Tag: स्वधर्म
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स्वधर्म पालन अत्यंत आवश्यक
संत विनोबा गीता प्रवचन में कहते हैं कि भाइयो, पिछले अध्याय में हमने निष्काम कर्मयोग का विवेचन किया। स्वधर्म को टालकर यदि हम अवांतर धर्म स्वीकार करेंगे, तो निष्कामतारूपी फल अशक्य ही है। स्वदेशी माल बेचना व्यापारी का स्वधर्म है। परंतु इस स्वधर्म को छोड़कर जब वह सात समुंदर पार का विदेशी माल बेचने लगता…
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कर्म वही, परंतु भावना-भेद से आता है अँतर
संत विनोबा गीता प्रवचन करते हुए कहते हैं कि कर्म वही, परंतु भावना-भेद से उसमें अंतर पड़ जाता है। परमार्थी मनुष्य का कर्म आत्मविकासक होता है, तो संसारी मनुष्य का कर्म आत्मबंधक सिद्ध होता है। जो कर्मयोगी किसान होगा, वह स्वधर्म समझकर खेती करेगा। इससे उसकी उदरपूर्ति अवश्य होगी, परंतु उदरपूर्ति हो इसलिए वह खेती…
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संकुचित देह-बुद्धि स्वधर्म में बाधक
स्वधर्म हमें इतना सहज प्राप्त है कि हमसे अपने-आप उसका पालन होना चाहिए। परंतु अनेक प्रकार के मोहों के कारण ऐसा नहीं होता, अथवा बड़ी कठिनाई से होता है और हुआ भी, तो उसमें विष – अनेक प्रकार के दोष –मिल जाते हैं। स्वधर्म के मार्ग में काँटे बिखरने वाले मोहों के बाहरी रूपों की…
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स्वधर्म के सहारे ही उन्नति की राह
*गीता प्रवचन दूसरा अध्याय* स्वधर्म के सिलसिले में उपनिषद् में एक सुंदर कथा है। एक बार देव, दानव और मानव, तीनों प्रजापति के पास उपदेश के लिए पहुँचे। प्रजापति ने सबको एक ही अक्षर बताया – ‘द’। देवों ने कहा – “हम देवता लोग कामी हैं, हमें विषय भोगों की चाट लग गयी है। अत:…