Tag: कर्मयोग
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स्वधर्म पालन अत्यंत आवश्यक
संत विनोबा गीता प्रवचन में कहते हैं कि भाइयो, पिछले अध्याय में हमने निष्काम कर्मयोग का विवेचन किया। स्वधर्म को टालकर यदि हम अवांतर धर्म स्वीकार करेंगे, तो निष्कामतारूपी फल अशक्य ही है। स्वदेशी माल बेचना व्यापारी का स्वधर्म है। परंतु इस स्वधर्म को छोड़कर जब वह सात समुंदर पार का विदेशी माल बेचने लगता…
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फलत्याग को मिलता है अनंत फल
संत विनोबा कर्मयोग पर कहते हैं कि फलत्याग को अनंत फल मिलता है। भाइयो, गीता के दूसरे अध्याय में हमने सारे जीवन-शास्त्र पर निगाह डाली। अब तीसरे अध्याय में इसी जीवन-शास्त्र का स्पष्टीकरण है। पहले हमने तत्वों का विचार किया, अब उनकी तफसील में जायेंगे। पिछले अध्याय में कर्मयोग-संबंधी विवेचन किया था। कर्मयोग में महत्त्व…
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संयम मूर्ति होता है स्थितप्रज्ञ
गीता प्रवचन दूसरा अध्याय संत विनोबा कहते हैं कि ‘स्थितप्रज्ञ’ यानी स्थिर बुद्धिवाला मनुष्य, यह तो उसका नाम ही बता रहा है। परंतु संयम के बिना बुद्धि स्थिर होगी कैसे? अत: स्थितप्रज्ञ को संयम मूर्ति बताया गया है। बुद्धि हो आत्मनिष्ठ, और अंतर-बाह्य इंद्रियाँ हों बुद्धि के अधीन – यह है संयम का अर्थ। स्थितप्रज्ञ…