लंदन में शिवकॉंत का बग़ीचा

शिव कॉंत
शिव कॉंत

शिवकांत, बीबीसी रेडियो के पूर्व सम्पादक, लंदन से 

उत्तरी लंदन के यूनानी और तुर्कों के इलाक़े में बीस साल रहने के बाद मन कर रहा था कि किसी भारतीय बहुल इलाक़े में चला जाए। पाँच साल पहले पश्चिमी लंदन के हेज़ इलाक़े में एक मकान की बग़िया को देखकर मन बना और उत्तर से पश्चिम को कूच कर गए। लेकिन उस मकान में आते ही भारत लौटने का मन हुआ और बेचारी बग़िया जहाँ थी वहीं रह गई। शायद कोसती भी रही हो और मनाती रही हो कि बाबू जी चल तो दिए हो वतन की मौज में पर लौट कर यहीँ आना होगा। दो साल पहले जब लौटना हुआ तो बग़िया की सुध ली। खर-पतवार और काँटेदार झाड़-झंखाड़ से निजात दिलाने के बाद उनके एकछत्र राज में दबे-सहमे सेब, जापानी नाशपाती के किशोर पेड़ों और आलूबुख़ारे के बूढ़े बीमार पेड़ में नई जान आई। हाथी घास की जगह लॉन ने ली और जंगली शहतूत की झाड़ियों की जगह रंगबिरंगी क्लेमेटिस और चमेली की बेलों ने। गुलाबों, क्रिसेंथिमम और डहेलिया के पौधों पर बसंत के साथ बहार आने लगी.

 यह सब पिछले साल की बात है। तब बग़िया से ज़्यादा सुबह की सैर के लिए अपने मनपसंद बरा हॉल पार्क में जाने और इंगलैंड के ख़ूबसूरत देहात में घूमने में वक़्त बीतता था। बग़िया देखभाल से ख़ुश थी पर शायद उसे साथ न मिलने का मलाल रहता हो। इस साल वसंत के साथ-साथ हमला बोल देने वाले कोरोना वायरस ने सारा खेल ही बदल दिया। पिछले दो महीनों से वही उपेक्षित सी बग़िया कोरोना-काल का एकमात्र सहारा बनकर महकी है। बाहर तो आना-जाना होता नहीं और न ही मिलने वालों का आना-जाना होता है। इसलिए बस घर है और उसकी बग़िया जिसमें ख़ुशकिस्मती से इस साल अप्रेल और अब मई के ताप के ताए मौसम ने पेड़-पौधों में नई ऊर्जा फूँक दी है। इस बार मार्च तक जमकर बरसात हुई है और पिछले डेढ़ महीने से भूमध्यसागरीय देशों जैसा धूपभरा और सुहाना मौसम है। आम तौर पर यहाँ मई तक बूँदाबाँदी होती रहती है और सर्द हवाएँ पीछा नहीं छोड़तीं। लेकिन इस बार मौसम थोड़ा मेहरबान है। शायद उसे भी कोरोना का प्रकोप झेल रहे अंग्रेज़ों पर दया आ गई है। वे सैर और बाग़बानी के शौकीन होते हैं। सैर तो कोरोना ने होने नहीं थी पर बाग़बानी ने कोरोना की पाबंदियों को काबिल-ए-बर्दाश्त बनाने में बड़ी मदद की है।

 

 

 

2 Comments

  1. उपवन के फूल और फल लाजवाब हैं। ये तो किसी पार्क मे भी साधारणतः नही दिखते।

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