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	<title>डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर Archives - Media Swaraj | मीडिया स्वराज</title>
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	<description>Latest information &#38; Lifestyle News Portal</description>
	<lastBuildDate>Fri, 24 Sep 2021 12:30:22 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
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		<title>ट्रायल कोर्ट  में तारीख़ दर तारीख़ पर सुप्रीम कोर्ट की रोक</title>
		<link>https://mediaswaraj.com/supreme-court-direction-for-no-adjournment-in-trial-courts/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Media Swaraj]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 24 Sep 2021 12:30:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कानून]]></category>
		<category><![CDATA[डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर]]></category>
		<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[Supreme Court]]></category>
		<category><![CDATA[न्यायमूर्ति अज्जिकुत्तिरा सोमैया]]></category>
		<category><![CDATA[न्यायाधीश मुकेशकुमार रसिकभाई (एम.आर.) शाह और न्यायमूर्ति अज्जिकुत्तिरा सोमैया (ए.एस.) बोपन्ना]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग]]></category>
		<category><![CDATA[लालफीताशाही के ज़ाल]]></category>
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					<description><![CDATA[डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर बृहस्पतिवार (23 सितम्बर) को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के बार-बार मामलों के स्थगन -तारीख़ दर तारीख़ पर रोक लगा दी है। सर्वोच्च अदालत ने वकीलों के सुनवाई टालने के किसी प्रकार के अनुरोध को मंजूर करने से जजों को मना कर दिया है। मध्यप्रदेश के एक मामले में चार साल की &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<div class="wp-block-image is-style-default"><figure class="alignleft size-large is-resized"><img decoding="async" src="https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/Dr.-Matsyendra-Prabhakar-782x1024.jpg" alt="Dr Matsyendra Prabhakar" class="wp-image-19513" width="97" height="127" srcset="https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/Dr.-Matsyendra-Prabhakar-782x1024.jpg 782w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/Dr.-Matsyendra-Prabhakar-229x300.jpg 229w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/Dr.-Matsyendra-Prabhakar-768x1005.jpg 768w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/Dr.-Matsyendra-Prabhakar.jpg 978w" sizes="(max-width: 97px) 100vw, 97px" /><figcaption>डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर</figcaption></figure></div>



<p>बृहस्पतिवार (23 सितम्बर) को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के बार-बार मामलों के स्थगन -तारीख़ दर तारीख़  पर रोक लगा दी है। सर्वोच्च अदालत ने वकीलों के सुनवाई टालने के किसी प्रकार के अनुरोध को मंजूर करने से जजों को मना कर दिया है। मध्यप्रदेश के एक मामले में चार साल की देर और 10 बार सुनवाई टालने पर न्यायाधीश मुकेशकुमार रसिकभाई (एम.आर.) शाह और न्यायमूर्ति अज्जिकुत्तिरा सोमैया (ए.एस.) बोपन्ना की पीठ ने नाराजगी जतायी। कहा कि “अब वक़्त है ‘वर्क कल्चर’ को बदलने का। …बार-बार स्थगन से कानूनी प्रक्रिया धीमी होती है। ऐसे में न्याय वितरण प्रणाली में विश्वास बहाल करने की कोशिश की जानी चाहिए, जिससे ‘कानून के शासन’ में विश्वास बना रहे।”</p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color" style="font-size:30px"><br>आम आदमी का भरोसा बनाएं</p>



<p>न्यायमूर्ति शाह ने अपने निर्णय में कहा कि कई दफा बेईमान वादियों की बार-बार सुनवाई टलवाने की रणनीति से दूसरे पक्ष को न्याय पाने में देर होती है। बार-बार स्टे (स्थगन) देने से वादियों का विश्वास डगमगाने लगता है। न्याय प्रशासन में लोगों के विश्वास को मजबूत करने के उद्देश्य के लिए अदालतों को बार-बार कर्त्तव्यों का पालन करने के लिए कहा जाता है। अदालत ने कहा कि “कोई भी प्रयास जो न्याय व्यवस्था में आम आदमी के विश्वास को कमजोर करता है, उसे अवश्य रोका जाना चाहिए।”<br>उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इसलिए अब अदालतें नियमित रूप से मामलों पर स्थगन नहीं देंगी और न्याय में देर के लिए जिम्मेदार नहीं होंगी। “एक कुशल न्याय व्यवस्था लाने और कानून के शासन में विश्वास को बनाये रखने के लिए अदालतों को मेहनत करनी चाहिए। मामलों पर अदालतों को समय पर कार्रवाई करनी चाहिए। न्यायिक अधिकारियों को वादियों के प्रति अपने कर्त्तव्यों को ध्यान में रखना होगा। जो न्याय के लिए आये हैं और जिनके लिए अदालतें हैं, उन्हें समय पर न्याय दिलाने का प्रयास होना चाहिए।”<br>वर्षों से ज़ारी दस्तूर तोड़ें<br>सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “न्याय वितरण प्रणाली (न्याय देने) में सालों से चली आ रही इस अदम्य ‘स्थगन संस्कृति’ के चलते वादियों का ‘फास्ट ट्रायल’ का अधिकार मायावी हो गया है।“ न्यायमूर्ति शाह ने कहा- “इस प्रकार की देर, लम्बी रणनीति, बार-बार स्थगन की माँग करने वाले वकीलों और अदालतों के द्वारा यंत्रवत और नियमित रूप से स्थगन देने के कारण बढ़ रही है। शीर्ष अदालत ने चेतावनी देते हुए कहा कि “इस तरह की प्रणाली अपनाये जाने से न्याय व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होता है।”</p>



<p class="has-vivid-cyan-blue-color has-text-color" style="font-size:30px"><br>न्याय में देर की वज़हें</p>



<p><br>दरअसल, देशभर की अदालतों में न्यायिक प्रक्रिया को देर तक लटकाये रखना रवायत बन गयी है। हालाँकि इसके पीछे अनेक वज़हें हैं लेकिन निचली अदालतों में भ्रष्टाचार और न्यायिक अधिकारियों के द्वारा की जाने वाली मनमानी, उनमें व्याप्त उदासीनता, उनकी संवेदनहीनता तथा दायित्वों के प्रति होती कमी प्रमुख है। दूसरी तरफ़ अदालतों में कर्मचारियों के साथ न्यायाधीशों के भी काफी पहले से स्वीकृत पद ही बड़ी संख्या में खाली पड़े हैं जबकि आबादी तथा मामलों के बढ़ते जाने के बाद रिक्त स्थानों को शीघ्र भरने के साथ पद बढ़ाये जाने की ज़ुरूरत है। देश में स्थापित 25 उच्च न्यायालयों में जजों के क़रीब 45 फ़ीसद पद लम्बे समय से खाली हैं। इससे भी अधीनस्थ न्यायालयों में नयी नियुक्तियाँ होने में अड़चनें आती हैं। </p>



<p>बीती जुलाई में सरकार ने संसद में कुछ आँकड़े पेश किये थे। इनके मुताबिक़ सभी उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के कुल 1,098 पद स्वीकृत हैं। हालाँकि इसी 18 सितम्बर को प्रकाशित एक रिपोर्ट कहती है कि कार्यरत न्यायमूर्तियों की तादाद सिर्फ़ 633 है। यानी 465 स्थान खाली हैं। 25 में से आठ (8) हाईकोर्टों में तो मुख्य न्यायाधीशों के स्थान ही लम्बे समय से रिक्त हैं। रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने इन पदों को भरने समेत 13 मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए निर्णय कर लिया है। इनमें पाँच {5} मुख्य न्यायाधीशों को स्थानान्तरित किया जाना है।<br>मुख्य न्यायाधीशों के खाली पदों का ज़िम्मा कार्यवाहक न्यायाधीशों पर है। उनका अधिकांश समय प्रशासनिक कार्यों में बीतता है। न्यायाधीशों की कमी से उच्च न्यायालयों में ही लम्बित वादों की संख्या लाखों में है जबकि इनके समेत देश की अदालतों में कुल लम्बित मुक़दमे क़रीब तीन करोड़ के ऊपर पहुँच गये हैं। सर्वाधिक मामले उत्तर प्रदेश के बाद पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में हैं। यों, इस सम्बन्ध में इस समय कोई अधिकृत जानकारी अनुपलब्ध है। खुली अदालतों से मुक़दमों को निपटाने में अहम मदद मिली थी किन्तु लगभग दो साल से कोरोना के चलते राज्यों में खुली अदालतों का आयोजन ठप पड़ गया है।</p>



<p class="has-vivid-green-cyan-color has-text-color" style="font-size:30px"><br>न्याय में देरी पर एनएचआरसी भी चिन्तित</p>



<p><br>अभी 18 अगस्त को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (एनएचआरसी) कोर ग्रुप की पहली बैठक हुई थी। आपराधिक न्याय प्रणाली पर केन्द्रित इस बैठक में भी जनता को न्याय मिलने में देरी ख़त्म करने तथा त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधारों की धीमी गति पर गम्भीर चिन्ता जतायी गयी थी। बैठक यह बात उभर कर आयी कि मामले निपटारे में देरी के फलस्वरूप विचाराधीन और दोषी कैदियों तथा मामलों से सम्बन्धित अन्य व्यक्तियों के मानव अधिकारों का उल्लंघन होता है। हालाँकि इसमें कुछ ठोस नहीं निकाल कर आ सका क्योंकि इसका विषय बिन्दु विशेष तक सिमटकर रह गया। </p>



<p>बैठक की अध्यक्षता करते हुए न्यायमूर्ति एम.एम. कुमार का कहना था कि “आपराधिक न्याय प्रणाली और त्वरित सुनवाई में ‘पुलिसिंग’ महत्वपूर्ण है। पुलिस सुधार की माँग करने वाले सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों सहित कई प्रयासों के बावजूद जमीनी हकीकत बहुत ज्यादा नहीं बदली है। उनका सुझाव था कि आईपीसी में कुछ प्रावधानों को हटाया जा सकता है और ‘टॉर्ट्स’ के कानून के तहत निवारण के लिए छोड़ दिया जा सकता है, जैसा कि इंग्लैंड में है। इस सन्दर्भ में उन्होंने अवैध कारावास का उदाहरण दिया। </p>



<p>कहा कि जब नये कानून पारित किये जाते हैं, तो उनकी प्रभाव आकलन रिपोर्ट को इसके साथ संलग्न किया जाना चाहिए जिसमें अनुमानित व्यय, जनशक्ति और बुनियादी ढाँचे को दर्शाया गया हो। इस बारे में उन्होंने उस मामले का उदाहरण दिया जब “परक्राम्य लिखत अधिनियम” में धारा-138 को जोड़ा गया था और चेक बाउंस को अपराध बना दिया गया था। त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए, न्यायमूर्ति कुमार ने सुझाव दिया कि दिन-प्रतिदिन के आधार पर एक समेकित परीक्षण के लिए एक जाँच अधिकारी/एक विचारण न्यायाधीश होना चाहिए।</p>



<p>भारत की न्यायिक व्यवस्था के बारे में बहुत सी बातें आये दिन होती हैं। इनमें एक कहावत सर्वाधिक मशहूर हो चली है। “यहाँ बाबा के द्वारा दायर मुक़दमे उसका बेटा लड़ता है और फ़ैसला पोते के जीवनकाल में सुनाया जाता है।” इस सम्बन्ध में 28 साल पहले बनी बॉलिवुड की हिन्दी फिल्म &#8216;दामिनी&#8217; का डायलॉग भी बहुचर्चित है। </p>



<p>इसमें फिल्म के नायक सन्नी देओल अदालत में जज के सामने चिल्ला पड़ते हैं- “तारीख पर तारीख़…, तारीख़ पर तारीख़, … तारीख़ पर तारीख़, और तारीख़ पर तारीख़ मिलती रही है… लेकिन इंसाफ नहीं मिला- ‘माय लॉर्ड’, इंसाफ नहीं मिला। मिली है तो सिर्फ ये तारीख़।”</p>



<p> इसको एक हालिया नज़ीर से आसानी से समझा जा सकता है। घटना बीती 17 जुलाई की है। दिल्ली में कड़कड़डूमा जिला अदालत के कक्ष संख्या 66 में जमकर हंगामा हुआ। 2016 से लम्बित मुक़दमे में बार-बार तारीख़ मिलने से एक वादी राकेश बौखला गया। न्याय मिलने में देर से उसका गुस्सा् सातवें आसमान पर जा पहुँचा। </p>



<p>अदालत कक्ष के रीडर ने जब उसे सुनवाई के लिए अगली तारीख़ काफी लम्बे समय बाद की दी तो वह आपा खो बैठा। सन्नी देओल की तर्ज़ पर ‘तारीख़ पे तारीख़’ चिल्लाते हुए उसने न्यायालय कक्ष के कम्प्यूटर और फर्नीचरों की तोड़फोड़ की। न्यायाधीश के बैठने के स्थान को भी नुकसान पहुंचाया। … लेकिन लगता है कि अब शायद इस दुष्प्रवृत्ति पर रोक लग सके!</p>



<p> देश में हर क्षेत्र में कार्य संस्कृति में धीमी गति से ही सही, क्रमश: सुधार हो रहा है! उम्मीद की जा सकती है कि लोगों को इंसाफ़ ज़ल्द मिले, पर ध्यान रखना होगा कि सारी बातें आदेश तक ही न सिमट जाएँ! देश में लालफीताशाही के ज़ाल को भी तोड़ना होगा जो सबसे बड़ी चुनौती है!</p>
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			</item>
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		<title>व्हाट्सऐप की नीतियों में बदलाव : निशाने पर तीन खरब डॉलर</title>
		<link>https://mediaswaraj.com/whatsapp-privacy-policy-change-dr-matsyendra-prabhakar/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Media Swaraj Desk]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 15 Jan 2021 12:35:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर]]></category>
		<category><![CDATA[तकनीकी]]></category>
		<category><![CDATA[दुनिया]]></category>
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		<category><![CDATA[व्हाट्सऐप की नीतियों]]></category>
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					<description><![CDATA[व्हाट्सऐप WhatsApp की नीतियों में बदलाव को लेकर भारत समेत समूची दुनिया में गहरी आशङ्का है।ये नीतियाँ 9 फ़रवरी से लागू होनी हैं. डा मत्स्येन्द्र प्रभाकर का शोधपूर्ण लेख सतर्क सञ्चार प्रेमियों के बीच लगभग पखवारे भर से एक हौव्वा (जिसे कहीं-कहीं ‘हाबू’ कहते हैं) फैला हुआ है। यह ‘काल्पनिक भय’ 9 फ़रवरी से लागू &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-medium-font-size">व्हाट्सऐप WhatsApp की नीतियों में बदलाव को लेकर भारत समेत समूची दुनिया में गहरी आशङ्का है।ये नीतियाँ 9 फ़रवरी से लागू होनी हैं. डा मत्स्येन्द्र प्रभाकर का शोधपूर्ण लेख </p>



<p>सतर्क सञ्चार प्रेमियों के बीच लगभग पखवारे भर से एक हौव्वा (जिसे कहीं-कहीं ‘हाबू’ कहते हैं) फैला हुआ है। यह ‘काल्पनिक भय’ 9 फ़रवरी से लागू होने जा रहीं व्हाट्सऐप की नीतियों में बदलाव को लेकर है। इससे भारत समेत समूची दुनिया में गहरी आशङ्का है। इस क़दम से सर्वाधिक आहत वे लोग हैं जो संलाप (चैटिंग) के अलावा किसी को अपने दस्तावेज़ आदि फ़ौरन और मुफ़्त भेजने, बिना शुल्क वॉइस व वीडियो कॉलिंग और अन्य मक़सद से व्हाट्सऐप का इस्तेमाल बरसों से करते आये हैं।</p>



<p>हालाँकि  व्हाट्सऐप  WhatsApp ने अख़बारों में बड़े- बड़े विज्ञापन देकर सफ़ाई दी है कि उसकी नीतियों में <a href="https://hindi.theprint.in/india/whatsapp-clarified-said-policy-changes-will-not-affect-the-privacy-of-messages/194413/">बदलाव से लोगों की निजता के अधिकार पर फ़र्क़ नहीं पड़ेगा</a>. </p>



<p class="has-white-color has-black-background-color has-text-color has-background has-medium-font-size"><strong>आईफ़ोन पर सशुल्क था व्हाट्सऐप…</strong></p>



<p>दरअसल, तत्क्षण सन्देश सुविधा प्रदाता (इन्स्टैण्ट मैसेजिंग ऐप ऑपरेटिंग) कम्पनी  WhatsApp व्हाट्सऐप ने अपने उपयोगकर्ताओं (यूजर्स) की निजी जानकारियाँ व्यावसायिक भागीदारों के साथ साझा करने की घोषणा की है। अभीतक व्हाट्सऐप यूजर्स की कोई सूचना शेयर करना तो दूर, उसे ‘सेव’ (जमा) तक नहीं करता था। <strong>13 फ़रवरी 2020 </strong>के आँकड़ों के मुताबिक़ दुनियाभर में व्हाट्सऐप के 2 अरब से अधिक ‘यूजर्स’ थे। इसकी लोकप्रियता का <a href="https://www.bbc.com/hindi/india-55590804">अन्दाज़ा</a> इस बात से लगा सकते हैं कि एक दिन में इसके यूजर्स औसतन 23 या, अधिक बार इसे खोलते हैं। यह हालत तब है जबकि दुनिया की आबादी का पाँचवाँ हिस्सा समेटे चीन और संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, सीरिया व क्यूबा में व्हाट्सऐप प्रतिबन्धित है। व्हाट्सऐप यूजर्स से कोई शुल्क नहीं लेता लेकिन प्रारम्भ में आईफ़ोन से व्हाट्सऐप चलाने वालों से यह एक डॉलर लेता था। यह सुविधा-शुल्क 2016 में समाप्त कर दिया गया।</p>



<p class="has-white-color has-black-background-color has-text-color has-background has-medium-font-size"><strong>‘नासा’ से अधिक है बाज़ार मूल्य</strong>&#8230;</p>



<p><strong>5 जनवरी 2021</strong> को व्हाट्सऐप ने अपनी नीति में परिवर्तन का ऐलान किया तो दुनिया भर में लोग, ख़ासकर सूचना-सन्देश जैसी सञ्चार सेवाओं का उपयोग करने वाले हड़कम्प में आ गये। उनकी निजता (प्राइवेसी) को लेकर बहस छिड़ गयी। चूँकि ‘साइबर क्राइम’ (सञ्चार सेवाओं के ज़रिये अपराध) पूरी दुनिया में नित-नये स्वरूप में विकसित हो रहा है इसलिए यूजर्स का निजता को लेकर सशङ्कित होना लाज़िमी है; लेकिन नयी पॉलिसी के पीछे बहुत बड़ा व्यापारिक लक्ष्य है। </p>



<p>इसकी वज़ह WhatsApp व्हाट्सऐप और इसकी मालिक कम्पनी ‘फ़ेसबुक इंक’ की दुनिया में सर्वाधिक लोगों तक सीधी पहुँच है। उल्लेख आवश्यक है कि विश्व में हर तीसरा आदमी फ़ेसबुक चलाता है। इसके यूजर्स 24 घण्टे में 60 अरब सन्देश भेजते हैं। यह आँकड़ा भी पिछले वर्ष फ़रवरी का है। तब दुनिया में कुल 2 अरब, 41 करोड़ से अधिक लोग फ़ेसबुक इस्तेमाल कर रहे थे। इनमें 200 करोड़ लोग व्हाट्सऐप चला रहे थे। व्हाट्सऐप की ‘मार्किट वैल्यू’ 19 जुलाई 2020 को कुछ देशों की जीडीपी से कहीं अधिक 50.7 बिलियन डॉलर थी। इस मामले में विश्व की प्रमुख अन्तरिक्ष कम्पनी ‘नासा’ तक व्हाट्सऐप से पीछे है।</p>



<p class="has-white-color has-black-background-color has-text-color has-background has-medium-font-size"><strong>दो बिजिनेस प्लेटफ़ॉर्म पहले से…</strong></p>



<div class="wp-block-image"><figure class="alignleft size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/image-13.png" alt="=व्हाट्सऐप" class="wp-image-19514" width="251" height="239" srcset="https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/image-13.png 371w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/image-13-300x285.png 300w" sizes="auto, (max-width: 251px) 100vw, 251px" /><figcaption>व्हाट्सऐप</figcaption></figure></div>



<p><strong>व्हाट्सऐप की शुरुआत 2009 में हुई</strong>। इसके पहले एप्पल का एक आईफ़ोन सेट खरीदने वाले जेन कूम ने पश्चिमी सैन ज़ोश शहर में अपने रूसी मूल के मित्र एलेक्स फिशमैन के घर इस ऐप को विकसित करने पर कई दौर में विचार किया था। कालान्तर में कूम ने एक और मित्र अमेरिका के ब्रायन एक्टन की मदद से अपने विचार को अंज़ाम दिया। कुछ समय बाद &#8216;वेञ्चर कैपिटलिस्ट&#8217; जिम गोएट्ज भी इसमें शामिल हो गये। <strong>19 फ़रवरी, 2014 को फ़ेसबुक ने 19 अरब डॉलर में व्हाट्सऐप को खरीद लिया। 2015 में व्हाट्सऐप परिवर्द्धित रूप में भारत आया।</strong> आज यहाँ इसके लगभग <strong>45 करोड़ </strong>नियमित उपयोगकर्ता हैं। अलबत्ता, व्हाट्सऐप अपने ब्राण्ड के प्रचार पर कोई ख़र्च नहीं करता। इसके विपरीत, इसने 2015 में दो ‘बिजिनेस प्लेटफ़ॉर्म’ बना लिये। इनमें छोटी बिजिनेस कम्पनियों के लिए “<strong>व्हाट्सऐप बिजिनेस</strong>” जबकि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए “व्हाट्सऐप बिजिनेस एपीआई” है।</p>



<p><a href="https://mediaswaraj.com/american-president-trump-dictators-dont-concede-defeat-shravan-garg/" rel="noreferrer noopener" target="_blank">अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प : ‘तानाशाह’ अपनी हार अंत तक स्वीकार नहीं करते !(Opens in a new browser tab)</a></p>



<p class="has-white-color has-black-background-color has-text-color has-background has-medium-font-size"><strong>310 अरब डॉलर व्यापार का लक्ष्य</strong>&#8230;</p>



<p>2 अगस्त, 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में <strong>116.1 करोड़</strong> लोग मोबाइल फ़ोन उपयोग कर रहे थे। इनमें क़रीब 10 करोड़ लोग ऐसे थे जिनके पास 2 या अधिक मोबाइल थे। देश में कुल इण्टरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 63.67 करोड़ थी। इनमें शहरी क्षेत्र में 40.97 करोड़ और ग्रामीण क्षेत्र में 22.70 करोड़ लोग इण्टरनेट चला रहे थे। इसके बाद ‘जियो’ लोकप्रिय हुआ और अनुमान है कि अब इण्टरनेट प्रयोग करने वालों की संख्या 70 करोड़ पार कर गयी है। भारत समेत दुनिया के 2 अरब लोग और इनके ज़रिये अनुमानित 3.1 ख़रब डॉलर का व्यापार बढ़ाने का मोबाइल निर्माता तथा सञ्चार कम्पनियों का लक्ष्य है। इसकी पुष्टि एक जानकार और प्रमुख मोबाइल निर्माता कम्पनी के वरिष्ठ अधिकारी ने अपनी बातचीत में की है।</p>



<p class="has-white-color has-black-background-color has-text-color has-background has-medium-font-size"><strong>विश्वास को बनाया निवेश असेट</strong>&#8230;</p>



<p>नि:सन्देह व्हाट्सऐप WhatsApp ने फ़ेसबुक के बाद दुनिया को एक-दूसरे से जोड़ने में सर्वाधिक मदद की है।<br>सूचनाओं/तस्वीरों के प्रवाह में यह दुनिया का सबसे तीव्रतर और सशक्त माध्यम साबित हुआ है। इसकी विश्वसनीयता और तीव्रता से ही विश्वभर में 2 हज़ार मिलियन से ज़ियादा लोग व्हाट्सऐप का इस्तेमाल करते हैं। व्हाट्सऐप के अधिकारी इसे निवेश बताते हैं। इसके मद्देनज़र व्हाट्सऐप<br>की मालिक कम्पनी (फ़ेसबुक इंक) ने अपने ‘अथाह संसाधन’ (उपयोगकर्ताओं) का व्यावसायिक लाभ उगाहने की योजना बनायी है। इसी ख़ातिर कम्पनी व्हाट्सऐप नीतियों में बदलाव ने नीति बदलते हुए यूजर्स की निजी जानकारियाँ परोक्षत: बाज़ार में उतारने की मंशा पाली है। हालाँकि भारत में इस प्रकरण को ‘कैट’ ने गम्भीरता से लेते हुए भारत में व्हाट्सऐप बन्द करने तक की चेतावनी दी है। दूसरी तरफ़ निजता के पैरोकारों का मानना है कि भारत सहित दुनिया के व्हाट्सऐप यूजरों को निजता बचाने को यह ऐप छोड़ देना चाहिए।</p>



<p class="has-white-color has-black-background-color has-text-color has-background has-medium-font-size"><strong>विकल्प अपनाने लगे यूजर्स</strong>&#8230;</p>



<p>व्हाट्सऐप के ज़रिये अपनी निजता भङ्ग होने से बचाने के लिए इसके यूजर्स दूसरे ऐप्स अपनाने की ओर उन्मुख होने लगे हैं। व्हाट्सऐप नीति बदलने के ऐलान के बाद रोज़ाना बड़ी तादाद में लोग इसको छोड़ते हुए सिग्नल (Signal) या, टेलीग्राम (Telegram) की तरफ़ बढ़ रहे हैं। 13 जनवरी की सुबह 9 बजे तक बीते 72 घण्टों में 25 मिलियन यूजर्स ने टेलीग्राम डाउनलोड किया। टेलीग्राम के संस्थापक पावेल दुरोव बताते हैं कि ‘टेलीग्राम’ के मासिक सक्रिय उपयोगकर्ताओं की संख्या 50 करोड़ (500 मिलियन) से ज्यादा हो गयी है।</p>



<p class="has-white-color has-black-background-color has-text-color has-background has-medium-font-size"><strong>ये होती हैं निजी जानकारियाँ</strong>&#8230;</p>



<p>व्हाट्सऐप WhatsApp की ‘प्राइवेसी पॉलिसी’ बदलने से इसका उपयोग करने वालों की निजता &#8216;बाज़ारू माल&#8217; की तरह हो जाएगी जिसे कोई पैसे वाला अथवा, तकनीक का माहिर आदमी पा सकता है। नयी पॉलिसी के अन्तर्गत व्हाट्सऐप अपने यूजर्स का डाटा फ़ेसबुक समेत सभी &#8216;थर्ड पार्टी&#8217; ऐप्स के साथ साझा करेगा। इसमें यूजर्स के स्थान की जानकारी, आईपी एड्रेस, टाइम जोन, फ़ोन मॉडल, ऑपरेटिंग सिस्टम, बैटरी लेवल, सिग्नल स्ट्रेन्थ, ब्राउजर, मोबाइल नेटवर्क, आईएसपी, भाषा, टाइम जोन, आईएमईआई (IMEI) नम्बर के साथ उपयोगकर्ता कितने सन्देश (मैसेज) या कॉल कर रहा है, उसकी प्रोफाइल फोटो, लास्ट सीन, स्टेटस, ग्रुप काउण्ट जैसे डाटा शामिल हैं। अपनी नीति घोषित के तहत व्हाट्सऐप यूजर्स का जो डाटा लेगा उसमें फोन नम्बर, चैटिंग, फोटो और वीडियो तो होंगे ही, फ़ोन से होने वाली सभी भुगतान की जानकारी भी होगी। यह बड़ा ख़तरा है। व्हाट्सऐप ने ख़ुद स्पष्ट किया है कि अपने किसी उपयोगकर्ता सम्बन्धी जानकारी वह फ़ेसबुक<br>और इन्स्टाग्राम के साथ साझा करेगा। अगर यूजर्स ने इस पॉलिसी को सहमति नहीं दी तो उनका एकाउण्ट &#8216;डिलीट&#8217; कर दिया जाएगा।</p>



<p class="has-white-color has-black-background-color has-text-color has-background has-medium-font-size"><strong>निजी जानकारियों से कमाने की नीति</strong>&#8230;</p>



<div class="wp-block-image"><figure class="alignleft size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/How-Do-You-Set-The-Right-Targets-For-Your-Business-Here-Are-Some-Top-Tips-2.png" alt="=बिजिनेस टार्गेट’" class="wp-image-19512" width="305" height="183" srcset="https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/How-Do-You-Set-The-Right-Targets-For-Your-Business-Here-Are-Some-Top-Tips-2.png 1000w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/How-Do-You-Set-The-Right-Targets-For-Your-Business-Here-Are-Some-Top-Tips-2-300x180.png 300w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/How-Do-You-Set-The-Right-Targets-For-Your-Business-Here-Are-Some-Top-Tips-2-768x461.png 768w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/How-Do-You-Set-The-Right-Targets-For-Your-Business-Here-Are-Some-Top-Tips-2-780x470.png 780w" sizes="auto, (max-width: 305px) 100vw, 305px" /><figcaption>बिजिनेस टार्गेट’</figcaption></figure></div>



<p>व्हाट्सऐप WhatsApp  नीतियों में बदलाव का  यह कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि वह भागीदारों के साथ अपनी साझेदारी बढ़ाना चाहता है। इसके पीछे ‘बिजिनेस टार्गेट’ है। फ़ेसबुक ने पहले ही अपने वॉल तथा तमाम ‘एप्लीकेशन्स’ में विज्ञापनों की भरमार कर दी है। अब यह व्हाट्सऐप को सीधे फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहता है। यूजर्स अपनी जो तमाम जानकारियाँ फ़ेसबुक पर खाता बनाते या, व्हाट्सऐप का इस्तेमाल करते हुए दर्ज़ करते हैं, उनका उपयोग व्हाट्सऐप का बिजिनेस बढ़ाने में सहायक होगा। इसी निमित्त व्हाट्सऐप पिछले कुछ दिनों से अपने यूजर्स को नयी ‘प्राइवेसी पॉलिसी’ स्वीकार करने की बाबत सन्देश भेज रहा है। कहा जा रहा है कि यदि यूजर्स ने नयी शर्तों को सहमति नहीं दी तो उनका एकाउण्ट 8 फ़रवरी के बाद मिटा दिया जाएगा। हालाँकि व्हाट्सऐप एकाउण्ट डिलीट होने पर भी उपयोगकर्ताओं का डाटा इस ऐप के सर्वर में ही रह जाएगा।</p>



<p class="has-white-color has-black-background-color has-text-color has-background has-medium-font-size"><strong>निजता को इस तरह बचाएँ..</strong>.</p>



<p>अनेक लोगों को लगता है कि WhatsApp  व्हाट्सऐप (व्हाट्सऐप की नीतियों) स्थापना को निरस्त यानी ‘अन-इन्स्टॉल’ करने से ही उनका एकाउण्ट डिलीट (हट/मिट/कट या रद) हो जाएगा। हक़ीकत में ऐसा नहीं होगा। इसके लिए उपयोगकर्ताओं को खुद अपना डाटा हटाना होगा। व्हाट्सऐप को फोन से डिलीट करने के लिए यूजर को कुछ तरीक़े अपनाने होंगे। इससे एकाउण्ट का सारा डाटा तो डिलीट होगा ही, व्हाट्सऐप डाटा भी हमेशा के लिए डिलीट कर सकते हैं। </p>



<p>कृपया इसे भी देखें : <a href="https://mediaswaraj.com/ram_mandir_versus_babri_mosque_dispute/">https://mediaswaraj.com/ram_mandir_versus_babri_mosque_dispute/</a></p>



<p class="has-white-color has-black-background-color has-text-color has-background has-medium-font-size"><strong>इसके लिए निम्नलिखित प्रक्रिया अपनानी होगी :-</strong></p>



<ul class="wp-block-list"><li>सबसे पहले अपने फ़ोन में व्हाट्सऐप ऐप खोलना होगा। अगर एण्ड्रॉएड फ़ोन है तो उसमें ऊपर की तरफ दायीं ओर जो तीन डॉट्स होते हैं, उस पर टैप करना होगा ।</li><li>फिर कुछ विकल्प मिलेंगे। इनमें से एकाउण्ट विकल्प (ऑप्शन) पर क्लिक करना होगा।</li><li>फ़िर “डिलीट माय एकाउण्ट” विकल्प को दबाना होगा।</li><li>इसके बाद सामने एक नया पेज खुलेगा। इसमें फ़िर से<strong> “डिलीट माय एकाउण्ट” </strong>पर टैप करना होगा।</li><li>फिर डिलीट बटन दबाने से पहले इसका कारण बताना होगा।</li><li>इसके बाद फिर से एक बार डिलीट माय एकाउण्ट को टैप करना होगा।</li><li>इसके बाद उपयोगकर्ता अपने डाटा की सुरक्षा को लेकर आश्वस्त हो सकते हैं।</li></ul>



<p class="has-medium-font-size">डा मत्स्येन्द्र प्रभाकर </p>



<div class="wp-block-image"><figure class="alignleft size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/Dr.-Matsyendra-Prabhakar-782x1024.jpg" alt="=Dr. Matsyendra Prabhakar" class="wp-image-19513" width="158" height="207" srcset="https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/Dr.-Matsyendra-Prabhakar-782x1024.jpg 782w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/Dr.-Matsyendra-Prabhakar-229x300.jpg 229w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/Dr.-Matsyendra-Prabhakar-768x1005.jpg 768w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/Dr.-Matsyendra-Prabhakar.jpg 978w" sizes="auto, (max-width: 158px) 100vw, 158px" /><figcaption><strong>Dr. Matsyendra Prabhakar</strong></figcaption></figure></div>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>कृषि क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश किसान आन्दोलन  समाप्त करने की ‘बड़ी क़वायद’</title>
		<link>https://mediaswaraj.com/supreme-court-stays-farm-laws-who-wins-matsyendra-prabhakar/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Media Swaraj]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 12 Jan 2021 15:44:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कानून]]></category>
		<category><![CDATA[डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर]]></category>
		<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[farm laws]]></category>
		<category><![CDATA[Supreme Court]]></category>
		<category><![CDATA[किसान आंदोलन]]></category>
		<category><![CDATA[कृषि क़ानून]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://mediaswaraj.com/?p=19352</guid>

					<description><![CDATA[बहुतायत लोग सुप्रीम कोर्ट के ‘अन्तरिम’ निर्णय को सरकार की मदद के रूप में देख रहे हैं। उनका विश्वास है कि अब आन्दोलित किसानों का डेरा-डण्डा 24-48 घण्टों में उखड़ जाएगा। यों, किसान आन्दोलन तत्काल ख़त्म होने के आसार मंगलवार देर शाम तक नहीं दिखे। तथापि आन्दोलन के रहनुमा और पक्षधर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को सरकार की ‘बड़ी हार’ के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि आगे चलकर केन्द्र सरकार के बनाये नये कृषि कानून निरस्त होंगे! आन्दोलनकारियों के वक़ील ने तो न्यायालय का आदेश आने के फ़ौरन बाद ही इसका दावा तक कर डाला।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-55631278">सर्वोच्च ने विवादास्पद तीनों कृषि कानूनों पर फ़िलहाल विराम लगा दिया</a> . इनके अमल पर ‘अस्थायी रोक’ डेढ़ महीने से अधिक समय से जमे किसान आन्दोलन को समाप्त करने की ‘बड़ी क़वायद’ दिखती है. कृषि क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने ‘अन्तरिम फ़ैसले’ के साथ  चार सदस्यीय समिति बनायी है। खेती-बारी के माहिरानों की यह समिति कानूनों के विरोधी एवं समर्थक किसानों से बातचीत कर अपना निष्कर्ष न्यायालय-पीठ को देगी. उसके आधार पर निर्णय होगा कि संसद के द्वारा बनाये गये कृषि कानून किसको कितना फ़ायदेमन्द या, नुकसानदेह होंगे। </p>



<p>कृपया देखे और सुनें </p>



<figure class="wp-block-embed is-type-video is-provider-youtube wp-block-embed-youtube wp-embed-aspect-16-9 wp-has-aspect-ratio"><div class="wp-block-embed__wrapper">
<iframe loading="lazy" title="किसान क़ानूनों का विरोध क्यों" width="1220" height="686" src="https://www.youtube.com/embed/LjJvauigc2E?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture" allowfullscreen></iframe>
</div></figure>



<p>पहले भी ऐसे अवसर आये हैं जब अदालत को केन्द्र और राज्यों के कानूनों पर रोक लगानी पड़ी; कई कानूनों को बाद में रद तक किया गया लेकिन मङ्गलवार के इस ‘अनूठे निर्णय’ से अनेक विशेषज्ञ तक हक्का-बक्का हैं कि फ़िलहाल के लिए आया ‘सुप्रीम फ़ैसला’ किसके हक़ में है!&nbsp;</p>



<p>किसानों के व्यापक और दूरगामी हितों के नाम पर केन्द्र सरकार ने ‘कोरोना काल’ की जद्दोज़हद के बीच तीनों नये कानून गत वर्ष 17 सितम्बर को लोकसभा तथा 20 सितम्बर को राज्यसभा में पारित कराये थे। इनमें पहला- “कृषि उत्पादक व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्द्धन व सरलीकरण) अधिनियम”, दूसरा “मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तिकरण व संरक्षण) अधिनियम” और तीसरा “आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम” है। इन कानूनों को 27 सितम्बर को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली थी।&nbsp;</p>



<p>कानूनों पर अमल की प्रक्रिया शुरू होने को थी कि पंजाब सहित अनेक राज्यों के किसानों का असन्तोष उबाल पर आ गया.नये कृषि कानूनों के विरोध में पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित देश के अनेक राज्यों के किसान 24 नवम्बर से दिल्ली शहर की प्रवेश सीमा पर डटे हुए हैं.</p>



<p class="has-large-font-size">आंदोलन की गूंज विदेश तक </p>



<p>आज़ादी के बाद यह भारत का पहला किसान आन्दोलन है जिसकी गूँज विदेश तक में सुनायी पड़ी। प्रभावी मामलों में सिखों से आबाद कनाडा के प्रधानमंत्री ने तो आन्दोलित किसानों के पक्ष में विवादास्पद बयान तक ज़ारी किया। इसकी भारत ने बाद में मज़म्मत की और उसे अपने आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप के रूप में देखा।&nbsp;&nbsp;&nbsp;</p>



<p>केन्द्र सरकार और इसके पैरोकारों ने शुरू से ही तीनों कृषि अधिनियमों को किसानों के व्यापक हित में बताया। इन्हें लेकर सरकार का मुख्य दावा यह है कि उसके कानूनों के क्रियान्वयन से उन दलालों का पूरी तरह से ख़ात्मा हो सकेगा जो समूची कृषि-व्यवस्था में घुसपैठ करके न केवल किसानों का लाभ बड़े हद तक हड़प ले रहे हैं बल्कि खेती-किसानी एवं उत्पादकता को नुकसान भी पहुँचा रहे हैं।&nbsp;</p>



<p class="has-large-font-size">घाटे की खेती से उचटता मन </p>



<p>वास्तव में खेती-किसानी में लगातार बढ़ते घाटे से ख़ासी तादाद में किसानों का कृषि-कार्य से मन उचट रहा है। इस कारण खेती का रक़बा तो घट ही रहा है, उत्पादकता पर भी असर पड़ रहा है। उन्हें <a href="https://mediaswaraj.com/contract-farming-agriculture-marketing-law-matsyendra-prabhakar/">खेती में ठेकेदारी प्रथा</a> के बढ़ावे से ग्रामीण संस्कृति में बज़रिये विदेशी एजेंसियों के अपसंस्कृति के छा जाने का ख़तरा भी है।&nbsp;</p>



<p>इधर, जानकारों का मानना है कि कोई छह महीने पहले बनाये गये तीनों कृषि कानून केन्द्र सरकार की बड़ी महत्त्वाकांक्षा का हिस्सा हैं। दावा है कि इससे सरकार अपेक्षाकृत कमज़ोर तबकों के बीच अपनी पहुँच स्थायी तौर पर मज़बूत बनाना चाहती है। वह चाहती है कि कृषि में दलालों की भूमिका को सदा के लिए समाप्त कर दिया जाए।&nbsp;&nbsp; &nbsp;</p>



<p>&nbsp;&nbsp;उधर, 24 नवम्बर से एकजुटता की तरफ़ बढ़े किसान आन्दोलन पर न केवल सरकार बल्कि न्यायपालिका तक चिन्तित हुई। 11 जनवरी को सर्वोच्च अदालत ने केन्द्र सरकार से यह तक कहा कि वह विवादास्पद कानूनों को ‘होल्ड’ पर रखे, अन्यथा उस(कोर्ट)को ख़ुद इसे रोकना होगा। समझा जाता है कि केन्द्र के रुख में परिवर्तन होता न देख अदालत ने 12 जनवरी को कृषि कानूनों पर न केवल क्रियान्वयन रोक दिया बल्कि समूचे मामले के अध्ययन के लिए एक समिति बना दी।</p>



<p class="has-large-font-size">समिति के सदस्य  सरकार समर्थक </p>



<p> कृषि क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति के  सदस्य हैं पूर्व सांसद भूपिन्दर सिंह मान (अध्यक्ष बीकेयू), डॉ० प्रमोद कुमार जोशी (अन्तरराष्ट्री खाद्य नीति अनुसन्धान संस्थान), अशोक गुलाटी (कृषि अर्थशास्त्री) और अनिल धनवट (शिवकेरी संगठन, महाराष्ट्र)। ये चारों कृषि मामलों के गहरे जानकार हैं। इनमें ख़ासकर ‘सरदार’ मान को सरकार का तरफ़दार माना जाता है। वे पहले ही तीनों कानूनों का समर्थन कर चुके हैं। इस सम्बन्ध में लिखे गये एक पत्र में उन्&#x200d;होंने लिखा था, “आज भारत की कृषि व्&#x200d;यवस्&#x200d;था को मुक्&#x200d;त करने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्&#x200d;व में जो तीन कानून पारित किये गये हैं हम उन कानूनों के पक्ष में सरकार का समर्थन करने के लिए आगे आये हैं। हम जानते हैं कि उत्&#x200d;तरी भारत के कुछ हिस्&#x200d;सों में एवं विशेषकर दिल्&#x200d;ली में जारी किसान आन्दोलन में शामिल कुछ तत्&#x200d;व इन कृषि कानूनों के बारे में किसानों में गलतफहमियां पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।”</p>



<p>&nbsp;समझा जाता है कि इस कमिटी को अपनी बात तथा तर्क समझाने में सरकार को सहूलियत रहेगी। इसके पीछे तर्क यह कि सुप्रीम कोर्ट  द्वारा बनायी गयी समिति के सभी सदस्य पढ़े-लिखे तथा अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं.  </p>



<p> बहुतायत लोग कृषि क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट के ‘अन्तरिम’ निर्णय को सरकार की मदद के रूप में देख रहे हैं। उनका विश्वास है कि अब आन्दोलित किसानों का डेरा-डण्डा 24-48 घण्टों में उखड़ जाएगा। यों, किसान आन्दोलन तत्काल ख़त्म होने के आसार मंगलवार देर शाम तक नहीं दिखे। तथापि आन्दोलन के रहनुमा और पक्षधर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को सरकार की ‘बड़ी हार’ के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि आगे चलकर केन्द्र सरकार के बनाये नये कृषि कानून निरस्त होंगे! आन्दोलनकारियों के वक़ील ने तो न्यायालय का आदेश आने के फ़ौरन बाद ही इसका दावा तक कर डाला।</p>



<p class="has-medium-font-size">डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर</p>



<div class="wp-block-image is-style-default"><figure class="alignleft size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="782" height="1024" src="https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/WhatsApp-Image-2021-01-12-at-6.12.45-PM-782x1024.jpeg" alt="" class="wp-image-19359" srcset="https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/WhatsApp-Image-2021-01-12-at-6.12.45-PM-782x1024.jpeg 782w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/WhatsApp-Image-2021-01-12-at-6.12.45-PM-229x300.jpeg 229w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/WhatsApp-Image-2021-01-12-at-6.12.45-PM-768x1005.jpeg 768w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2021/01/WhatsApp-Image-2021-01-12-at-6.12.45-PM.jpeg 978w" sizes="auto, (max-width: 782px) 100vw, 782px" /><figcaption>Matsyendra Prabhakar </figcaption></figure></div>
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			</item>
		<item>
		<title>ठेका खेती से जीवन-जड़ें उखड़ने का ख़तरा</title>
		<link>https://mediaswaraj.com/contract-farming-agriculture-marketing-law-matsyendra-prabhakar/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Media Swaraj]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 11 Jan 2021 03:07:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अर्थ]]></category>
		<category><![CDATA[कानून]]></category>
		<category><![CDATA[डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर]]></category>
		<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[अनुबंध खेती]]></category>
		<category><![CDATA[गुजरात खेती]]></category>
		<category><![CDATA[ठेका खेती]]></category>
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					<description><![CDATA[https://mediaswaraj.com/upnishad-practical-knowledge-tradions-ila-kumar/]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p>ठेका खेती CONTRACT FARMING उन  तीन क़ानूनों में से एक है, जिन नए क़ानूनों को लेकर किसानों का विरोध है . सरकार और उसके ख़ैरख्वाह दावा कर रहे हैं कि ठेका  की खेती की व्यवस्था यानी, अनुबन्धित कृषि नये जमाने का वह प्रावधान है जिससे किसानों के लिए फ़ायदा ही फ़ायदा है। दूसरी तरफ़ इससे असहमत एक बड़ा तबका ठेका खेती CONTRACT FARMINGएवं अन्य नये प्रावधानों को किसानों की समस्याएँ बढ़ाने वाला मानता है।</p>



<p>&nbsp;ठेका या अनुबन्ध पर खेती (कॉण्ट्रैक्ट फार्मिंग) का मतलब है कि किसान खेती तो अपनी जमीन पर करता है, मग़र अपने लिए नहीं, बल्कि किसी और के लिए जिसे ‘खेती करवाने वाला’ कह सकते हैं। </p>



<p>इस व्यवस्था में सुविधा यह होती है कि  ठेका अथवा ‘कॉण्ट्रैक्ट’ पर खेती कर रहे किसान को ख़ुद का पैसा नहीं ख़र्च करना पड़ता। खेती पर लागत वह लगाता है जिसके लिए फ़सल उगाने का ठेका ‘भूस्वामी’ लेता है। </p>



<p class="has-large-font-size">ठेका खेती की समस्याएँ </p>



<p>सारी समस्या ऐसी व्यवस्था में आशङ्कित पेचीदगियों से पैदा हुई है। इनमें सबसे अहम यह है कि अगर ठेका खेती  मौसम की मार या किसी दैवीय आपदा का शिकार हुई तो उसकी भरपाई कौन करेगा क्योंकि वास्तविक किसान तो खेती करवाने वाले से प्रावधानों के तहत पहले ही धन लेकर कर्ज़दार बन चुका होगा? </p>



<p>इस तरह ठेका खेती करते हुए किसान केवल ‘आभासी’ (वर्चुअल) रह जाएगा! गरचे, खेती करवाने वाले की ओर से कृषि-फसलों के लिए बीमा वगैरह करवाया गया तो मिलने वाली क्षतिपूर्ति (मुआवज़ा) सरीखा लाभ पैसा लगाने वाला पाएगा। अहम सवाल यह कि फसल पैदा होने पर खेती करने वाले किसान को क्या मूल्य चुकाकर स्वयं के लिए अन्न नहीं खरीदने होंगे?</p>



<p>&nbsp; &nbsp;लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता-समूह और विपक्ष दोनों राजनीतिक प्रणाली के अंग होते हैं। इस नाते दोनों ही व्यवस्था के लिए समान रूप से उत्तरदायी होते हैं। सत्तादल जो गलतियाँ करता है, विपक्ष उसे ठीक करता है। जन की अपेक्षा यह होती है कि अन्तर सोच में हो, समझ में नहीं। स्वार्थान्धता के चलते स्वतंत्रता की मान्य विधिक अवधारणा के प्रति अज्ञानता एवं नासमझी के कारण भारत में इसके दुरुपयोग की प्रवृत्तियाँ बढ़ती गयी हैं। </p>



<p>इसके फलस्वरूप ही कृषि कानूनों की उपादेयता और इसकी सार्थकता के प्रश्न पर हठधर्मिता क़रीब पाँच सप्ताहों से कायम है। इसका व्यावहारिक हल दोनों पक्षों की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाने से समाधान में दिक्क़त हुई है।&nbsp; &nbsp;</p>



<p>&nbsp; &nbsp;वास्तव में आध्यात्मिक सोच वाले हमारे देश में विकास को लेकर अनेक अवधारणाएं प्रचलन में रही हैं परन्तु लगभग डेढ़-दो दशकों से अचानक गुजरात ‘विकास का मॉडल’ बन गया। दुर्भाग्य से इस पर गम्भीर चर्चा नहीं हुई लेकिन खलबली अवश्य हुई; और तब जबकि भारतीय&nbsp; चिन्तन के मौलिक सोच की जड़ें हिलती हुई दिखीं।&nbsp;</p>



<p>&nbsp; &nbsp;भारत एक परम्परावादी देश है। इसे समय-अवधि की परिधि में समेटना व्यर्थ है। देश का बहुतायत समाज ढाई-तीन सौ सालों और लाखों परिवार उससे से भी पहले से एक ही स्थान का निवासी कहलाने के मानिन्द हैं। </p>



<p>वे काम-धन्धे, रोज़ी-रोज़गार के सिलसिले में भले कहीं गये हों परन्तु उनकी जड़ें आज भी गाँव से ही जुड़ी और वहीं पर खड़ी मिलती हैं। इससे सेवासमाप्ति यानी, वृद्धावस्था में वे अपना समय सुकून से अपने गाँव-परिवारों में ही गुज़ारना चाहते हैं। </p>



<p>और कुछ हो या, नहीं, ठेका  खेती जन-जीवन और उसके पारम्परिक मूल्यों को उखाड़ फेंकेगी। जिन्होंने ‘मोहल्ला अस्सी’ फ़िल्म देखी होगी, वे इस बात को सहजता से समझ सकते हैं।&nbsp;</p>



<p>&nbsp; बहरहाल, प्रस्तावित ठेका  खेती के सम्बन्ध में उदाहरण आवश्यक है कि भौतिक विकास के अन्य क्षेत्रों की भाँति गुजरात में बड़े पैमाने पर यह पहले से हो रही है। ‘विकास के खेतिहरों’ के मुताबिक़ महाराष्ट्र तथा दक्षिण भारत के कई राज्यों में इस तरह की खेती के अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। फ़िर भी इस मामले में राष्ट्रीय मन-मन्तव्य और सहमति का अभाव दिखता है। इसकी कुछ क़ुदरती वज़हें है।&nbsp;</p>



<p>&nbsp; &nbsp;अपने देश (भारत) में खेती पूरी तरह से प्राकृतिक स्थिति यानी, मौसम के भरोसे है। कभी सूखा, तो कभी ज्यादा बारिश, खेत में खड़ी फसल चौपट कर देती है। देश में अधिकतर छोटे किसान हैं। ऐसे किसान खेतों में कुछ ज़ियादा प्रयोग भी नहीं कर पाते।</p>



<p> इसके विपरीत क़ुदरती तथा दूसरे कारणों से हर साल अधिकाधिक लोग खेती-बारी छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। यद्यपि खेती के घाटे को कम करने के लिए सरकार बड़े स्तर पर काम कर रही है, किन्तु विविधताओं से भरे हमारे देश में ये कोशिशें पर्याप्त साबित नहीं होती हैं। </p>



<p>सरकार किसानों को आधुनिक तरीके से खेती करने के लिए जागरूक करने के अभियान चलाती है फ़िर भी तंत्र में भ्रष्टाचार की अधिकता से अधिकतर नीतियाँ प्रचार और विज्ञापन के स्तर पर पहुँचकर सिकुड़ जाती हैं।</p>



<p> इससे अपेक्षित परिणाम दूर रहे। नतीज़तन सरकार को खेती की बेहतरी की ख़ातिर आधुनिकता के नाम पर ‘ठेका  पर खेती’ ही उत्पादन बढ़ाने का तरीका दिखा। बेशक कह सकता हूँ कि इस मामले में पहल करने वालों से ‘बड़ी भूल’ हुई है।&nbsp; &nbsp;</p>



<p>&nbsp; &nbsp;ठेका या अनुबन्ध पर खेती के तहत कोई कम्पनी या, फिर कोई आदमी किसान के साथ अनुबन्ध करता है कि किसान के द्वारा उगायी गयी फसल विशेष को अनुबन्ध करने वाला एक तय दाम में खरीदेगा। इसमें खाद, बीज से लेकर सिंचाई और मजदूरी सब खर्च अनुबन्ध करने वाले के होते हैं। वही किसान को खेती के तरीके बताता है। फसल की गुणवत्ता (क्वालिटी), मात्रा (क्वाण्टिटी) और उसकी डिलीवरी का समय फसल उगाने से पहले ही तय हो जाता है।</p>



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https://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/farmers-income-is-beneficial-in-employment-generation-need-to-increase-the-bargaining-power-of-farmers-on-contract-farming/articleshow/80084676.cms
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<p class="has-large-font-size"><strong>ठेका खेती के फायदे</strong></p>



<p>&nbsp; ‘कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एण्ड प्राइजेज’ (सीएसीपी) के प्रमुख पाशा पटेल कहते हैं, “अनुबन्ध पर खेती गुजरात में बड़े पैमाने पर हो रही है। महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कई राज्यों में ठेके पर खेती के अच्छे परिणाण मिले हैं। इससे खेती की दशा और दिशा भी सुधर रही है। वे कहते हैं, इससे </p>



<p>(1) खेती अधिक संगठित बनेगी। </p>



<p>(2) किसानों को बेहतर भाव मिलेंगे। </p>



<p>(3) बाजार भाव में उतार-चढ़ाव के जोखिम से किसान मुक्त। </p>



<p>(4) किसानों को बड़ा बाजार मिल जाता है। (5) किसान को सीखने का अवसर मिलता है। (6) खेती के तरीके में सुधार होगा। </p>



<p>(7) किसानों को बीज, खाद के फ़ैसले में मदद मिलेगी और </p>



<p>(9) फसल की क्वॉलिटी तथा मात्रा में सुधार होगा।</p>



<p class="has-large-font-size"><strong>ठेका खेती के लिए ज़रूरी उपाय&nbsp;</strong></p>



<p>&nbsp; &nbsp;ठेका खेती से किसान और कथित ‘कॉण्ट्रैद क्टर’ दोनों को फायदा हो, इसके लिए कुछ ज़ुरूरी उपाय करने चाहिए, जैसे </p>



<p>(1) दोनों पक्षों के बीच होने वाले करार का ‘ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन’ हो।</p>



<p> (2) किसान और कम्पनी के बीच करार पारदर्शी हो।</p>



<p> (3) कोई भी बात, नियम या शर्त छिपी हुई नहीं हो तथा </p>



<p>(4) सभी बातें स्पष्ट तौर पर की जाएँ। चूँकि ‘कॉण्ट्रैक्ट फार्मिंग’ किसानों के फ़ायदे का सौदा बतायी जा रही है </p>



<p>इसलिए इसे लेकर जागरूकता अभियान चलाने की ज़ुरूरत है। पहला ये कि </p>



<p>(1) सरकार किसानों को शिक्षित कर सकती है। </p>



<p>(2) कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम के दायरे से कॉण्ट्रैक्ट फार्मिंग को अलग रखा जाए। (3) किसानों का शोषण नहीं हो इसके लिए सख्त कानून होने चाहिए। </p>



<p>(4) ठेके के तहत सभी कृषि उत्पादों के ‘इंश्योरेंस कवर’’ होने चाहिए और </p>



<p>(5) किसान और कम्पनी के बीच अगर कोई विवाद होता है तो विवाद निपटाने के लिए उपयुक्त ‘अथॉरिटी’ बनायी जानी चाहिए।&nbsp;</p>



<p class="has-large-font-size"><strong>ठेका खेती की चुनौतियाँ</strong></p>



<p>&nbsp; &nbsp;यों, ठेका खेती में दूसरे ख़तरे भी हैं। जैसे कि,</p>



<p> (1) बड़े ख़रीददारों के एकाधिकार को बढ़ावा।</p>



<p> (2) कम कीमत देकर किसानों के शोषण का डर। </p>



<p>(3) सामान्य किसानों के लिए समझना मुश्किल एवं </p>



<p>(4) छोटे किसानों को इसका कम होगा फ़ायदा। फ़िलहाल, निर्वाह और वाणिज्यिक फसलों के लिए सदियों से </p>



<p>देश के विभिन्न भागों में विभिन्न प्रकार की ठेका या अनुबन्ध कृषि की व्यवस्था प्रचलित है। गन्ना, कपास, चाय, कॉफी आदि वाणिज्यिक फसलों में हमेशा से अनुबन्ध कृषि या कुछ अन्य रूपों को शामिल किया जाता है। </p>



<p>यहाँ तक कि कुछ फलों. फ़सलों और मत्स्य पालन के मामले में अक्सर ‘अनुबन्ध कृषि समझौता’ किया जाता है, जो मुख्य रूप से इन वस्तुओं के सट्टा कारोबार से जुड़े होते हैं। </p>



<p>आर्थिक उदारीकरण के मद्देनज़र ठेका खेती की अवधारणा की अहमियत बढ़ रही है। </p>



<p>विभिन्न राष्ट्रीय व बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ औषधि और पूँजी उपलब्ध कर के द्वारा विभिन्न बागवानी उत्पादों के विपणन के लिए किसानों के साथ अनुबन्ध में प्रवेश कर रहे हैं।</p>



<p>राजनीतिक अदूरदर्शिता से नये कृषि कानूनों को लेकर देश में संशय की स्थिति है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के किसान महीने भर से अधिक समय से आन्दोलित हैं। </p>



<p>उन्हें मनाने के लिए कई दौर में हुईं वार्ताएँ असफल रही हैं। अधिक उम्मीदों के साथ एक और बातचीत 30 दिसम्बर को नयीदिल्ली के ‘विज्ञान भवन’ में होने जा रही है। इस बीच खेती-बारी की बदलती व्यवस्था के विरुद्ध बढ़ते विरोध को देखते हुए केन्द्र से लेकर राज्य सरकारें तक उहापोह का शिकार हुई हैं।</p>



<p> उचित मार्गदर्शन के बज़ाय ‘लंगड़ी चाल’ वाली सियासी कबड्डी से देश में चिन्तनशील वर्ग का आम ‘जनमानस’ भ्रमित हुआ है।अच्छा यह हुआ है कि न सिर्फ़ बड़े एवं पेशेवर किसान बल्कि अब छोटे ‘गँवई किसान’ भी सरकार की रीति-नीति पर चर्चा कर रहे हैं।</p>



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<blockquote class="wp-embedded-content" data-secret="QYII3sL3iR"><a href="https://mediaswaraj.com/frontier-gandhi-badshah-khan-trilok-deep/">सीमांत गांधी बादशाह खान का नाम भारत से क्यों मिटाया जा रहा है!</a></blockquote><iframe loading="lazy" class="wp-embedded-content" sandbox="allow-scripts" security="restricted"  title="&#8220;सीमांत गांधी बादशाह खान का नाम भारत से क्यों मिटाया जा रहा है!&#8221; &#8212; Media Swaraj | मीडिया स्वराज" src="https://mediaswaraj.com/frontier-gandhi-badshah-khan-trilok-deep/embed/#?secret=QYII3sL3iR" data-secret="QYII3sL3iR" width="600" height="338" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no"></iframe>
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<p> इससे लगता है कि लोकतंत्र है क्योंकि चर्चा और संवाद वे प्रमुख व्यावहारिक गुण हैं जिनसे लोकतंत्र पहचाना जाता है।</p>



<p>प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली में रीतियों को बदलने और नीतियाँ बनाने के लिए संवाद की बड़ी अहमियत होती है, और यही इसका उचित भी है। किसी प्रणाली के तहत सरकारी कामों में दृढ़ता आवश्यक है। लेकिन इसका मतलब मनमाने फैसले थोपना नहीं होता है। </p>



<p>राष्ट्रीय सुरक्षा, संरक्षा और सम्प्रभुता के मसले अलग हो सकते हैं, कम से कम सीधे और व्यापक जनहित के मामलों में निर्णय थोपना अनुचित है, अलोकतांत्रिक लगता है।</p>



<p> लोकतांत्रिक प्रणाली में कोई सरकार पहले अपने सोच को पहले जनता के बीच साझा कर जनमत परखती है, सहमति बनाती है तब निर्णय लेती है।&nbsp; &nbsp;</p>



<div class="wp-block-image is-style-default"><figure class="alignleft size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2020/12/DrMatsyendra_Prabhakar-869x1024.jpg" alt="" class="wp-image-18360" width="199" height="234" srcset="https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2020/12/DrMatsyendra_Prabhakar-869x1024.jpg 869w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2020/12/DrMatsyendra_Prabhakar-255x300.jpg 255w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2020/12/DrMatsyendra_Prabhakar-768x905.jpg 768w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2020/12/DrMatsyendra_Prabhakar-1304x1536.jpg 1304w, https://mediaswaraj.com/wp-content/uploads/2020/12/DrMatsyendra_Prabhakar.jpg 1481w" sizes="auto, (max-width: 199px) 100vw, 199px" /><figcaption>डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर</figcaption></figure></div>



<p><strong>डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर</strong></p>
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