2020 में आत्म निर्भर भारत का नजारा

टिप्पणी

हरीश चन्द्र आईएएस (अव प्रा)

देश का एक बटवारा 1947 और दूसरा बँटवारा वर्तमान  सरकार ने कोरोना वायरस  महामारी के दौरान 2020 में इंडिया और भारत का किया है, जिसमें भारत के 60 दिनों से भूखे- प्यासे ,बेबस ,लाचार  मजबूर मजदूर सिर पर गठरी लादे, कंधे पर बच्चे को बैठाए भूखे प्यासे रेल से कटते, दुर्घटना में मरते हजारों किलो मीटर पैदल इंडिया छोड़कर अपने गांव चले आ रहे  हैं।

तब और अब, १९४७ जैसे पलायन के दृश्य , चित्र साभार

यह वह  संवेदनहीन सरकार है जिसने क्या तो प्रत्येक भारतीय के खाते में 15 लाख रुपए जमा करने, स्विस बैंक से काला धन लाने और न जाने क्या क्या वादे किए थे, वह मजदूर भाई बहनों दो वक्त की रोटी , पानी, रात गुजारने के लिये  जगह भी न दे सकी। और तो और मजबूरी में घर पलायन के लिए बेबस मजदूरों को घर जाने की रेल सुविधा भी नहीं दे सकी , जबकि देश के लोगों की गाढ़ी कमाई से बनी रेल गाड़ी, रेल पटरी, स्टेशन ,इसके कर्मचारी रेल संचालन के बंद होने से खाली बैठे  हैं।

 अंत में रेल से भेजने के लिए सरकार तैयार भी हुई तो 600 रू किराया वसूलने लगी,फिर 85% केंद्र 15 % प्रदेश सरकार देगी का वादा, वह भी धोखा निकला। 

जबकि भाजपा के पहले की सरकार ने गल्फ वार के समय बिना थाली ,घंटा, घड़ियाल ,शंख बजाए, दिया जलाएं और कोरोना वॉरियर पर फूल वर्षा की नौटंकी किये 2 लाख भारतीयों को मुफ्त स्वदेश लाई थी। 

डॉक्टर , नर्स , सफाई कर्मी और पुलिस द्वारा सुरक्षा कवच PPE, मास्क, ग्लव मांगे जाने पर बेरहमी से पीट पीट कर जेल में बंद किया जा रहा  है । यह है आत्म निर्भर भारत की एक बानगी।

नोट : ये लेखक के निजी विचार हैं. 

 

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