Tag: अद्वैत

  • अखंड दर्शन से मोह-शोक नहीं होता

    अखंड दर्शन से मोह-शोक नहीं होता

    आज का वेद चिंतन विचार संत विनोबा ईशावास्य उपनिषद के 7वें मंत्र पर कहते हैं कि आज सुबह हम जगन्नाथ दास का भागवत पढ़ रहे थे। उसमें श्रीकृष्ण के अंतकाल के समय कवि कहता है कि अब मैं अनाथ हो गया हूं। उसने देखा कि वह धागा खंडित हो गया है। लेकिन वह उसने उपासना…

  • आत्मतत्व : अज्ञानी के लिए दूर, ज्ञानी के लिए पास

    आत्मतत्व : अज्ञानी के लिए दूर, ज्ञानी के लिए पास

    आत्मतत्व के बारे में बताते हुए संत विनोबा ईशावास्य उपनिषद का पांचवा मंत्र पढ़ते हैं –   तदेजति तन्नेजति तद्दूरे तदु  अन्तिके तद् अंतरस्य सर्वस्य तदु  सर्वस्यास्य बाह्यत:                            विनोबा कहते हैं कि मंत्र 4 से आत्मतत्व का वर्णन चल रहा है। तद एजति – वह हलचल करता है, तत् न एजति – वह हलचल नहीं…

  • अद्वैत की अवधारणा

    अद्वैत की अवधारणा

    डा चन्द्रविजय चतुर्वेदी ,प्रयागराज। द्वैत का अर्थ है दो का भाव, उसमे अ उपसर्ग जुड़ने पर अद्वैत पद की निष्पत्ति होती है जिसका अर्थ ही है अभाव  या निषेध। शंकर  अद्वैत का द्वैत से विरोध है,जैसे की प्रकाश का अंधकार से, विद्या का अविद्या से जहाँ अविद्या है वहीँ द्वैत है। यदि अब्राह्मण कहा जाये…