गाँव को निगलते जा रहे शहर

आवश्यकता संतुलित विकास की

संतोष कुमार, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, पत्रकारिता एवं राजनीति विभाग

पहले नगरीकरण ने गाँव के लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया और फिर अब नगर खुद
गाँव की ओर रुख़ कर रहे हैं। तेज़ी से पैर पसारते शहर गाँव को निगलते जा रहे हैं। इससे जहाँ
कृषि योग्य उपजाऊ भूमि जो पहले हरी – भरी फसलों और बाग़ -बग़ीचों से ढंकी रहती थी
अब कंक्रीट के जंगलों में सिमटती जा रही हैं। कमोबेश हर मध्यम और बड़े नगरों के आस –
पास के गांव विलुप्त होते जा रहे हैं। पारिस्थितिकी संतुलन के नज़रिये से गाँव की संरचना में
पेड़ – पौधे अधिक और इंसानी आबादी कम होती हैं।

गाँव एक हरे – भरे सागर में एक द्वीप सा नज़र आता है। ठीक इसके उलट, शहरों में हरियाली द्वीप सी और मानवीय बस्तियां सागर
सी हिलोरें भरती हुई दिखाई देती हैं। महात्मा गाँधी कहते थे कि असली भारत गाँव में
बसता है। उनकी ग्राम स्वराज की परिकल्पना का आधार ही गांव की खुद -मुख्तारी रही है।
इसका सरल मतलब यही है कि गाँव स्वयं में आत्मनिर्भर हों। बात -बात के लिए उन्हें शहरों
का मुंह न ताकना पड़े। लेकिन वर्तमान की विकास  -धारा गांधीजी के विचारों के विपरीत
जान पड़ती है। अब के विकास का मतलब ही शहरीकरण है। जब ग्रामीण बस्तियां नगरों का
स्वरुप धारण कर लें, वही विकास का उत्कर्ष है। लेकिन जब सारे गांव शहर बन जायेंगे तो
इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। ये पारिस्थितिकीय, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक
कठिनाइयों की बड़ी वजह बन सकता है।  कहते हैं अति हमेशा घातक होती है। उससे
अंततोगत्वा किसी को फायदा नहीं होता। न तो फ्रांसीसी दार्शनिक रूसो की तरह जंगल की
ओर पूर्णतया लौट कर जाना सही होगा और न ही जंगल मुक्त जीवन की ओर।

सही मायनों में ग्राम और नगर दोनों एक दूसरे का संतुलन साधते हैं। यह बिलकुल वैसे ही है जैसे पृथ्वी के 71
प्रतिशत भाग का जलाच्छादित होना। कल्पना कीजिये यदि यह उल्टा होता तो क्या होता ?
कम भू -भाग और अधिक जलीय हिस्सा एक प्रकार संतुलन स्थापित करते हैं।  अतिशय
नगरीकरण पर्यावरण के लिहाज़ से उचित नहीं है। इससे पारिस्थितिकी संतुलन को गंभीर
नुकसान हो सकता है।   शहरी संस्कृति  अतिशय उपभोग और परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर
उत्पादन पर आधारित है। ग्रामीण संस्कृति महात्मा गाँधी के विचार के ज्यादा करीब है। वो
कहते हैं कि मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रकृति पर्याप्त समृद्ध है किन्तु उसके
लालच को संतुष्ट कर पाना प्रकृति के बूते के बात नहीं। विकास की मूल भावना ऐसी होनी
चाहिए जिससे मौलिकता को क्षति न पहुंचे। इससे दो लाभ होंगे। पहला यह कि प्राकृतिक
संसाधनों जिमसे जल, वायु  भूमि प्रमुख है, पर दबाव कम होगा।  दूसरा यह कि सतत विकास
की दिशा में यह गंभीर और सार्थक प्रयास होगा। भारत प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण है।
इसी कारण मार्क ट्वेन मानते हैं कि यहाँ की प्राकृतिक समृद्धि यहाँ का सबसे उपयुक्त परिचय
है।

भारत के ग्राम्य जीवन की अपनी एक विशिष्ट पहचान रही है। कृषि प्रधान देश होने के नाते
देश की पारम्परिक लोककलाओं, लोकगीतों, पर्वों, हस्तकलाओं इत्यादि में ग्राम्य जीवन की
छाप सुस्पष्ट रूप से अंकित है। ऐसे में विकास गॉंवो की मौलिकता को नकारात्मक रूप से
प्रभावित किये बिना हो तो यह न केवल प्राकृतिक बल्कि, आर्थिक, सामाजिक

और राजनीतिक रूप से संतुलित होगा। ऐसा करके न केवल संतुलित विकास को नयी दिशा
मिलेगी बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति और स्थिरता प्राप्त होगी।
ग्राम्य भारत को मज़बूत करने का प्रयास शहरों पर पड़ने वाले दबाव को कम करेगा। आज़ादी
के बाद नगरों में औद्योगिक बस्तियां बसने के बाद गावों से नगरों की ओर बड़ी संख्या में
पलायन हुआ है। 90  के दशक में आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण से शहरों में जो
रोज़गार की संभावनाएं पैदा हुईं , उसने शहरीकरण को तीव्र कर दिया है। महज़ कुछ साल
पहले तक शहरों के किनारे बसे अनेक गाँव अपना अस्तित्व खो बैठे हैं। खेत – खलिहानों और
बाग़ -बगीचों के स्थान पर कंक्रीट की बस्तियाँ उग आयी हैं। यह ख़तरनाक स्थिति है। इसने
संतुलित विकास की अवधारणा को नुकसान पहुँचाया है।


कृषि ही नहीं बल्कि पर्यटन जैसे उद्योगों को ग्रामीण अंचलों में आसानी से विकसित किया जा
सकता है। ह्यूज़ और कॉलिन जैसे पर्यटन के क्षेत्र में अनुभव रखने वाले लेखकों ने तुर्की और
ऑस्ट्रेलिया के सुदूर ग्रामीण इलाकों में विकसित पर्यटन उद्योग का विशद विवेचन किया है।
यदि ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा दिया जाये तो न सिर्फ गाँव की महत्त्ता बढ़ेगी बल्कि वे शहरी
इलकों से प्रतिस्पर्धा भी कर पाएंगे। इस प्रकार से बदलते परिवेश में भी गाँव विकसित होकर
भी अपनी मौलिकता को बचाने में समर्थ होंगे। पंचायती राज व्यवस्था ने  गावों को
राजनीतिक तौर पर आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। किन्तु यह पर्याप्त नहीं है।
आर्थिक आज़ादी के बिना राजनीतिक आत्मनिर्भरता अपना महत्व खो देती है। इसलिए गावों
के विकास की उपेक्षा नहीं की जा सकती।  किन्तु विकास की प्रक्रिया में गावों के स्वरुप में
सुधार हो न कि उनकी तस्वीर विकृत कर दी जाये। हमे शहर और गांव को दो अलग – अलग

नज़रिये से देखना होगा। इसलिए इस बात की ज़रूरत भी होगी कि दोनों के लिए पृथक
आर्थिक मॉडल हों।

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