एनआरसी : गरीब और कमजोर काग़ज़ कहॉं से लायेंगे 

इस्लाम हुसेन

-इस्लाम हुसैन, वरिष्ठ पत्रकार, काठगोदाम, नैनीताल

आपके कागजों में दादा-दादी, नाना-नानी के नाम में थोड़ा सा अन्तर या अलग नाम आपको यातनागृह में डालदेगा।रमुवा और रामू ही राम सिंह या राम लाल/राम प्रसाद है, या रामलाल, फकीरे, फकीर चन्द्र/चंद है यह आजआप नहीं जान सकते।आप ऐसे ही हजारों, लाखों, करोडो़ रमुवा, पदुवा, धनुआ,नत्थू, छिद्दा पिद्दा,रमुली,जसुली नथिया, बुंदिया, बुल्ले, कीकर,झोंटू, दुल्ला,गुल्ला,बेलू, को नहीं जानते।

आप जान ही नहीं सकते, क्योंकि ये प्राणी जिसके नाम चुनाव सूची या अन्य दस्तावेजों में जो दर्ज हैं, वह वो नहीं होते हैं जो नाम लिखे हैं, उनके नाम वो हैं जिसे भारत सरकार का चुनाव आयोग और सरकारी सिस्टम नहींजानता। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसीही दस्तावेजी भूलों व गलतियों के आधार पर नागरिकता संशोधन का भारतनाट्यम चलाया और दिखाया जा रहा है। जिसपर सब नाचने के लिए बाध्य किए जा रहे हैं। कुछ नाच रहे हैंकुछ नाचने के लिए तैयार है।

एन आर सी और नागरिकता के मुद्दे पर हो रहे हंगामें के बीच अनेक विचार आते रहे, एक विचार यह था कि क्या होगा देख लेंगे, लेकिन जब अगली पीढ़ी का ख्याल आता तो उलझन होती, कागज- वागज देखने का अब मन नहीं करता,

इस विवाद के बीच पहले मेरा एक बच्चा, जो आज की परिभाषा में एक विख्यात विश्व विद्यालय में (ग्रेजुएशनके बाद आगे एमटेक) उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहा है, वह आया हुआ था, और नागरिकता कानून को लेकर बहुतगुस्से में था, आमतौर पर वह अपनी पढ़ाई के अलावा मामलों में खामोश रहता है, लेकिन इस मामले को लेकर बेचैन था।

बातचीत में उसने बताया कि आधार कार्ड में गलत नामों का इंदराज का रेट 5-8% है, और चूंकि आधार कोनागरिकों की पहचान से जोड़ने का प्रोपगंडा खूब हुआ था इसलिए अधिकांश नागरिकों ने अपने आधार कार्डबनवा लिए हैं, यदि उसमें उनके नाम गलत इंदराज हुए होंगे तो वो कहां जाएंगे – डिटेन्शन सेन्टर, अभी तक जोआसाम का अनुभव है उसके देखकर यही लगता है, जहां बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनके डाक्यूमेंन्टस केनाम में अन्तर था।

प्रोफ़ेसर रूप रेखा वर्मा घंटाघर लखनऊ में धरने को सम्बोधित करती हुईं

मैं एकदम चकरा गया, और मुझे 25-30 साल पहले वोटर सूची और वोटर आईडी में दर्ज हुए नाम का प्रकरणयाद आ गया। लेख के आरम्भ में मेरे सवाल का यही आधार था,

यदि आप के पास 25-30 साल पहले वाली वोटर सूची होती तो आप किसी भी मुहल्ले में मकान नम्बर मिलनेके बाद भी उस व्यक्ति को नहीं ढूंढ पाते, मकान में पहुंच भी जाते तो तो आपको अपने पर और सरकारी अमलेकी नालायकी पर खीज और गुस्सा आता।

मेरे बच्चे ने तो आधारकार्ड की गलती होने का औसत 8% बताया, मगर वोटर आईडी में यह औसत इससे कहींअधिक है।

मैने अपने शहर की मिलीजुली आबादी के एक मतदान केन्द्र की लगभग 2100 मतदाता सूची का जोअवलोकन किया उसे देखकर यही लगता है कि एन आर सी लगने पर देश के नागरिक एक बड़े संकट में फंसेवाले हैं। इसमें मतदाताओं के नाम में गलती का प्रतिशत 14-18% है।

तो कुछ देशप्रेमी जो लगातार राष्ट्रीय स्तर पर एन आर सी का समर्थन कर रहे हैं उन्हें बताता चलें कि आसामका अनुभव बताता है कि वहां 3 करोड़ आबादी में से 40 लाख लोग नागरिकता रजिस्टर से बाहर हो गए थे, पुनः वेरीफिकेशन में जिनकी संख्या बाद में 19 लाख रह गयी थी, (इस अवधि में लोगों को कितनी मानसिकपीड़ा होगी इसकी कल्पना करना मुश्किल है। )

इस आधार पर पूरे देश की कैसे कम 20 प्रतिशत जनसंख्या अर्थात (20-30 करोड़), बुरी तरह पीड़ित होगी।जिसमें सभी धर्मः और जाति के लोग शामिल होंगें, ऐसा नही कि कोई धर्म विशेष के लोग ही परेशान होंगे।और जो जितना गरीब होगा, और सुदूर क्षेत्र का निवासी होगा वह उतना ही पीड़ित होगा। जरा कल्पना करें किपर्वतीय या बीहड़ इलाके में रहने वालों को जिला या ब्लाक मुख्यालय में एन आर सी में नाम जुड़वाने के लिएकितने चक्कर लगाने पड़ेंगें। और यदि नहीं हुआ तो कितनी ज़लालत झेलनी पड़ेगा।

यह उन लोगों से पूछिए जिन्हें किसी सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए अनिवार्य रूप से बैंक खाता खोलनेके लिए अनेक बार अपने घर से बैंक शाखा तक 20-20 किमी पैदल चक्कर लगाने पड़े थे, क्योंकि हमाराअनुभव है कि बैंक के साहब गरीबों का बैंक खाता तक एक ही दिन में आसानी से नहीं खोलते। और यह तो एनआर सी जैसी भारी भरकम प्रक्रिया है साहब।उत्तराखंड के संदर्भ में जानलें कि यहां कम से कम 20 लाख लोग बुरी तरह पीड़ित होगें।

इससे पहले कुछ तथ्य जानना जरूरी है जिनमें कि अभी भी हमारे देश में वास्तविक साक्षरता और आंकड़ों की साक्षरता में बड़ा अन्तर है और तीन दशक पहले जब वोटर आईडी शुरु की की गई थी तो और भी बुरा हालथा। पढ़े लिखे और अध्यापन जैसे व्यवसाय में हैं जो लोग हैं उनकी भाषा वर्तनी की शुद्धता पर भी सवाल है, मतदाता या आधार कार्ड बनाने वाले सभी धर्मों/भाषाओं की गूढ़ता/बातों/रस्मों और प्रतीकों को जानते हों यहजरूरी नहीं यही कारण है कि प्रमाणपत्रों और दस्तावेजों में लिखे नाम उनके वास्तविक नामों से भिन्न हो गए हैं।

फिर जागरुकता का अभाव हर काल में रहा है, यहां तो पढ़े लिखे भी बात समझने के लिए तैयार नहीं होते, हिन्दी में नाम की अशुद्धियों के अतिरिक्त अंग्रेज़ी में दिए नाम में और भी गलतियां देखी गई है,

मतदाता सूची में और अन्य दस्तावेजों में ब, भ, स श, अ, ह त, थ, आधा त, र, स श न, ह, के प्रयोग की भयंकरअशुद्धियां शामिल हैं। नाम में गलत शब्द के प्रयोग से धर्म का बोध तक बदलता देखा गया है, मुस्लिम नामकफील के हिन्दू नाम कपिल बनने में देर नहीं लगती, इसी तरह मुस्लिम नाम निशात, बदलते बदलते निशाद होजाता है। कतील नाम कातिल हो जाए कह नहीं सकते। गुरमित ही गुरुप्रीत है यह सिद्ध करना आसान नहींहोगा।

पर्वतीय क्षेत्रों में ‘त्र’ अक्षर से अनेक नाम खूब प्रचलित हैं, त्रिभुवन, त्रिलोक, त्रिलोचन, त्रिपुरारि,आदि आदि यहशब्द कम से कम तीन अन्य तरह से दस्तावेजों में मिलता है, जैसे, तिरलोक, तिलोक, तिरिलोक/तिरीलोक,।इसी तरह आधे अक्षरों से युक्त शब्दों के एक से अधिक रूप हैं। देवेन्द्र,देवेन्द्रा, देविन्दर,देवेन्दर, चन्द्र कब औरकैसे चन्दन हो जाए या चन्द्रा हो जाए कहा नहीं जा सकता।

इसी तरह एक मुस्लिम नाम ‘इश़्हाक़’ मतदाता सूची/दस्तावेजों मैं कैसे कैसे लिखा गया है इसकी बानगीदेखिए, ईशाक, इशाक, इश़ाक, इशहाक, इश्हाक, ईश़हाक, ईश़्हाक,इसी तरह ईश्वर शब्द भी अनेक रूपों में दस्तावेजों में मिल जाएगा।

परेशानी यह है कि वर्तमान समय में कम्प्यूटर की मूल भाषा अंग्रेजी होने के कारण आपरेटर कैसे लिखता है, जोकि आपके मूल दस्तावेज से भिन्न है, इसे अच्छे अच्छे पढ़े लोग नहीं जान पाते हैं, अशिक्षित और कम जानकारोंके लिए यह सब बहुत ही मुश्किल है।

हिन्दी से रोमन या अंग्रेजीकरण करने का कोई मानक तय नहीं है, (यदि होगा तो उसकी जानकारी नहीं है औरन व्यवहार में ऐसा हो सकता है) हिन्दी टाइपिंग में वर्तनी की अशुद्धियों और भूलों को सुधारने का न तो कोईनियम हैं और न उसे सुधारने की कोई स्वतः प्रक्रिया ही अस्तित्व में है।

दस्तावेजों में गलतियों से फौजियों/फौजी परिवारों को सर्विस के दौरान और रिटायरमेन्ट के बाद अपने बच्चोंके नाम में फर्क से होने वाली परेशानी से भटकते देखा है। बैंक एकाउंट से लेकर स्कूल में दाखिल तक मेंपरेशानी आती है। ऐसे में यदि दादा, नाना के मूल नामों में अन्तर आया तो एन आर सी में नागरिकता सिद्धकरना आसान नहीं होगा, आसाम में ऐसे लोगों का बहुत बड़ा प्रतिशत है।

एक सार्वजनिक कम्पनी में प्लेसमेंट और ट्रेनिंग का कार्य देखते हुए और बाद में संस्थागत कार्य करते हुए नामोंमें बहुत गलतियां मिली, हिन्दी और अंग्रेजी के नाम में बहुत अन्तर से बखेड़े होते हुए देखे हैं। जिसके कारणलोगों के बहुत काम अटके, वह या तो नहीं हुए या फिर देर से हुए, नवराष्ट्रवाद के काल में ऐसा भी हुआ किबच्चों के स्कूलों में एडमीशन और परीक्षाओं में प्रवेश में भी आधार कार्ड के और दूसरे दस्तावेजों में दर्ज नामोंके अन्तर के कारण परेशानी और झंझट हुए।

हमारे समय में हिन्दी वर्णमाला के साथ बारहखड़ी एक आवश्यक अभ्यास था ताकि शब्द लिखने में और वाक्यविन्यास आसानी हो, अब ऐसा नहीं होता। बात मजाक में की जाती है कि हिन्दी में बीए, एमए करने वालाहिन्दी की 10 पंक्तियां शुद्ध नहीं लिख सकता, यही हाल अंग्रेजी का भी है।

ऐसी स्थिति में यदि एन आर सी समर्थक भी जब अपने या अपने परिवार के सदस्यों के नामों को सही करने केलिए लाइन लगाएंगे तो कितना श्रम उर्जा और धन की बर्बादी होगी इसको सोचकर सिहरन होती है। आसामका अनुभव है कि वहां लोग चार साल तक लोग पगला गए थे, हर परिवार का हजारों रूपया अनावश्यक इसमेंलगा था। 16000 करोड़ रूपया यदि सरकारी पैसा खर्च हुआ है तो वह भी देश का पैसा बर्बाद हुआ है, एकअध्ययन के अनुसार एक आसामी का एन आर सी रजिस्टर में अपना नाम दर्ज/वेरीफाई कराने में औसतन19000 रुपये खर्च हुआ है।….…….कल्पना करें कि पूरे देश में कितनी बड़ी बर्बादी होने जा रही है।

इस स्थिति की गंभीरता को इस तरह समझें कि किन्हीं लोगों के पिता/बुजुर्गों के नाम भूमि आदि के दस्तावेजोंमें रामू, दीनू, नथुवा, बलवन्ता लिखा है जबकि उनके दस्तावेजों में क्रमशः राम सिंह या रामलाल, रामप्रसाद, दीनानाथ, दीनदयाल, और बलवन्त सिंह है तो उन्हें बहुत कुछ सिद्ध करना पड़ सकता है। उदाहरणार्थ रामू क्यावास्तव में तुम्हारे बाप/बुजुर्ग थे। यह जान लें कि अभी तक दस्तावेजों तक में अशुद्ध या देशज/घरेलू नामों काप्रयोग खूब हुआ है और होता रहा है, अशिक्षित बुजुर्गों द्वारा दस्तावेजों में खूब घरेलू नामों का प्रयोग होता था, स्कूल में दाखिल के समय यह नाम कुछ का कुछ हो जाता था। वैसे यह बिगड़ भी जाता था।

जिन लोगों ने अपने पिता के नाम दस्तावेजों में आधे अधूरे व देशज नामों से जरा भी अलग रखें हैं, या स्कूल मेंमास्साहबों ने “सुधार” दिए हैं, ठेंगा सिंह एक दस्तावेज में ठाकुर सिंह हो सकते लेकिन दस्तावेज में दोनों एकही हैं यह सिद्ध करना मुश्किल हो जाएगा ऐसे लोग जान लें कि उनपर बड़ी आफत आने वाली है, यह नामरमुवा, भिमुवा, जसुली, परूली से लेकर छिद्दा, छिद्दू और ननकू तक हो सकते हैं।

क्योंकि जैसे आजकल के बहुत से मां बापों तक को यह पता नहीं होता उनका मुन्ना मुन्ना पिंकी गुड्डी, दस्तावेजों में क्या हैं। वैसे अब पप्पू कार्की और गुड्डी अधिकारी भी होते हैं। ऐसे में सौ साल पहले की स्थितिकी कल्पना करें। ध्यान रहे, स्कूल जानेवाले और हाईस्कूल तक पहुँचने वाले बहुत से बच्चे अभी भी खानदान मेंपहले पहले होते हैं, यानी की उनके मां बाप और बुजुर्गों ने इससे पहले स्कूल का मुंह नहीं देखा होगा।

अब जरा एक और तकनीकी पक्ष देखें एन आर सी प्रक्रिया में हर भारतीय की नागरिकता संदिग्ध मान लीजाएगी, आपको लाईन लगाकर यह सिद्ध करना होगा कि आपका जन्म 1972 से पहले भारत में हुआ है औरयहीं रहते थे, यदि उसके बाद हुआ है तो आपके माता पिता/दादा दादी का जन्म उस अवधि से पूर्व भारत में हुआथा और वह यहां रह रहे थे। जिसके लिए आपके पास ऐसा दस्तावेज होना चाहिए। जन्म पंजीकरण का कानूनको लागू हुए अभी जुमा-जुमा आठ दिन हुए हैं लेकिन आपको एन आर सी के लिए दश्को पुराने अपने बुजुर्गोंका जन्म प्रमाण चाहिए होगा।

इस प्रक्रिया में यह बात समझलें कि नाम लिखित में सही होना चाहिए और उस नाम से आपका या आपकेपिता या माता का नाम मिलना चाहिए, या सम्बन्ध स्थापित होना चाहिए।

इस समय यह भूल जाएं कि भारत में बड़ी संख्या में अशिक्षित,भूमिहीन, आदिवासी, घुमक्कड़ खानाबदोश, बिना मकान के इधर उधर या खुले आसमान के नीचे फुटपाथ में रहकर गुजरबसर वाले करोड़ों लोग हैं जिनकेपास अपना या अपने बुजुर्गों के जन्म का कोई प्रमाण नहीं होता।

यदि बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं कि उनके पास अपने बुजुर्गों के जनम की लिखित सनद है तो “वह भी” समझ लेंकि उसमें से 25% पर आफत आने वाली है क्योंकि भूमि/ आदि के दस्तावेजों में 25% अशुद्धियां तो मिलनी हैं, यदि किसी के बुजुर्ग के नाम में अशुद्धि मिली तो बुजुर्ग का नाम तो ठीक होने से रहा उसे ही अपने और अपनेबच्चों के नाम उसी तरह शुद्व कराने पड़ेंगें, सामान्य रूप से से समझ लें कि कि यदि आपके बुजुर्ग का नाम जोकुछ है वैसा ही आपके दस्तावेजों में होना चाहिए।

आप अपने बच्चों या अपने आधार कार्ड का नाम सुधारना चाहते हैं तो अब इसका आसान नहीं है, आधारकार्डमें नाम सुधार की प्रक्रिया बहुत कड़ी और सीमित कर दी गई है, पिछले वर्ष तक यह हर सेन्टर पर आसानी सेहो जाया करती थी। फिर आप अभी अपना या बच्चों के नामोंमें सुधार जैसे तैसे कर भी लें (जो अब आसाननहीं हैं) तो अपने दादा नाना का नाम कैसे ठीक करेंगे ?

ऐसे में सबसे बडी समस्या दलितों, आदिवासियों, खानाबदोशों और प्रवासी लोगों की होने जा रही है,जिनके  खुद के प्रमाणपत्र नहीं होते वह अपने बाप दादाओं के कागजात कहां से लाएंगे।

दलितों के साथ तो यह भयानक मजाक है क्योंकि अभी हाल तक उन्हे नाम रखने का अधिकार नहीं था,न हीउनका नामकरण होता था और न न उनकी जन्मपत्री बनती थी। यहां तक यदि किसी दलित बच्चे का नाम ढंगका रख भी दिया गया तो उच्च वर्ग उस नाम को बिगाड़ देता था। रामलाल का रामू, व रमुवा इसी तरह हो जाताथा।

बेहद गरीबों, ग्रामीणों और प्रवासियों के सामने दस्तावेज सुरक्षित रखने का संकट भी रहा है, वह वर्षा,बाढ़, प्राकृतिक आपदा, आग, और अपने लगातार बदलते प्रवास में अपने सीमित कागज भी सुरक्षित कैसे रखें। उत्तरभारत में विशेषकर उत्तराखण्ड व हिमाचल में घुमन्तु वनवासी गूजर इसी समस्या से परेशान हैं।

यह जान लें कि इस प्रक्रिया में पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अहमद का परिवार और आसाम की पूर्व मुख्यमंत्रीअनवरत तैमूर व कारगिल का हीरो फौजी सनाउल्ला सेना अधिकारी ही नहीं परेशान हुए हैं, लाखों शर्मा, वर्माऔर सुन्दर, चन्दर भी परेशान हुए हैं।

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