खुशहाली  से बहुत दूर भारतवासी

हाल के अंतरराष्ट्रीय आकलन और भारत की खुशहाली रिपोर्ट

खुशहाली
डॉ. अमिताभ शुक्ल

मानव जीवन का सर्वोच्च ध्येय खुशहाली प्राप्त करना होता है। यही उद्देश्य “विकास” का भी होता है।

लेकिन, भारत की स्थिति भिन्न है।

शोषण, अराजकता, गैर-जिम्मेदार सरकारें, अलोकतांत्रिक लोकतंत्र, बुनियादी नागरिक सुविधाओं से वंचित आम नागरिक, ऐसे में “खुशहाली” जो देश के “विकास”  के फलस्वरूप उत्पन्न हो  या  लोक-कल्याणकारी सरकारों के कल्याणकारी कार्यों से उत्पन्न हो कर ऐसा सामाजिक समरसता का वातावरण उत्पन्न  करें, जिनसे नागरिकों का जीवन “खुशहाल” हो।

पर  इस स्थिति से भारत और इस देश के नागरिक कोसों दूर हैं।

ताजा अंतरराष्ट्रीय आकलनों के निष्कर्ष और पिछड़ा भारत

वर्ष 2018 में विश्व बैंक द्वारा 151 देशों के ” मानव पूंजी सूचकांक 2018″ में भारत का स्थान 115वां  था।

अर्थात,  इस सूचकांक में शामिल चार संकेतकों –  5 वर्ष से कम आयु के शिशुओं की मृत्यु दर,  गुणवत्तापूर्ण  स्कूली शिक्षा,  वयस्क जीवितता दर और 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों के विकास में अवरुद्धता  की दृष्टि से भी भारत की स्थिति संतोषजनक स्तर से निम्न रही।

इसी प्रकार, वर्ष 2019 में  “संयुक्त  राष्ट्र सस्टेनेबल डेवलपमेंट नेटवर्क”  द्वारा विश्व के 156 देशों की “हैप्पीनेस रैंकिंग”  में भारत का स्थान 140वां था।

यह सर्वेक्षण वर्ष 2016 से 2018 के 3 वर्षों के औसत के अध्ययन के निष्कर्षों पर आधारित था, जिसमें दक्षिणी सूडान निम्नतम अर्थात 156वें स्थान पर था।

उधर, अमेरिका जैसा  विकसित देश भी 18वें स्थान से 19वें  स्थान पर आया था।

सहज- सामान्य निष्कर्ष है कि, विकास के नए-नए दिखावटी नारे लगाने  वाला भारत 140वें स्थान पर और अफ्रीका का पिछड़ा राष्ट्र सूडान 156वें क्रम  पर आया।

अर्थात,  विश्व के समस्त देशों में भारत और सूडान के क्रम का थोड़ा  सा ही अंतर खुशहाली के स्तर की स्थिति को स्पष्ट कर देता है।

इसी प्रकार 2020 के “हैप्पीनेस इंडेक्स” के अनुसार (2018-2019  के आंकड़ों पर आधारित)  156 देशों में भारत का स्थान 144वां है।

भारत का कुल स्कोर 3.573 रहा है, और जिस पाकिस्तान की दुर्दशा का वर्णन भारत और भारत की मीडिया में जोर-शोर से किया जाता है, उसका इस ” हैप्पीनेस इंडेक्स” में भारत से ऊंचा 66वां स्थान  है,  और स्कोर भी  भारत से अधिक 5.693 है।

पाकिस्तान में खुशहाली का यह स्तर रशिया, चीन, भारत और टर्की से भी उच्च स्तर का है।

रूस  का स्थान 73वां, अमेरिका का 19वां,  यूनाइटेड अरब अमीरात का  21वां,  सऊदी अरब का 27वां और चीन का 94वां है।

खुशहाली के उच्चतम स्तर पर फिनलैंड, डेनमार्क,  नॉर्वे और स्वीडन क्रमशः प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ स्थान पर हैं।

भारत के राज्यों के खुशहाली स्तर का ताजा आकलन

अभी एक सप्ताह पूर्व ही प्रथम बार भारत के समस्त राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के “समग्र हैप्पीनेस इंडेक्स”  जारी हुए हैं।

इसके निष्कर्ष भी यह बताने और समझने के लिए पर्याप्त हैं कि खुशहाली का वास्तविक, वैज्ञानिक अर्थ क्या है?

समस्त राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में “समग्र  खुशहाली”  के सर्वोच्च स्तर एवं प्रथम स्थान पर मिजोरम,  दूसरे स्थान पर पंजाब और  तीसरे स्थान पर अंडमान निकोबार हैं।

बड़े राज्यों में खुशहाली के प्रथम द्वितीय एवं तृतीय स्थान पर क्रमश:  पंजाब,  गुजरात एवं तेलंगाना हैं।

केंद्र शासित प्रदेशों में प्रथम,  द्वितीय एवं तृतीय स्थान पर क्रमशः अंडमान निकोबार, पुडुचेरी एवं लक्षद्वीप हैं।

यह अध्ययन  प्रो. राजेश पिलानिया द्वारा अभी इस साल ही  मार्च से जुलाई के मध्य किया गया था, यानी उन्होंने “कोविड-19 के प्रभावों” का आकलन भी किया।

उन्होंने यह पाया कि इस महामारी का सबसे बुरा प्रभाव क्रमश:  महाराष्ट्र  , दिल्ली और हरियाणा राज्यों पर हुआ,  जबकि खुशहाली के स्तर पर सबसे बुरा प्रभाव मणिपुर राज्य पर पाया गया।

खुशहाली के आकलनों  के भारत के संदर्भ में निष्कर्ष

उपरोक्त वर्णित परिणामों और उनके तुलनात्मक विश्लेषण से यह जाहिर है कि हैप्पीनेस एक बहुआयामी पहलू है जो दीर्घकालीन और समन्वित प्रयासों से प्राप्त किया जा सकता है।

इसके चार प्रमुख पायदान हैं – प्रथम – संपोष्य एवं समानता पर आधारित आर्थिक विकास,  द्वितीय – पर्यावरण संरक्षण, तृतीय – सुशासन और चतुर्थ – संस्कृति का संरक्षण एवं संवर्धन।

इस संदर्भ में भूटान के हैप्पीनेस सूचकांक का उल्लेख जरूरी है कि इन समस्त संकेतकों   के संरक्षण एवं संवर्धन पर भूटान खुशहाली के उच्च स्तर पर है और भारत में भी मिजोरम राज्य।

भारत के संदर्भ में इसका निष्कर्ष यह है कि विकास का वह स्तर  जो प्रसन्नता या हैप्पीनेस उत्पन्न करे, उससे हम बहुत दूर हैं।

मोटे तौर पर यह वह अवस्था है जिसमें समस्त नागरिकों को न केवल बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों, वरन जीवन को आरामदायक बनाने लायक पर्यावरण,  आर्थिक समृद्धि और व्यक्तिगत सुविधाएं भी हों,  कानून व्यवस्था ऐसी हो जो भयमुक्त वातावरण निर्मित करे  तथा समाज और सामाजिक व्यवहार में समानता हो।

वस्तुत: मानवीय- विकास,  जीवन स्तर और प्रसन्नता मापने के यह सारे उपक्रम,  प्रयास,  सर्वेक्षण इनके निष्कर्षों और तुलना  का उद्देश्य विश्व के विभिन्न देशों की सरकारों और व्यक्तियों को पब्लिक पॉलिसियों और व्यक्तिगत जीवन शैली पर पुनर्विचार करने का अवसर प्रदान करते हैं, ताकि हैप्पीनेस और गुणवत्तापूर्ण जीवन में वृद्धि  की जा सके।

जैसा कि “संपोष्य  विकास नेटवर्क”  के निदेशक जैफ्री सेव का कहना है  कि, “हम बढ़ते तनाव और नकारात्मक भावनाओं के दौर में हैं, जिसमें यह निष्कर्ष उन चुनौतियों पर प्रहार करने के लिए  हैं,  जिनसे हम जूझ रहे हैं।”

और  यही सबक  इस देश के नीति-निर्धारकों   और  कर्णधारों (?)  और आम जनता के लिए भी है।

अर्थशास्त्री प्रो. अमिताभ शुक्ल विगत 4 दशकों से शोध, अध्यापन और लेखन में रत हैं। उन्होंने भारत और विश्व के अनेकों देशों में अर्थशास्त्र और प्रबन्ध के संस्थानों में प्रोफेसर और निर्देशक के रूप में कार्य किया। आर्थिक विषयों पर 7 किताबें और 100 शोध पत्र लिखने के अलावा वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत की अर्थव्यवस्था संबंधी विषयों पर पत्र-पत्रिकाओं में लेखन का दीर्घ अनुभव है। “विकास” पर शोध कार्य हेतु  उन्हें “योजना आयोग” द्वारा “कौटिल्य पुरस्कार” से सम्मानित किया जा चुका है। प्रो. शुक्ल ने रीजनल साइंस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष और भारतीय अर्थशास्त्र परिषद की कार्यकारिणी परिषद के सदस्य भी रहे हैं।

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