वर्षा जल के शत प्रतिशत संग्रह हेतु तालाबो का पुनर्जीवन आवश्यक

पर्यावरण दिवस पर विशेष

वल्लभाचार्य पाण्डेय

वल्लभाचार्य पांडेय

व्यापक अर्थ में जब पर्यावरण पर बात हो तो भूगर्भ जल के गिरते स्तर की चिंता स्वाभाविक है. अनियमित जलवायु और जल के अंधाधुंध दोहन के चलते भूगर्भजल जल स्तर में वर्ष दर वर्ष कमी होती जा रही है. इसका एक बड़ा कारण तालाबो, पोखर और अन्य जलस्रोतो का धीरे धीरे समाप्त होना भी है. इन जल स्रोतों के मृतप्राय होने के कारण वर्षाजल का अवशोषण कम हो गया.

प्रायः तालाबो और उसके आसपास की भूमि पर अवैध अतिक्रमण और निर्माण के चलते मानसून काल में भी अधिकाँश तालाब पूरा भर नही पाते. पहले जब ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के घर कच्चे और मिटटी के होते थे तो तालाबो में जमा होने वाली सिल्ट, मकान बनाने अथवा लिपाई पुताई के लिए उपयोग में ली जाती थी, अब यह सिल्ट तालाब की तलहटी में जमा होकर उसकी गहराई को लगातार कम कर रही है.

विगत कुछ वर्षों में मनरेगा के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबो की मिटटी निकाल कर किनारे रिटेनिग वाल बना दिए जाने का चलन हुआ इससे वर्षा का पूरा जल तालाब तक नही पहुंच पाता है क्यूंकि वर्षा जल एकत्रीकरण हेतु लगाई गयी पाइप का व्यास पर्याप्त नही होता है.  वहीँ शहरी  क्षेत्र के तालाबो की तलहटी में पोलीथिन, थर्मोकोल, प्लास्टिक, पाउच सैशे के रैपर आदि जमा हो जाने से उसकी जल अवशोषित करने की क्षमता न्यूनतम हो गयी है इस कारण अब ये तालाब वर्ष भर के लिए जल का संग्रह नही कर पाते हैं. जलकुम्भी भी तालाबो की मौत का एक बड़ा कारक है इसे पूरी तरह नियंत्रित किये जाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अभियान की जरूरत है.

विगत कुछ दशको में जल स्रोतों पर हुए अवैध कब्जे के कारण प्रायः इनका अस्तित्व ही संकट में है. इस आलोक में यह संदर्भ देना व्यवहारिक होगा कि भारत में ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के तालाबो पर अवैध कब्जे या पट्टे को हटाते हुए उसे सन 1952 (1359 फसली) के राजस्व रिकार्ड में अंकित क्षेत्रफल के अनुसार अतिक्रमण मुक्त करा कर पुनर्जीवित करने के लिए न्यायालय और शासन की तरफ से विभिन्न आदेश किये जाते रहे हैं.

माननीय सुप्रीमकोर्ट द्वारा हिंचलाल तिवारी बनाम कमला देवी मामले में (अपील  (सिविल) 4787 / 2001) आदेश दिनांक 25 जुलाई 2001 और इसके बाद समय समय पर विभिन्न याचिकाओं में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा भी इस सम्बन्ध में आदेश निर्गत किये है. दुर्भाग्य से ये सभी आदेश सम्बंधित जिलाधिकारियों और उप जिलाधिकारियों के कार्यालय की फाइलों में पड़े रह गये. माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में दाखिल जनहित याचिका सपोर्ट इण्डिया वेलफेयर सोसाइटी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार जनहित याचिका-1474/2019 में आदेश दिनांक 16 सितम्बर 2019 में दिए गये निर्देश के अनुसार सभी जिले के जिलाधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने जिले में अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) की अध्यक्षता में एक समिति बना कर सभी तालाबो और पोखरों की स्थिति की रिपोर्ट तैयार करें और उसे सभी प्रकार से कब्जा, अतिक्रमण, पट्टा मुक्त कराते हुए सन 1952 के राजस्व अभिलेखों में वर्णित रकबे के अनुसार स्थापित करेंगे तथा इसकी रिपोर्ट प्रत्येक 6 महीने पर मुख्य सचिव को भेजेंगे.

यह आदेश बहुत ही व्यापक और पूर्व के सभी निर्देशों को सम्मिलित करते हुए दिया गया है. आज के परिदृश्य में समाज के जागरूक लोगों और पर्यावरण के प्रति सचेत लोगों के लिए यह एक बड़ा अवसर है जब लगातार दबाव बनवा कर इस आदेश का अधिकतम संभव अनुपालन कराने की कोशिश की जा सकती है. उक्त जल स्रोतों के पुनर्जीवन से वर्षा के जल का अधिकतम संरक्षण हो पायेगा और भूगर्भ जल स्तर में वृद्धि होगी.  

आज जब हम कोरोना संकट के कारण एक बड़े आर्थिक संकट के दौर में जाने वाले हैं तब तलाबो और पोखरों का महत्व और बढ़ जाता है, मृतप्राय तालाबो को पुनर्जीवित करके हमे इसे आजीविका के साधन के रूप में विकसित करने के भी प्रयोग करने होंगे. मत्स्यपालन, झींगा पालन, बतख पालन आदि के साथ कमल, सिंघाड़ा, मखाना आदि की खेती के अवसर तलाशना कुछ ग्रामीण परिवारों की आजीविका के लिए एक बेहतर विल्कप हो सकता है

भूगर्भ जल संकट के दृष्टिगत समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी बनती है हम अपने जल स्रोतों को पुनर्जीवित करें और कोशिश करें कि शत प्रतिशत वर्षाजल का संग्रह हो. जब वर्षाजल प्रचुर मात्रा में धरती में अवशोषित होकर सुरक्षित हो जाएगा तो वर्षा सत्र के बाद वही जल वापस आकर हमारे जल स्रोतों को सनीर बनाये रखेगा और हमारी धरती मां के आंचल को हमेशा हरा भरा रखने में सहायक होगा.

 

-वल्लभाचार्य पाण्डेय (सामाजिक कार्यकर्ता)

ग्राम भंदहां कला (कैथी) , वाराणसी

मो: 9415256848

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