सपनों की इमारत

अंतर्मन को छूने वाली एक कविता

उर्वशी उपाध्याय, ‘प्रेरणा ‘

मेरे घर के बगल
रफ्तार के साथ
बन रही थी इक इमारत
आखिरी पड़ाव पर है उसका निर्माण
आज पूर्णिमा है…
एक तिमाही से चल रहा है निर्माण
कुछ दिनों में हो जायेगा समाप्त,

तैयार हो जाएगी, एक शानदार इमारत
पहले ही दिन,
मैंने देखी थी एक स्त्री,
ईंट ढोती एक बच्चे के साथ,
देखती हूं आज भी उसे
वैसे ही,
तब बच्चा बैठकर रोता था
आज वह समय के साथ
खड़ा होने लगा है।

सिर पर ईंट लिए
इमारत की ऊंचाई से
ममता को दबाकर-
फिक्रमंद आंखों से
नीचे झांकती है वह,
कुछ एहसास पाकर
बच्चा देखता है ऊपर
और, हो जाता है खड़ा
हाथ करके ऊपर….!

क्यूं करता है ऐसा…
अपने अधिकार के लिए?
या…
मां के प्यार के लिए?
पर, मां की निगाहें
अगली दीवार पार कर
चली जाती है ऊपर-
छत से भी बहुत ऊपर,
भाव शून्य हो, सोचती है वह
कैसा होगा इसका भविष्य
शायद,

जाएगा यह मुझसे भी बहुत ऊपर,
बनायेगा और भी बड़ी इमारत,
हालांकि वह जानती है
जिस मंजिल पर है निगाह उसकी
बच्चे की खातिर
वहां हवा है शून्य है।

कुछ दूरी पर वृक्ष है,
उसके झुरमुट से
झांकने लगा है चन्द्रमा,
संकेत दे रहा है
पूनम की रात का।
आज सावन की पूर्णिमा है
अरे! साल भर पहले
आज ही तो आया था यह
दुनिया में
और आज ही मेरी ऐसी कल्पना!
शायद उड़ गयी थी मैं ऊंची उड़ान..
मुझे माफ करना मेरे ईष्ट-
पर कुछ देर रोक देना उसे
वहीं, हवा में ही
फिर तूफानों में लपेटकर
पटक देना…
पर, यह जल्दी करना
जिससे दोबारा
वह भूल जाये
हवा में उड़ना, घर बसाना
और हवा में खो जाना।

– उर्वशी उपाध्याय, ‘प्रेरणा ‘

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