EXCLUSIVE : पृथ्वी हमारी माता है , हम उसके पुत्र हैं

अथर्व वेद का पृथ्वी सूक्त एक- एक शब्द वैज्ञानिक

 

 

चित्र : राम दत्त त्रिपाठी

अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त विश्व का प्रथम भूमिदान विश्व गान है। अथर्ववेद के रचनाकार ऋषि अथर्वन की चिन्तना पृथ्वी के समस्त चर – अचर के उत्कर्ष के प्रति पृथ्वी सूक्त में मुखरित होती है .अथर्ववेद का रचनाकाल ईसा से 5 हज़ार वर्ष पूर्व माना जाता है
पृथ्वी के पर्यावरण जीव जगत तथा चर अचर के संबंधों की जो वैज्ञानिकता इन सूक्तों में मुखरित होती है वह अपने रचना काल से अधिक आज के संदर्भ में प्रासंगिक है .

https://ramdutttripathi.in/article/138

 

पेंटिंग : गुनगुन

पृथ्वी हमारी माता है , हम इसके पुत्र है। यहाँ ‘हम’ मानव प्रजाति के मानव से ही नहीं है. इस हम में मानव प्रजाति के महान शक्तिशाली देश के समुदाय संप्रदाय ही नहीं हैं . इस हम के बोध में मानव प्रजाति के अतिरिक्त 84 लाख प्राणियों के प्रजातियों के असंख्य प्राणी सम्मिलित हैं. इसमें सम्मिलित हैं वनस्पति जगत की अनगिनत प्रजातियाँ , सागर नदी झील , पहाड़ सारे जड़ चेतन जगत का कण कण .

 

आज यह पृथ्वी सूक्त इसलिए भी प्रभावी है प्रासंगिक है क्योंकि विज्ञान के दम्भ में जिस मानव ने पृथ्वी के मातृ रूपेण स्वरूप की अवज्ञा प्रारंभ कर दी थी. अपने ज्ञान कौशल के दर्प में क्षिति जल पावक गगन समीर के साथ दुर्व्यवहार कर रहा था उस मानव की औक़ात एक कोशीय अर्ध जीव कोरोना वायरस ने बता दी . पृथ्वी क्षमाशील है मातृत्व भाव से ओत प्रोत नालायक पुत्र को भी सीने से चिपका लेती है पर आकाश सहन नहीं करता .

 

आर्तनाद के
नाद को
धरती
स्वीकार करे न करे
आकाश को तो स्वीकार. 

डॉ. चन्द्र विजय चतुर्वेदी, प्रयागराज

पृथ्वी सूक्त अथर्ववेद के बारहवें मंडल का प्रथम सूक्त है जिसमें 63 श्लोक हैं . हर श्लोक के एक – एक शब्द विज्ञान के सूत्र (फ़ार्मुला ) के रूप में है .मैं विज्ञान का विद्यार्थी हूँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से एक – एक शब्द को समझते हुए इस का काव्य अनुवाद करने में प्रयासरत हूँ . पहले श्लोक का काव्य अनुवाद प्रस्तुत है.

अथर्ववेद पृथ्वीसूक्त 

यह दुनिया  का प्रथम विश्वगान है –प्रथम मातृ वन्दना है 

–इसके प्रथम सूक्त का काव्यानुवाद मित्रों को सादर समर्पित है 

कौन धारण करता है 

इस पृथ्वी को 

जो सत्यनिष्ठ हो 

जिसका ह्रदय हो विशाल 

विचारों का हो जिसमे विस्तार 

ऋतवान हो जो 

नैसर्गिक नियमों के पालन को 

 समर्पित हो 

यथार्थ हेतु मन संकल्पित 

हो जिसका 

 जो जड़ता से जूझने को 

हो धीरोदात्त 

उग्रता से हर परिस्थिति में 

संघर्ष को हो तैयार 

समग्रता के साथ 

राष्ट्र समाज और व्यक्ति 

के सतत कल्याण हेतु 

जिसने यज्ञ का किया हो अनुष्ठान 

जो तपःपूत हो 

जिसने दीक्षा ली हो 

धर्मोत्साह भक्तिमय जीवन जीने को 

 समस्त बंधनो से मुक्ति हेतु 

संघर्ष की क्षमता हो जिसमे अपार 

 ऐसा ब्रह्मज्ञानी विज्ञानी हो जो 

निज धर्म जाती के गौरव के प्रति ही नहीं 

अपितु उत्साही हो 

 विश्वमानुष के उत्थान अभ्युत्थान के प्रति भी 

वही धारण करता है हे माँ तुझे 

हे माँ हम उस मैत्रवरुन देव की 

करते हैं आराधना वन्दना 

जिन्होंने-धारण करने के लिए तुझे 

जल की उत्पत्ति की जीवन का मूलतत्व 

जल पृथ्वी परस्पर ओतप्रोत 

हे जीवनदायिनी जननी 

भूत भविष्य की अधिष्ठात्री देवी माँ 

मुझ अकिंचन को भी 

 अपनीगोदी के कहीं एक कोने में 

जीवन की गति दे दे मति दे दे

 

 

 

 

 

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