रखते थे कि पोथी देखी गई।

इससे कुलपति से 15 पीढ़ी पहले के उनके पूर्वज श्रीकृष्ण अच्युत अनायत का उल्लेख मिला।

सबसे पहले उन्होंने अनायत सरनेम प्रयोग किया था, तब से कुलपति का परिवार अनायत सरनेम प्रयोग कर रहा है।

250 साल पूर्व केरल गए होंगे पुरखे

ग्रामीणों ने दावा किया कि करीब ढाई सौ साल पहले उनके पुरखे गांव से केरल गए होंगे।

इसके बाद वीसी ने मान लिया कि उनके पुरखे गोहाना के गांव अनायत से ही गए हैं।

वीसी ने बताया कि श्रीकृष्ण अच्युत अनायत पर शंकराचार्य जी का प्रभाव रहा होगा और जाकर केरल में बस गए होंगे।

वहां पर वे संस्कृत गुरु या राजा के पुरोहित रहे होंगे।

पूर्वजों ने जिंदा रखी संन्यास परंपरा

कुलपति अनायत ने बताया कि केरल में जाकर भी उनके पूर्वजों ने पूजा-पाठ और संन्यास परंपरा जारी रखी, जबकि केरल के लोग संन्यास परंपरा में विश्वास नहीं रखते।

उन्होंने बताया कि उनके तीन पूर्वज संन्यासी रहे हैं।

इनमें एक ने केदारनाथ में और दो ने काशी जी में अपने संन्यासी जीवन का लंबा समय बिताया और वहीं निर्वाण प्राप्त किया।

उत्तर भारत की संन्यास प्रथा को उनके पूर्वजों ने जिंदा रखा।

हरियाणा में बसने का मन

कुलपति डॉ. राजेंद्र कुमार अनायत ने बताया कि यह सच है कि पुरखों की जन्मभूमि ने ही उन्हें बुला लिया है और यह आज उनकी कर्मभूमि बन गई है।

इसका खिंचाव वह महसूस कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि वे अब कई बार गांव अनायत जा चुके हैं।

उनका मन है कि सेवानिवृत्ति के बाद वे यहीं बस जाएंगे और अपना बाकी का जीवन यहीं पूरा करेंगे।

साल-दो साल में कभी-कभार केरल में अपने रिश्तेदारों से मिलने जाया करेंगे।

गांव अनायत को मानते हैं परिवार

राजेंद्र कुमार अनायत ने बताया कि जबसे उन्हें पता चला है कि गांव अनायत उनके पुरखों की जन्मस्थली है तब से वे इसे गांव के लोगों को ही अपना परिवार मानते हैं।

ग्रामीण भी कुलपति को गांव अनायत रत्न की उपाधि दे चुके हैं। समय मिलने पर कुलपति गांव अनायत जाते हैं।

गांव की सरपंच रेखा रानी के पति मुकेश, डाॅ. अजीत सिंह, महेंद्र सिंह शास्त्री को अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं।

उनके पुरखों की जन्मभूमि उनकी कर्मभूमि बन गई है।

सौ साल से हत्यया-दुष्कर्म मुक्त है यह गांव

गांव अनायत के ग्रामीणों ने बताया कि सौ साल में गांव में कोई हत्या या दुष्कर्म की वारदात नहीं हुई।

गांव का कोई व्यक्ति किसी मामले में जेल में नहीं है। लोग पुलिस थाने नहीं जाते। छोटे-बड़े मामले गांव में ही निपटा लिए जाते हैं।

सरपंच के पति मुकेश ने बताया कि गांव के लोगों में देश सेवा का जज्बा कूट-कूटकर भरा है।

गांव से करीब सौ लोग सेना में हैं। लिखने-पढ़ने में गांव का नाम अनायत है जबकि बोलचाल में इसे न्यात गांव कहा जाता है।

Related Articles